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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

११४ | कंब रामायण

उस पर्वत का मध्य भाग, जो आम के कोमल पल्लव के समान चमकता था, वह (वास्तव में) सोने का पत्र ही था। उसके (पर्वत के) दोनों पार्श्वों में हरिण, हाथी, सर्प आदि जन्तु तथा स्त्रियों के कंधों जैसे बाँस, पुन्नाग आदि के वृक्ष लगे थे।

अंधकार-सदृश वराहों के शरीर पर (वहाँ रहनेवाली रमणियों के द्वारा उत्पादित) जो कुंकुम-पंक लग जाता, उसे वे आम, चंदन आदि के पेड़ों पर रगड़कर हटा देते थे। देवस्त्रियों-जैसी मधुरभाषिणी उन रमणियों के कारण वह विशाल पर्वत-प्रदेश स्वर्ग के ही सदृश था।

वहाँ (चारे की खोज में) बड़े-बड़े सर्प संचरण करते थे, तो बड़े-बड़े बाँस जड़ से उखड़कर गिर पड़ते थे। वन्य-मृगों के भागने से धूलि उड़ने लगती थी। वहाँ के झरने मुक्ताओं को साथ लेकर बड़े शब्द करते हुए बह चलते थे।

प्रशस्त करवाल के-जैसे कठोर सिंहों की समानता करनेवाले (पुरुषों) की सुन्दर भुजाओं पर, उज्ज्वल तथा लाल रेखायुक्त रमणियों के आभरणालंकृत स्तन लगने से तथा उन स्तनों पर के अगरु-चंदन का लेप और मुक्ताहार लगने से (वे भुजाएँ) जिस प्रकार शोभित होती थीं, उसी प्रकार उस पर्वत-प्रदेश पर चंदन, कुंकुम आदि के वृक्ष शोभायमान थे।

घने अरण्य से आवृत्त उस पर्वत पर रहनेवाला केले का वन वहाँ संचरण करती हुई देवनारियों की ऊरुओं के सदृश था, वहाँ की (वन्य) स्त्रियाँ, किन्नरों की-सी मधुरनाद-युक्त वीणा का वादन करती थीं।

मत्तगजों के मदजल का प्रवाह बड़े वनस्पतियों को गिराता हुआ बह रहा था, जिसमें यत्र-तत्र स्थिर पड़े हुए वृक्ष दिखाई देते थे, दूसरी ओर पहाड़ी नदियों में जल पीने के लिए पहाड़ी बकरे तथा अन्य मृग चलते हुए दिखाई पड़ते थे।

बाघों के निवासभूत पर्वत-प्रदेशों में बड़े बड़े 'पटह'¹ यह सूचना देते हुए बज रहे थे कि अब पर्वतवासी काले रंग की नारियों के द्वारा कंद-मूल खोदकर निकालने का समय आ गया है।

बलिष्ठ गज जब उस पर्वत के जलाशय में डुबकी लगाते थे, तब (तट पर के) शीतल वटवृक्ष और सरोवर की कमललताएँ विध्वस्त हो जाती थीं, उग्र सिंह जहाँ टहलते रहते थे, ऐसे घने जंगलों से आवृत्त उस पर्वत पर देवबालाएँ आराम करती थीं तो भ्रमर उनके केशों में आनंद से बैठे रहते थे।

उस पर्वत के ऊपर मेघ-पंक्तियाँ आकर ठहरती थीं, निचले भाग में पुष्प-श्रेणियाँ भरी रहती थीं। वह पर्वत ऐसा था, जैसे विष्णु अपने हृदय पर लक्ष्मी को धारण किये हुए विराजमान हों।

पुष्पों पर मँडराते हुए मधु का पान करनेवाले भ्रमरों के समान ही, तरुण और तरुणियाँ घुल-मिलकर उस ऊँचे पर्वत के तट-प्रदेशों में क्रीड़ाएँ करते थे।

(वहाँ रहनेवाले नर-नारी) उस पर्वत से उतरकर नीचे आने का विचार भी इस-


¹ पहाड़ी जाति के लोग कंद निकालने का मौसम आने पर चमड़े के विविध बाजों को बजाने लगते थे।