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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड १११

में खड्ग् चमक उठते थे और लाल रत्न जड़े हुए उनके अंगद रह-रहकर दीप्तिमान् हो उठते थे।

(धरती को चारो ओर से) घेरकर पड़े हुए समुद्र जैसे उज्ज्वल रत्न-भरित स्वर्णिम (मेरु) पर्वत को पकड़ने के लिए आ पहुँचे हो, उसी प्रकार वह सेना उमड़कर आई और उस पर्वत-प्रांत मे ठहर गई। अब हम उस चन्द्रशैल के रूप का वर्णन करेंगे, जिसे राजागण, उनकी पत्नियाँ, राजकुमार और लता-समान कुमारियाँ-सब मिलकर देखनेलगे थे।

दीर्घ दंतवाले गज, अपनी तालवृन्त-सदृश सूँड़ो को बढाकर, स्वर्गलोक मे स्थित कांतिपूर्ण कल्पवृक्ष की ऊँची शाखाओ को, जिनपर अनेक भ्रमर संगीत गाते हुए नृत्य करते रहते थे, पत्तो सहित तोड़कर अपने प्राण-समान हथिनियो को दे देते थे।

प्रवाल-सम लाल मुँह, जिनसे राग विकसित होते थे, तथा शीतल कुवलय-पुष्प-समान नयनो से युक्त कुरिंजि-प्रदेश (पार्वत्य-प्रदेश) की सुन्दरियो को ऋतु-परिवर्त्तन की सूचना देनेवाले भ्रमर ‘वेंगे’ (नामक) वृक्ष के पुष्पो से अघाकर गगन के नक्षत्रो पर यह सोचकर लपक पड़ते थे कि ये भी नवमधु देनेवाले ‘सुरपुन्ना’ के फूल हैं।

‘नक्षत्र’ नामक हथिनी-सहित ‘श्वेत चन्द्र’ नामक हाथी अपनी दोनो कोटियो (धनुष की नोक) रूपी सुन्दर वक्र दंतो से मधु-धाराएँ बहा देता था (अर्थात्, उस पर्वत के शहद के छत्तो में चन्द्र अपनी कोटियो को गड़ाकर उनसे मधु-धाराओ को बहा देता था)। वे धाराएँ नालो के रूप मे बह चलती थी। खेती करनेवाले किसान उन धाराओ का मार्ग बदलकर उनमें आकाशगंगा के जल को बहा देते और उससे धान के अपने खेतो को सींचते थे।

उस पर्वत को लाँघ न सकने के कारण उसकी तलहटी मे ही अटककर रह जाने-वाले चन्द्रमा-रूपी मुकुर में एक ओर से (धरती पर रहनेवाली) पर्वत की स्त्रियाँ अपने शृङ्गार को प्रतिबिंबित देखती थी, तो दूसरी ओर से (स्वर्गलोक मे रहनेवाली) अप्सराएँ अपना सौंदर्य देखती थी।

वहाँ के पर्वतीय पुरुष, अपनी उन सुन्दरियो के ललाट के साथ चन्द्रमा की तुलना करके देखते थे जिन (रमणियो) के नेत्र उस शूलायुध के समान थे, जो हवा निकालने-वाली भाथियो की धधकती आग मे तपाये बिना तथा धार पर विष और तेल चढ़ाये बिना भी प्राण हर लेनेवाले थे।

(वहाँ के झोपड़ों के) आँगन मे भयंकर सिंह-शावक सुन्दर हथिनियो के जाये हुए बच्चो के साथ खेलते रहते थे। वक्र बालचन्द्र भी उज्ज्वल ललाट-युक्त पर्वत-जाति की नारियो के बच्चो के साथ खेलता रहता था।

उस पर्वत के इन्द्रनील से भरे तटो पर तथा वहाँ के विद्याधरो के केश-भूषित सुन्दर शिरो पर, क्रमशः अंजन-पर्वततुल्य गजो को मारनेवाले कठोर सिंह के दृढ चरणों के (लाल) चिह्न तथा (विद्याधर) स्त्रियो के महावर-लगे कमल-चरणो के लगने से उत्पन्न आर्द्र चिह्न दिखाई दे रहे थे।

यहाँ की रमणियों इस प्रकार गाती थी कि सुन्दर मीन जैसे उनके नयन कानो