कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ११५
लिए नही करते थे कि उस विचार-मात्र से उन्हें अत्यन्त पीडा होती थी। जिस प्रकार अपवर्ग-लोक में पहुँचे हुए मुक्तजन उस लोक के सुखानुभव के अतिरिक्त अन्य कोई विचार नही रखते; उसी प्रकार वे लोग उस पर्वत के ही वैभव मे लीन रहते थे।
मेघों का विश्राम-स्थान बना हुआ वह पर्वत हाथी के सदृश था। गगन पर संचरण करता हुआ उष्ण किरणोंवाला सूर्य उस हाथी पर आक्रमण करनेवाले सिंह के सदृश था। नभ, जो सूर्यास्त के समय की लालिमा से भर गया था, सिंह के आघात से बहनेवाले रक्त के सदृश था।
बड़ी-बड़ी शाखाओ से युक्त वहाँ के वृक्ष नभ-लालिमा के प्रकाश मे ऐसे लगते थे, मानों वे नये पल्लवों के भार से लद गये हों। अपने ऊपर सर्वत्र उस लालिमा के पड़ने से वह पर्वत रत्नों के पहाड़ जैसा लगता था।
नेत्रों को रमणीय दीखनेवाले दृश्यों तथा असंख्य शिंगों के कारण वह सुन्दर पर्वत मनोहर चन्दन-रस से लिप्त वक्षवाले श्यामल (विष्णु) भगवान् के सदृश था।
प्राण एवं शरीर के तुल्य परस्पर (प्रेम से भरे वे नर-नारी) गुंजार भरते हुए मँडरानेवाले मधुपायी भ्रमर कुल के साथ, उस उन्नत पर्वत के प्रात मे आ ठहरे, जैसे के हाथी और हथिनी, सिंह और सिंहिनी, या हरिण और हरिणी ही हों।
गगन में संचरण करनेवाला, एकचक्रविशिष्ट रथवाला सूर्य-रूपी सिंह, जो तीक्ष्ण ताप-जनक हथियाला है जिसके किरण-रूपी केसर हैं, जिनमें दूसरों के फेंके हुए तीर भी (छिपकर) खो जाते हैं तथा जो क्रोध से दूसरों का विनाश करनेवाला है—अब अस्ताचल में प्रविष्ट हुआ। उसके अस्त होने पर घना अन्धकार, जो सिंह के डर से कहीं दूर छिपा हुआ था, हाथियों के झुण्ड के समान बाहर निकला और सर्वत्र फैल गया।
मन्दार-पुष्प की सुगन्ध एवं मधु-भरी मालाओं से अलंकृत चक्रवर्ती (दशरथ) की सेना-वाहिनी रूपी गरजते हुए समुद्र मे सर्वत्र दीपमालाएँ जल उठीं; मानों लाल कमल खिल उठे हों।
शीतलता-युक्त रमणीय समुद्र की झाग-भरी वीचियों में से निकला हुआ उज्ज्वल चन्द्रमा, नक्षत्रों से घिरा हुआ गगन में आकर चमकने लगा; मानों रुचिर चन्द्रिका के सदृश (उज्ज्वल) बालुका पर, कान्तिमय मुक्ताओं के साथ धवल शंख संचरण कर रहा हो।
मत्स्यों की दुर्गन्धि से पूर्ण समुद्र ने एक धवल चन्द्रमा को पा लिया था, जिसे देखकर, ईर्ष्यावश, उस सेना-समुद्र ने भी देवनारी-सदृश अपनी तरुणियों के मुख-रूपी असंख्य चन्द्रमाओं से अपने को प्रकाशित कर लिया।
जहाँ-जहाँ नर्तकियाँ नर्त्तन कर रही थीं, वहाँ-वहाँ 'मार्जन' करने के कारण मृदुंग हुए मृद्वल (वाद्यों) का नाद, गायिकाओं का संगीत-नाद, संगीत के आलाप के अनुकूल बजनेवाली तत्रियों का नाद, हाथों से ताल देने से उत्पन्न नाद, गाँठदार बाँसुरी का नाद—ये सभी नाद इस प्रकार उमड़ उठे कि स्वर्ग के निवासी भी आश्चर्य से चकित हो गये।
ठंडक के लिए रत्नाभरणों को हटाकर अपनी सखियों से प्रकाशमान मुक्ताहारों को लेकर अपने वक्ष पर पहननेवाली तथा अगरु-धूम से (पत्रभंगों को) सुखानेवाली (वहाँ