कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें११० कंब रामायण
जलदान करती रहती है। वे उस दाता के समान ह, जो (दान में सारी संपत्ति देकर निर्धन बनने के पश्चात् भी) याचको को अपना बधु समझकर, 'नाही' नहीं कहता है; किंतु अपने पास बची हुई संपत्ति मे से ही कुछ दान देता ही रहता है।
वीर योद्धा, जिनके वक्ष पर रत्नखचित (स्वर्ण) हार ऐसे लगते थे, जैसे अग्नि के सग बिजली संचरण कर रही हो, जब अपने घने बाँधे गये केशो को हिलाते हुए, मद्यःसुवासित डेरो में प्रवेश करते थे, तब पर्वत की कंदराओं मे प्रविष्ट होनेवाले सिंहो के समान लगते थे।
शूल और वराह-दंत के जैसे (तीक्ष्ण) दाँतोवाले, रक्त-केशो से भरे अपने माथे पर, अनुपम (अतिरक्त वर्ण) इगुलिक धारण किये हुए बडे-बडे हाथी, (अपने शरीर पर बँधी) विविध घंटियो को ध्वनित करते हुए जब तरंग-भरे प्रवाह को हिलोेरने लगते थे, तब वे ऐसे लगते थे, जैसे मधु और कैटभ मनोहर नीलसमुद्र का आलोडन कर रहे हो।
काले-काले मत्तगज, उन्हे ठीक-ठीक मार्ग पर चलानेवालो (महावतो) के सकेतो को नही मानते थे और (अपने) दोनो ओर खडे अपनी जातिवालो (हाथियो) के द्वारा बाहर निकलने के लिए प्रेरित किये जाने पर भी, बे-परवाही के साथ, जलाशयो मे ही पडे रहते थे। वे (हाथी) वेश्याओ के मेखलाचित जघन-तटो मे ही मग्न उन (कामुक) जनो के जैसे थे, जो ठीक मार्ग पर चलनेवाले (गुरुजनो) के उपदेशो को नही मानते और समवयस्क साथियो के द्वारा (वेश्या-गृहो से) बाहर निकलने को प्रेरित किये जाने पर भी उसकी परवाह नही करते।
श्रेष्ठ वस्त्रो से भूषित कटिवाली रमणियो के साथ, पुरुष, पाकशालाओ से जलती हुई अगरु की लकडियाँ ले आते थे और आग जलाकर धुआँ उठाते थे, जिससे वे सूर्य के आतप को भी मद कर देते थे, इस कारण से उनके ठहरने का वह पुरातन स्थान, गर्जन न करने-वाले मेघो से आवृत, विशाल समुद्र के जेमा ही था।
कंदरा-युक्त पर्वतो में निवास करनेवाले विद्याधर (उस सेना के नर-नारियो को) देखने के लिए आते और उनके सौंदर्य को देखकर यो आश्चर्य में पड जाते थे कि अपने साथी-संगियो को भी भूल जाते थे। इस प्रकार सुन्दर राजकुमारो और तरुणियो के जम-घट से वह सेना ऐसी लगती थी, मानो अमरलोक ही भूल से धरती पर उतर आया हो।
तरुणियाँ अपने स्थान पर आने के पूर्व ही (मार्ग की थकावट के कारण) लेटे हुए पुरुषो से रूठ जाती थी। वह मान उनके सौंदर्य को बढा देता था। तब वे कभी तोते से मधुर भाषण करने लगती, कभी अपने नूपुरो से मधुर नाद उत्पन्न करती हुई, धूप को भी लजानेवाली अपनी स्वर्णिम काति को आगे-आगे फैलाती हुई चलने लगती, मानो मयूरो का झुड ही विहार कर रहा हो।
कुछ वीर पुरुष जब अपनी भुजाओ के जैसे ही उन्नत उस (चन्द्रशैल) पर्वत के पश्मिरो को निहारते हुए भयकर सिंहो के समान घूमते थे, तब उनके उभय पदो के वीर-वलय बज उठते थे उनके पुष्पहारो पर के भ्रमर शब्द करते हुए उड जाते थे. उनके पार्श्व