कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १०६
भटक रहे थे । (फिर) भेरी के नाद और दूर तक सुनाई पड़नेवाले शङ्ख के रव सुनकर तथा ध्वजाओं को देखकर पहचान सके कि दशरथ चक्रवर्ती का आवास कौन-सा है, फिर वहाँ पहुँच गये ।
(सेना के) पैरों से उठी हुई धूलि (रमणियां के) मनोहर और उज्ज्वल शरीर पर छा गई । युवक कुमार दूध के झाग के समान वस्त्रों से (अपनी प्रियतमाओं के शरीर पर से) धूलि पोंछने लगे, उससे वे तरुणियाँ ऐसी चमकीं, जैसे चित्रकार ने अपने घर के चित्रों को पोंछकर नया बना दिया हो।
हाथी पर सवार हो आनेवाले गजकुमार, ऊँचे पर्वतों पर से (समतल) भूमि पर उतर आनेवाले सिंहों के जैसे ही नीचे उतरे तथा विशाल तालवृक्ष-जैसे बने हुए चामरों-सहित चलकर, अति सुन्दर ढंग से बनाये गये डेरे में प्रविष्ट हुए ।
श्वेत वस्त्रों की बनी पताकाओं से युक्त उन आवासों में मदहास और सुगंधि से भरी सुन्दरियों के वदन ऐसे लगते थे, जैसे मेघों से भरे आकाश में रहनेवाले चन्द्रमा के उज्ज्वल प्रतिबिम्ब, चारों तरफ उठी हुई तरंगोंवाले समुद्र के धवल जल के भीतर से दिखाई दे रहे हों ।
कोई मत्तगज धूल में लोट जाता और उठकर आकाश को छूता हुआ-सा ऊँचा खड़ा हो जाता । फिर, अपने काले रंग को ढकनेवाली सफेद धूलि को शरीर के एक पार्श्व में से पोछ देता । किंतु दूसरे पार्श्व में उस धूलि से लिप्त वह ऐसा चला आता, मानो शिवजी को अपने पार्श्व में लेकर विष्णु भगवान् ही आ रहे हों ।
दुर्गुण व्यक्तियों के साथ (अविचार के कारण) मिलकर रहने पर भी बहुत सज्जन उनके स्वभाव को पहचानने पर जिस प्रकार उन्हें एक दम छोड़कर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार वेगवान् अश्व अति सूक्ष्म धूलि पर लोट जाते और झट उठकर, उस धूलि को झाड़कर, दूर हट जाते ।
(भूमि, नारी और धन—इनकी कामना-रूपी) तीन प्रकार के पाश को तोड़-कर, उत्तम गुणवान् योगी, अपने योग-बल से, अपने स्वरूप को पहचानते हैं, इहलोक तथा परलोक के फल को पहचानते हैं तथा अपने लक्ष्य-स्थान 'मोक्ष' के स्वरूप को भी पहचान-कर उसकी ओर तेजी से बढ़ते हुए सन्मार्ग से चलते हैं। उन योगियों के समान ही, घोड़े भी, तीन गुणवाली रस्सियों के बंधन को तोड़कर, अश्वपाल की दक्षता के कारण, अपने कार्य को पहचानते हुए अपने (लक्ष्य) स्थान को जानकर उनकी ओर दौड़ चलते थे, पर (अश्वारोही की) आज्ञा से दबकर वापस लौट आते थे ।
जब कलकल करती हुई वीचियाँ इस प्रकार ऊँची उठती हैं कि उनसे छिटककर जल किनारे के भीलों में जा गिरता है, तब उनके साथ ऊपर फेंके गये पुष्ट मीन भी उछलकर चमक उठते हैं, उसी प्रकार जब आकाश से गिरते हुए कुहासे के जैसे (डेरों के) परदे हवा के झोंके खाकर उड़ते थे, तब परदों के भीतर गोंटी खेलनेवाली स्त्रियों के काले नेत्र उन मीनों के समान ही चमक उठते थे ।
स्वच्छ जलवाली नदियाँ, अपने प्रवाह के सूख जाने पर भी खोदने से थोड़ा-थोड़ा