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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 124
११२कंब रामायण

को न छूकर स्थिर रह जाने थे। उनके दाँतो की चमक बाहर नही दिखाई देती थी। उनके दीर्घ केश बघन से मुक्त होकर खिसक नही पडते थे। उनकी भौंहे टेढी होकर नही मिलती थी। अपनी पुष्प-कोमल हथेली ओर अपने स्वर को सँवारकर ( वीणा के ) तारो को मेडती हुई वे अमृत वर्षा-सी करती थी। उनके उस सगीत को सुनकर किन्नर भी विस्मय-विमुग्ध हो जाते थे।

मधु बहानेवाले पुष्प-हारो से भूषित तथा कानो के साथ संबंध जोडनेवाले करवाल-तुल्य नयन से युक्त तरुणियाँ जब स्फटिक-वेदिकाओ पर आसीन होती थी, तब उन धवल शिलाओ से उत्पन्न जलधाराएँ उन तरुणियो के कुकुम-लेप से मिलकर ऐसी लगती थी, मानो असंख्य रत्नों के बने चषको मे मद्य भरा गया हो।

अपने पतियो के प्राणो को व्याकुल करती हुई, अजन-युक्त अश्रु बहाती हुई, रूठ-कर आँखें लाल करती हुई देवस्त्रियों ने अपने केशो से मदार-पुष्पमालाओ को निकालकर फेंक दिया था। वे अम्लान ओर मधु भरी मालाएँ उस पर्वत पर यत्र-तत्र शोभायमान थी।

आम्रपल्लव के रंगवाली पहाड़ी स्त्रियाँ मुकुलित क्रमुक-पत्रो में पुष्पमालाएँ डालकर अपने केशो के साथ उनकी तुलना करके देखती थी। आभरण-भूषित देवांगनाएँ अपने अग्नि-जैसे चमकते रत्न-खचित 'कटक' (नामक आभूषणो) को उतारकर 'कोंदल' (नामक पौधे) के पुष्पों को पहना देती थी और अपने करो के साथ उनकी तुलना करके देखती थी।

तीर चढाये हुए धनुष के जैसी स्पंदित भौहो के साथ ( वीणा ) तत्री से एकस्वर होकर मधुर गान करनेवाली तथा मयूरो के साथ नाचनेवाली देवस्त्रियाँ (अपने प्रियतमो से) मान करती हुई अपने रत्नहारो को उतारकर फेंक देती थी। ( उस पर्वत पर के ) वानर उन हारो को उठाकर पहन लेते थे और वानरियाँ उन्हे देख-देखकर आनदित होती थी।

ऊँचे बढे हुए चदनवृक्षो से युक्त सानु-प्रदेशो मे स्थित गैरिक के लगने के कारण मनोहर दिखाई देनेवाली लोभ-भरी हथिनियाँ महावर लगाये हुए-सी दीखती थी। (उस पर्वत पर के) उज्ज्वल पद्म-रागो की लाल काति (किरणे) फैलने से वहाँ के आकाश पर सदा लाली छाई रहती थी।

पृथ्वी के अलकरण के निमित्त किरण-पुज-विशिष्ट मुक्ताओ को बिखेरती हुई, पार्वती के प्रियतम ( शिवजी ) के शिर पर जो गगा उतरी थी, उसकी समानता करती हुई अनन्त स्वर्ण को बहाती हुई, मोतियो के साथ आ गिरनेवाले निर्झरो की पक्तियों ( उस चन्द्रशैल पर) ऐसी दृष्टिगत होती थी, जैसे त्रिविक्रम के वक्ष पर उत्तरीय वस्त्र लहरा रहे हो।

'सुरपुन्ना' के पुष्पो के साथ लवग-पुष्पो को भी सम्मिलित करके पहननेवाले तथा मत्त भ्रमरो को उड़ाकर शुद्ध मधु का पान करनेवाले ( वहाँ ठहरे हुए ) उन लोगो ने अश्व-मुखी देवताओ को देखा, जो किन्नर-मिथुनो के संगीत सुनकर अपना प्रणय-कलह त्याग देते थे।

उन लोगों ने देखा कि अत्यत मुदित युवको के सुन्दर वक्षो पर आघात करनेवाले स्तन-युगल जैसे अनुपम 'कोङ्गु' वृक्ष की कलियो के निकट ही, रमणियों की ही कटि के समान