भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 549 में से

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पृष्ठ 125

बालकाण्ड २९३

के समान (पतली) शाखाएँ लचक रही हैं। उनमें भ्रमरियाँ और (उन लोगों के) केशों पर मंडराने की प्रकृतिवाले चंचरीक नव विवाह का संबंध जोड़ रहे हैं।

(उस पर्वत पर के) जलाशय को स्फटिक-मय स्थल समझकर, चूडामणि से सुशोभित, सुन्दर कण्ठ तथा उज्ज्वल चंद्र जैसे बदनवाली (रमणियाँ) शीघ्रता से वहाँ चली जाती हैं और अपने उत्तरीय तथा कटि-वस्त्र को जल से भिगो लेती हैं। वह दृश्य देखकर वीर-वलयधारी युवक ताली बजाकर हँस पड़ते थे।

(उन लोगों ने) अनेक पुष्प शय्यायें देखीं। (बिखरी हुई) पुष्पमालाएँ देखीं। मनोहर बीरबहूटी-जैसी पान की पीक पड़ी देखीं। प्राणों से भी अधिक प्यारे पतियों के विरह में मूर्च्छित विद्याधर-स्त्रियों के लेटने से झुलसी हुई पल्लवों की सेजें भी देखीं।

(उन्होंने देखा कि) देवांगनाएँ सुगन्ध भरे (पुष्पमय) स्थलों पर मृत नहीं हैं। उन देवांगियों के नीलकमल-जैसे नेत्र अत्यन्त चंचल ही बन रहे हैं। उनके प्रवाल-जैसे मुँह पर मन्द हास बिखर रहे हैं। उनके रभसे हुए पीन स्तनों पर अमूल्य रत्नहार डोल रहे हैं। मधुमत्त भ्रमर उनके केशों के मध्य शब्द करते हुए उड़ रहे हैं और उनके रत्न-खचित कर्णाभरण डोल रहे हैं।

अपनी लज्जा को धन के लिए बेचनेवाली, स्वर्ण-आभरण पहने हुई (वार) नारियाँ, जिस प्रकार किसी पुरुष की सारी संपत्ति अपहरण करने के पश्चात् उसे सारहीन समझकर निराकृत कर दूर कर देती हैं, उसी प्रकार सुन्दरवदना नारियों के प्रवाल-दशनों के दाग; विविध मद्यों का पान किये जाने के उपरान्त, लुढ़काये हुए मधु-पात्रों को (उन लोगों ने) देखा।

रात्रि को दिन बनानेवाले प्रकाश से युक्त स्फटिक की गुफाओं पर, अति विशाल पुष्ट भुजाओंवाले देवगण जब धनुष को परास्त करनेवाली भ्रूकुटि-युक्त अप्सराओं के साथ रति-क्रीड़ा करते थे, तब उपेक्षा से दूर फेंके गये कल्पक-पुष्पहारों और अन्य आभरणों को (उन लोगों ने) यत्र-तत्र पड़े देखा।

उस सेना की रमणियाँ कभी हथेली के-जैसे विकसित होनेवाले उत्पल की कली को देखकर उसे फनवाला सर्प समझ लेतीं और डर से अपनी मृग-जैसी आँखों को मूँद लेती थीं। (कभी) चिकने हीरे-भरे पत्थरों में पुष्पों के प्रतिबिम्बों को देखकर उन्हें वास्तविक पुष्प समझ लेतीं और अपने पतियों से उन पुष्पों (प्रतिबिम्बों) को ला देने की प्रार्थना करती थीं।

कभी वे स्त्रियाँ अशोकवृक्ष के मनोहर पल्लवों को अपने नखों से नोंचकर छोटे-छोटे टुकड़े बना डालतीं और उन्हें अपने स्तन-तटों पर चिपकातीं। कभी वे मधु-युक्त पुष्पों को चुनतीं, कभी कान्तिमय रत्न-भरे उस पर्वत पर हंसों के समान विशाल तालों में गोते लगातीं।

[यहाँ से आगे नौ पद्यों तक मूल में यमक की अति सुन्दर छटा दिखाई गई है, अतः अर्थ की अपेक्षा शब्द-गुंफन पर कवि का अधिक ध्यान रहा है।]

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