कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
बालकाण्ड १०६
भटक रहे थे । (फिर) भेरी के नाद और दूर तक सुनाई पड़नेवाले शङ्ख के रव सुनकर तथा ध्वजाओं को देखकर पहचान सके कि दशरथ चक्रवर्ती का आवास कौन-सा है, फिर वहाँ पहुँच गये ।
(सेना के) पैरों से उठी हुई धूलि (रमणियां के) मनोहर और उज्ज्वल शरीर पर छा गई । युवक कुमार दूध के झाग के समान वस्त्रों से (अपनी प्रियतमाओं के शरीर पर से) धूलि पोंछने लगे, उससे वे तरुणियाँ ऐसी चमकीं, जैसे चित्रकार ने अपने घर के चित्रों को पोंछकर नया बना दिया हो।
हाथी पर सवार हो आनेवाले गजकुमार, ऊँचे पर्वतों पर से (समतल) भूमि पर उतर आनेवाले सिंहों के जैसे ही नीचे उतरे तथा विशाल तालवृक्ष-जैसे बने हुए चामरों-सहित चलकर, अति सुन्दर ढंग से बनाये गये डेरे में प्रविष्ट हुए ।
श्वेत वस्त्रों की बनी पताकाओं से युक्त उन आवासों में मदहास और सुगंधि से भरी सुन्दरियों के वदन ऐसे लगते थे, जैसे मेघों से भरे आकाश में रहनेवाले चन्द्रमा के उज्ज्वल प्रतिबिम्ब, चारों तरफ उठी हुई तरंगोंवाले समुद्र के धवल जल के भीतर से दिखाई दे रहे हों ।
कोई मत्तगज धूल में लोट जाता और उठकर आकाश को छूता हुआ-सा ऊँचा खड़ा हो जाता । फिर, अपने काले रंग को ढकनेवाली सफेद धूलि को शरीर के एक पार्श्व में से पोछ देता । किंतु दूसरे पार्श्व में उस धूलि से लिप्त वह ऐसा चला आता, मानो शिवजी को अपने पार्श्व में लेकर विष्णु भगवान् ही आ रहे हों ।
दुर्गुण व्यक्तियों के साथ (अविचार के कारण) मिलकर रहने पर भी बहुत सज्जन उनके स्वभाव को पहचानने पर जिस प्रकार उन्हें एक दम छोड़कर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार वेगवान् अश्व अति सूक्ष्म धूलि पर लोट जाते और झट उठकर, उस धूलि को झाड़कर, दूर हट जाते ।
(भूमि, नारी और धन—इनकी कामना-रूपी) तीन प्रकार के पाश को तोड़-कर, उत्तम गुणवान् योगी, अपने योग-बल से, अपने स्वरूप को पहचानते हैं, इहलोक तथा परलोक के फल को पहचानते हैं तथा अपने लक्ष्य-स्थान 'मोक्ष' के स्वरूप को भी पहचान-कर उसकी ओर तेजी से बढ़ते हुए सन्मार्ग से चलते हैं। उन योगियों के समान ही, घोड़े भी, तीन गुणवाली रस्सियों के बंधन को तोड़कर, अश्वपाल की दक्षता के कारण, अपने कार्य को पहचानते हुए अपने (लक्ष्य) स्थान को जानकर उनकी ओर दौड़ चलते थे, पर (अश्वारोही की) आज्ञा से दबकर वापस लौट आते थे ।
जब कलकल करती हुई वीचियाँ इस प्रकार ऊँची उठती हैं कि उनसे छिटककर जल किनारे के भीलों में जा गिरता है, तब उनके साथ ऊपर फेंके गये पुष्ट मीन भी उछलकर चमक उठते हैं, उसी प्रकार जब आकाश से गिरते हुए कुहासे के जैसे (डेरों के) परदे हवा के झोंके खाकर उड़ते थे, तब परदों के भीतर गोंटी खेलनेवाली स्त्रियों के काले नेत्र उन मीनों के समान ही चमक उठते थे ।
स्वच्छ जलवाली नदियाँ, अपने प्रवाह के सूख जाने पर भी खोदने से थोड़ा-थोड़ा
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जलदान करती रहती है। वे उस दाता के समान ह, जो (दान में सारी संपत्ति देकर निर्धन बनने के पश्चात् भी) याचको को अपना बधु समझकर, 'नाही' नहीं कहता है; किंतु अपने पास बची हुई संपत्ति मे से ही कुछ दान देता ही रहता है।
वीर योद्धा, जिनके वक्ष पर रत्नखचित (स्वर्ण) हार ऐसे लगते थे, जैसे अग्नि के सग बिजली संचरण कर रही हो, जब अपने घने बाँधे गये केशो को हिलाते हुए, मद्यःसुवासित डेरो में प्रवेश करते थे, तब पर्वत की कंदराओं मे प्रविष्ट होनेवाले सिंहो के समान लगते थे।
शूल और वराह-दंत के जैसे (तीक्ष्ण) दाँतोवाले, रक्त-केशो से भरे अपने माथे पर, अनुपम (अतिरक्त वर्ण) इगुलिक धारण किये हुए बडे-बडे हाथी, (अपने शरीर पर बँधी) विविध घंटियो को ध्वनित करते हुए जब तरंग-भरे प्रवाह को हिलोेरने लगते थे, तब वे ऐसे लगते थे, जैसे मधु और कैटभ मनोहर नीलसमुद्र का आलोडन कर रहे हो।
काले-काले मत्तगज, उन्हे ठीक-ठीक मार्ग पर चलानेवालो (महावतो) के सकेतो को नही मानते थे और (अपने) दोनो ओर खडे अपनी जातिवालो (हाथियो) के द्वारा बाहर निकलने के लिए प्रेरित किये जाने पर भी, बे-परवाही के साथ, जलाशयो मे ही पडे रहते थे। वे (हाथी) वेश्याओ के मेखलाचित जघन-तटो मे ही मग्न उन (कामुक) जनो के जैसे थे, जो ठीक मार्ग पर चलनेवाले (गुरुजनो) के उपदेशो को नही मानते और समवयस्क साथियो के द्वारा (वेश्या-गृहो से) बाहर निकलने को प्रेरित किये जाने पर भी उसकी परवाह नही करते।
श्रेष्ठ वस्त्रो से भूषित कटिवाली रमणियो के साथ, पुरुष, पाकशालाओ से जलती हुई अगरु की लकडियाँ ले आते थे और आग जलाकर धुआँ उठाते थे, जिससे वे सूर्य के आतप को भी मद कर देते थे, इस कारण से उनके ठहरने का वह पुरातन स्थान, गर्जन न करने-वाले मेघो से आवृत, विशाल समुद्र के जेमा ही था।
कंदरा-युक्त पर्वतो में निवास करनेवाले विद्याधर (उस सेना के नर-नारियो को) देखने के लिए आते और उनके सौंदर्य को देखकर यो आश्चर्य में पड जाते थे कि अपने साथी-संगियो को भी भूल जाते थे। इस प्रकार सुन्दर राजकुमारो और तरुणियो के जम-घट से वह सेना ऐसी लगती थी, मानो अमरलोक ही भूल से धरती पर उतर आया हो।
तरुणियाँ अपने स्थान पर आने के पूर्व ही (मार्ग की थकावट के कारण) लेटे हुए पुरुषो से रूठ जाती थी। वह मान उनके सौंदर्य को बढा देता था। तब वे कभी तोते से मधुर भाषण करने लगती, कभी अपने नूपुरो से मधुर नाद उत्पन्न करती हुई, धूप को भी लजानेवाली अपनी स्वर्णिम काति को आगे-आगे फैलाती हुई चलने लगती, मानो मयूरो का झुड ही विहार कर रहा हो।
कुछ वीर पुरुष जब अपनी भुजाओ के जैसे ही उन्नत उस (चन्द्रशैल) पर्वत के पश्मिरो को निहारते हुए भयकर सिंहो के समान घूमते थे, तब उनके उभय पदो के वीर-वलय बज उठते थे उनके पुष्पहारो पर के भ्रमर शब्द करते हुए उड जाते थे. उनके पार्श्व
बालकाण्ड १११
में खड्ग् चमक उठते थे और लाल रत्न जड़े हुए उनके अंगद रह-रहकर दीप्तिमान् हो उठते थे।
(धरती को चारो ओर से) घेरकर पड़े हुए समुद्र जैसे उज्ज्वल रत्न-भरित स्वर्णिम (मेरु) पर्वत को पकड़ने के लिए आ पहुँचे हो, उसी प्रकार वह सेना उमड़कर आई और उस पर्वत-प्रांत मे ठहर गई। अब हम उस चन्द्रशैल के रूप का वर्णन करेंगे, जिसे राजागण, उनकी पत्नियाँ, राजकुमार और लता-समान कुमारियाँ-सब मिलकर देखनेलगे थे।
दीर्घ दंतवाले गज, अपनी तालवृन्त-सदृश सूँड़ो को बढाकर, स्वर्गलोक मे स्थित कांतिपूर्ण कल्पवृक्ष की ऊँची शाखाओ को, जिनपर अनेक भ्रमर संगीत गाते हुए नृत्य करते रहते थे, पत्तो सहित तोड़कर अपने प्राण-समान हथिनियो को दे देते थे।
प्रवाल-सम लाल मुँह, जिनसे राग विकसित होते थे, तथा शीतल कुवलय-पुष्प-समान नयनो से युक्त कुरिंजि-प्रदेश (पार्वत्य-प्रदेश) की सुन्दरियो को ऋतु-परिवर्त्तन की सूचना देनेवाले भ्रमर ‘वेंगे’ (नामक) वृक्ष के पुष्पो से अघाकर गगन के नक्षत्रो पर यह सोचकर लपक पड़ते थे कि ये भी नवमधु देनेवाले ‘सुरपुन्ना’ के फूल हैं।
‘नक्षत्र’ नामक हथिनी-सहित ‘श्वेत चन्द्र’ नामक हाथी अपनी दोनो कोटियो (धनुष की नोक) रूपी सुन्दर वक्र दंतो से मधु-धाराएँ बहा देता था (अर्थात्, उस पर्वत के शहद के छत्तो में चन्द्र अपनी कोटियो को गड़ाकर उनसे मधु-धाराओ को बहा देता था)। वे धाराएँ नालो के रूप मे बह चलती थी। खेती करनेवाले किसान उन धाराओ का मार्ग बदलकर उनमें आकाशगंगा के जल को बहा देते और उससे धान के अपने खेतो को सींचते थे।
उस पर्वत को लाँघ न सकने के कारण उसकी तलहटी मे ही अटककर रह जाने-वाले चन्द्रमा-रूपी मुकुर में एक ओर से (धरती पर रहनेवाली) पर्वत की स्त्रियाँ अपने शृङ्गार को प्रतिबिंबित देखती थी, तो दूसरी ओर से (स्वर्गलोक मे रहनेवाली) अप्सराएँ अपना सौंदर्य देखती थी।
वहाँ के पर्वतीय पुरुष, अपनी उन सुन्दरियो के ललाट के साथ चन्द्रमा की तुलना करके देखते थे जिन (रमणियो) के नेत्र उस शूलायुध के समान थे, जो हवा निकालने-वाली भाथियो की धधकती आग मे तपाये बिना तथा धार पर विष और तेल चढ़ाये बिना भी प्राण हर लेनेवाले थे।
(वहाँ के झोपड़ों के) आँगन मे भयंकर सिंह-शावक सुन्दर हथिनियो के जाये हुए बच्चो के साथ खेलते रहते थे। वक्र बालचन्द्र भी उज्ज्वल ललाट-युक्त पर्वत-जाति की नारियो के बच्चो के साथ खेलता रहता था।
उस पर्वत के इन्द्रनील से भरे तटो पर तथा वहाँ के विद्याधरो के केश-भूषित सुन्दर शिरो पर, क्रमशः अंजन-पर्वततुल्य गजो को मारनेवाले कठोर सिंह के दृढ चरणों के (लाल) चिह्न तथा (विद्याधर) स्त्रियो के महावर-लगे कमल-चरणो के लगने से उत्पन्न आर्द्र चिह्न दिखाई दे रहे थे।
यहाँ की रमणियों इस प्रकार गाती थी कि सुन्दर मीन जैसे उनके नयन कानो
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को न छूकर स्थिर रह जाने थे। उनके दाँतो की चमक बाहर नही दिखाई देती थी। उनके दीर्घ केश बघन से मुक्त होकर खिसक नही पडते थे। उनकी भौंहे टेढी होकर नही मिलती थी। अपनी पुष्प-कोमल हथेली ओर अपने स्वर को सँवारकर ( वीणा के ) तारो को मेडती हुई वे अमृत वर्षा-सी करती थी। उनके उस सगीत को सुनकर किन्नर भी विस्मय-विमुग्ध हो जाते थे।
मधु बहानेवाले पुष्प-हारो से भूषित तथा कानो के साथ संबंध जोडनेवाले करवाल-तुल्य नयन से युक्त तरुणियाँ जब स्फटिक-वेदिकाओ पर आसीन होती थी, तब उन धवल शिलाओ से उत्पन्न जलधाराएँ उन तरुणियो के कुकुम-लेप से मिलकर ऐसी लगती थी, मानो असंख्य रत्नों के बने चषको मे मद्य भरा गया हो।
अपने पतियो के प्राणो को व्याकुल करती हुई, अजन-युक्त अश्रु बहाती हुई, रूठ-कर आँखें लाल करती हुई देवस्त्रियों ने अपने केशो से मदार-पुष्पमालाओ को निकालकर फेंक दिया था। वे अम्लान ओर मधु भरी मालाएँ उस पर्वत पर यत्र-तत्र शोभायमान थी।
आम्रपल्लव के रंगवाली पहाड़ी स्त्रियाँ मुकुलित क्रमुक-पत्रो में पुष्पमालाएँ डालकर अपने केशो के साथ उनकी तुलना करके देखती थी। आभरण-भूषित देवांगनाएँ अपने अग्नि-जैसे चमकते रत्न-खचित 'कटक' (नामक आभूषणो) को उतारकर 'कोंदल' (नामक पौधे) के पुष्पों को पहना देती थी और अपने करो के साथ उनकी तुलना करके देखती थी।
तीर चढाये हुए धनुष के जैसी स्पंदित भौहो के साथ ( वीणा ) तत्री से एकस्वर होकर मधुर गान करनेवाली तथा मयूरो के साथ नाचनेवाली देवस्त्रियाँ (अपने प्रियतमो से) मान करती हुई अपने रत्नहारो को उतारकर फेंक देती थी। ( उस पर्वत पर के ) वानर उन हारो को उठाकर पहन लेते थे और वानरियाँ उन्हे देख-देखकर आनदित होती थी।
ऊँचे बढे हुए चदनवृक्षो से युक्त सानु-प्रदेशो मे स्थित गैरिक के लगने के कारण मनोहर दिखाई देनेवाली लोभ-भरी हथिनियाँ महावर लगाये हुए-सी दीखती थी। (उस पर्वत पर के) उज्ज्वल पद्म-रागो की लाल काति (किरणे) फैलने से वहाँ के आकाश पर सदा लाली छाई रहती थी।
पृथ्वी के अलकरण के निमित्त किरण-पुज-विशिष्ट मुक्ताओ को बिखेरती हुई, पार्वती के प्रियतम ( शिवजी ) के शिर पर जो गगा उतरी थी, उसकी समानता करती हुई अनन्त स्वर्ण को बहाती हुई, मोतियो के साथ आ गिरनेवाले निर्झरो की पक्तियों ( उस चन्द्रशैल पर) ऐसी दृष्टिगत होती थी, जैसे त्रिविक्रम के वक्ष पर उत्तरीय वस्त्र लहरा रहे हो।
'सुरपुन्ना' के पुष्पो के साथ लवग-पुष्पो को भी सम्मिलित करके पहननेवाले तथा मत्त भ्रमरो को उड़ाकर शुद्ध मधु का पान करनेवाले ( वहाँ ठहरे हुए ) उन लोगो ने अश्व-मुखी देवताओ को देखा, जो किन्नर-मिथुनो के संगीत सुनकर अपना प्रणय-कलह त्याग देते थे।
उन लोगों ने देखा कि अत्यत मुदित युवको के सुन्दर वक्षो पर आघात करनेवाले स्तन-युगल जैसे अनुपम 'कोङ्गु' वृक्ष की कलियो के निकट ही, रमणियों की ही कटि के समान
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के समान (पतली) शाखाएँ लचक रही हैं। उनमें भ्रमरियाँ और (उन लोगों के) केशों पर मंडराने की प्रकृतिवाले चंचरीक नव विवाह का संबंध जोड़ रहे हैं।
(उस पर्वत पर के) जलाशय को स्फटिक-मय स्थल समझकर, चूडामणि से सुशोभित, सुन्दर कण्ठ तथा उज्ज्वल चंद्र जैसे बदनवाली (रमणियाँ) शीघ्रता से वहाँ चली जाती हैं और अपने उत्तरीय तथा कटि-वस्त्र को जल से भिगो लेती हैं। वह दृश्य देखकर वीर-वलयधारी युवक ताली बजाकर हँस पड़ते थे।
(उन लोगों ने) अनेक पुष्प शय्यायें देखीं। (बिखरी हुई) पुष्पमालाएँ देखीं। मनोहर बीरबहूटी-जैसी पान की पीक पड़ी देखीं। प्राणों से भी अधिक प्यारे पतियों के विरह में मूर्च्छित विद्याधर-स्त्रियों के लेटने से झुलसी हुई पल्लवों की सेजें भी देखीं।
(उन्होंने देखा कि) देवांगनाएँ सुगन्ध भरे (पुष्पमय) स्थलों पर मृत नहीं हैं। उन देवांगियों के नीलकमल-जैसे नेत्र अत्यन्त चंचल ही बन रहे हैं। उनके प्रवाल-जैसे मुँह पर मन्द हास बिखर रहे हैं। उनके रभसे हुए पीन स्तनों पर अमूल्य रत्नहार डोल रहे हैं। मधुमत्त भ्रमर उनके केशों के मध्य शब्द करते हुए उड़ रहे हैं और उनके रत्न-खचित कर्णाभरण डोल रहे हैं।
अपनी लज्जा को धन के लिए बेचनेवाली, स्वर्ण-आभरण पहने हुई (वार) नारियाँ, जिस प्रकार किसी पुरुष की सारी संपत्ति अपहरण करने के पश्चात् उसे सारहीन समझकर निराकृत कर दूर कर देती हैं, उसी प्रकार सुन्दरवदना नारियों के प्रवाल-दशनों के दाग; विविध मद्यों का पान किये जाने के उपरान्त, लुढ़काये हुए मधु-पात्रों को (उन लोगों ने) देखा।
रात्रि को दिन बनानेवाले प्रकाश से युक्त स्फटिक की गुफाओं पर, अति विशाल पुष्ट भुजाओंवाले देवगण जब धनुष को परास्त करनेवाली भ्रूकुटि-युक्त अप्सराओं के साथ रति-क्रीड़ा करते थे, तब उपेक्षा से दूर फेंके गये कल्पक-पुष्पहारों और अन्य आभरणों को (उन लोगों ने) यत्र-तत्र पड़े देखा।
उस सेना की रमणियाँ कभी हथेली के-जैसे विकसित होनेवाले उत्पल की कली को देखकर उसे फनवाला सर्प समझ लेतीं और डर से अपनी मृग-जैसी आँखों को मूँद लेती थीं। (कभी) चिकने हीरे-भरे पत्थरों में पुष्पों के प्रतिबिम्बों को देखकर उन्हें वास्तविक पुष्प समझ लेतीं और अपने पतियों से उन पुष्पों (प्रतिबिम्बों) को ला देने की प्रार्थना करती थीं।
कभी वे स्त्रियाँ अशोकवृक्ष के मनोहर पल्लवों को अपने नखों से नोंचकर छोटे-छोटे टुकड़े बना डालतीं और उन्हें अपने स्तन-तटों पर चिपकातीं। कभी वे मधु-युक्त पुष्पों को चुनतीं, कभी कान्तिमय रत्न-भरे उस पर्वत पर हंसों के समान विशाल तालों में गोते लगातीं।
[यहाँ से आगे नौ पद्यों तक मूल में यमक की अति सुन्दर छटा दिखाई गई है, अतः अर्थ की अपेक्षा शब्द-गुंफन पर कवि का अधिक ध्यान रहा है।]
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उस पर्वत का मध्य भाग, जो आम के कोमल पल्लव के समान चमकता था, वह (वास्तव में) सोने का पत्र ही था। उसके (पर्वत के) दोनों पार्श्वों में हरिण, हाथी, सर्प आदि जन्तु तथा स्त्रियों के कंधों जैसे बाँस, पुन्नाग आदि के वृक्ष लगे थे।
अंधकार-सदृश वराहों के शरीर पर (वहाँ रहनेवाली रमणियों के द्वारा उत्पादित) जो कुंकुम-पंक लग जाता, उसे वे आम, चंदन आदि के पेड़ों पर रगड़कर हटा देते थे। देवस्त्रियों-जैसी मधुरभाषिणी उन रमणियों के कारण वह विशाल पर्वत-प्रदेश स्वर्ग के ही सदृश था।
वहाँ (चारे की खोज में) बड़े-बड़े सर्प संचरण करते थे, तो बड़े-बड़े बाँस जड़ से उखड़कर गिर पड़ते थे। वन्य-मृगों के भागने से धूलि उड़ने लगती थी। वहाँ के झरने मुक्ताओं को साथ लेकर बड़े शब्द करते हुए बह चलते थे।
प्रशस्त करवाल के-जैसे कठोर सिंहों की समानता करनेवाले (पुरुषों) की सुन्दर भुजाओं पर, उज्ज्वल तथा लाल रेखायुक्त रमणियों के आभरणालंकृत स्तन लगने से तथा उन स्तनों पर के अगरु-चंदन का लेप और मुक्ताहार लगने से (वे भुजाएँ) जिस प्रकार शोभित होती थीं, उसी प्रकार उस पर्वत-प्रदेश पर चंदन, कुंकुम आदि के वृक्ष शोभायमान थे।
घने अरण्य से आवृत्त उस पर्वत पर रहनेवाला केले का वन वहाँ संचरण करती हुई देवनारियों की ऊरुओं के सदृश था, वहाँ की (वन्य) स्त्रियाँ, किन्नरों की-सी मधुरनाद-युक्त वीणा का वादन करती थीं।
मत्तगजों के मदजल का प्रवाह बड़े वनस्पतियों को गिराता हुआ बह रहा था, जिसमें यत्र-तत्र स्थिर पड़े हुए वृक्ष दिखाई देते थे, दूसरी ओर पहाड़ी नदियों में जल पीने के लिए पहाड़ी बकरे तथा अन्य मृग चलते हुए दिखाई पड़ते थे।
बाघों के निवासभूत पर्वत-प्रदेशों में बड़े बड़े 'पटह'¹ यह सूचना देते हुए बज रहे थे कि अब पर्वतवासी काले रंग की नारियों के द्वारा कंद-मूल खोदकर निकालने का समय आ गया है।
बलिष्ठ गज जब उस पर्वत के जलाशय में डुबकी लगाते थे, तब (तट पर के) शीतल वटवृक्ष और सरोवर की कमललताएँ विध्वस्त हो जाती थीं, उग्र सिंह जहाँ टहलते रहते थे, ऐसे घने जंगलों से आवृत्त उस पर्वत पर देवबालाएँ आराम करती थीं तो भ्रमर उनके केशों में आनंद से बैठे रहते थे।
उस पर्वत के ऊपर मेघ-पंक्तियाँ आकर ठहरती थीं, निचले भाग में पुष्प-श्रेणियाँ भरी रहती थीं। वह पर्वत ऐसा था, जैसे विष्णु अपने हृदय पर लक्ष्मी को धारण किये हुए विराजमान हों।
पुष्पों पर मँडराते हुए मधु का पान करनेवाले भ्रमरों के समान ही, तरुण और तरुणियाँ घुल-मिलकर उस ऊँचे पर्वत के तट-प्रदेशों में क्रीड़ाएँ करते थे।
(वहाँ रहनेवाले नर-नारी) उस पर्वत से उतरकर नीचे आने का विचार भी इस-
¹ पहाड़ी जाति के लोग कंद निकालने का मौसम आने पर चमड़े के विविध बाजों को बजाने लगते थे।
बालकाण्ड ११५
लिए नही करते थे कि उस विचार-मात्र से उन्हें अत्यन्त पीडा होती थी। जिस प्रकार अपवर्ग-लोक में पहुँचे हुए मुक्तजन उस लोक के सुखानुभव के अतिरिक्त अन्य कोई विचार नही रखते; उसी प्रकार वे लोग उस पर्वत के ही वैभव मे लीन रहते थे।
मेघों का विश्राम-स्थान बना हुआ वह पर्वत हाथी के सदृश था। गगन पर संचरण करता हुआ उष्ण किरणोंवाला सूर्य उस हाथी पर आक्रमण करनेवाले सिंह के सदृश था। नभ, जो सूर्यास्त के समय की लालिमा से भर गया था, सिंह के आघात से बहनेवाले रक्त के सदृश था।
बड़ी-बड़ी शाखाओ से युक्त वहाँ के वृक्ष नभ-लालिमा के प्रकाश मे ऐसे लगते थे, मानों वे नये पल्लवों के भार से लद गये हों। अपने ऊपर सर्वत्र उस लालिमा के पड़ने से वह पर्वत रत्नों के पहाड़ जैसा लगता था।
नेत्रों को रमणीय दीखनेवाले दृश्यों तथा असंख्य शिंगों के कारण वह सुन्दर पर्वत मनोहर चन्दन-रस से लिप्त वक्षवाले श्यामल (विष्णु) भगवान् के सदृश था।
प्राण एवं शरीर के तुल्य परस्पर (प्रेम से भरे वे नर-नारी) गुंजार भरते हुए मँडरानेवाले मधुपायी भ्रमर कुल के साथ, उस उन्नत पर्वत के प्रात मे आ ठहरे, जैसे के हाथी और हथिनी, सिंह और सिंहिनी, या हरिण और हरिणी ही हों।
गगन में संचरण करनेवाला, एकचक्रविशिष्ट रथवाला सूर्य-रूपी सिंह, जो तीक्ष्ण ताप-जनक हथियाला है जिसके किरण-रूपी केसर हैं, जिनमें दूसरों के फेंके हुए तीर भी (छिपकर) खो जाते हैं तथा जो क्रोध से दूसरों का विनाश करनेवाला है—अब अस्ताचल में प्रविष्ट हुआ। उसके अस्त होने पर घना अन्धकार, जो सिंह के डर से कहीं दूर छिपा हुआ था, हाथियों के झुण्ड के समान बाहर निकला और सर्वत्र फैल गया।
मन्दार-पुष्प की सुगन्ध एवं मधु-भरी मालाओं से अलंकृत चक्रवर्ती (दशरथ) की सेना-वाहिनी रूपी गरजते हुए समुद्र मे सर्वत्र दीपमालाएँ जल उठीं; मानों लाल कमल खिल उठे हों।
शीतलता-युक्त रमणीय समुद्र की झाग-भरी वीचियों में से निकला हुआ उज्ज्वल चन्द्रमा, नक्षत्रों से घिरा हुआ गगन में आकर चमकने लगा; मानों रुचिर चन्द्रिका के सदृश (उज्ज्वल) बालुका पर, कान्तिमय मुक्ताओं के साथ धवल शंख संचरण कर रहा हो।
मत्स्यों की दुर्गन्धि से पूर्ण समुद्र ने एक धवल चन्द्रमा को पा लिया था, जिसे देखकर, ईर्ष्यावश, उस सेना-समुद्र ने भी देवनारी-सदृश अपनी तरुणियों के मुख-रूपी असंख्य चन्द्रमाओं से अपने को प्रकाशित कर लिया।
जहाँ-जहाँ नर्तकियाँ नर्त्तन कर रही थीं, वहाँ-वहाँ 'मार्जन' करने के कारण मृदुंग हुए मृद्वल (वाद्यों) का नाद, गायिकाओं का संगीत-नाद, संगीत के आलाप के अनुकूल बजनेवाली तत्रियों का नाद, हाथों से ताल देने से उत्पन्न नाद, गाँठदार बाँसुरी का नाद—ये सभी नाद इस प्रकार उमड़ उठे कि स्वर्ग के निवासी भी आश्चर्य से चकित हो गये।
ठंडक के लिए रत्नाभरणों को हटाकर अपनी सखियों से प्रकाशमान मुक्ताहारों को लेकर अपने वक्ष पर पहननेवाली तथा अगरु-धूम से (पत्रभंगों को) सुखानेवाली (वहाँ
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की रमणियाँ) शीतल मधु-भरी मल्लिका-मालाओ को हटाकर सुगन्ध-युक्त तथा घने दलोवाले 'करुमुहै' (वृक्ष) के पुष्पहारो को पहनने लगी।
(उस पर्वत मे) नये-नये (पकड़कर) लाये गये हाथियो को बाँधनेवाले लोग जो गीत रचकर गाते थे, उनका शब्द कही सुनाई पड़ता था, कही मद्य पीकर मत्त हुए पुरुष अपनी प्रेयसियों के साथ जो प्रलाप कर रहे थे, उसका शब्द था, कही वेश्याओं की मेखला का शब्द था और कही मदोन्मत्त गजो के बेसुध हो चिंघाड़ने का शब्द हो रहा था।
रसना के द्वारा अपेय, अमृत-समान रतिशास्त्र के विषय का अनुभव करने, दुर्लभ अमृत-जैसी रमणियो के हृदय मे उत्पन्न मान को दूर करने, राग-युक्त गीतो को श्रवण कर उनके भाव को नयनो के नृत्याभिनय मे देखने आदि कार्यों मे ही (उनलोगों की) वह रात्रि व्यतीत हुई। (१-७७)
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अध्याय १५
पुष्प-चयन पटल
नक्षत्रो से पूर्ण रात्रि-रूपी खड्ग-दतवाले हिरण्यकशिपु पर क्रोध करके, पुञ्जीभूत उष्ण किरण-रूपी सहस्र करों को बाहर निकाले हुए, अपने उदयस्थान भूतपर्वत-रूपी सोने के स्तम्भ से, उज्ज्वल सूर्य-रूपी नरसिंह¹ निकले।
नित्य कर्मो को पूरा करने के उपरात, (दशरथ) चक्रवर्ती ने जब प्रस्थान किया, तब सभी राजा लोगो ने खडे होकर नमस्कार किया। फिर, उनकी सेना-वाहिनी चलकर उस शोण नदी के निकट पहुँची, जिसके तटो के ऊँचे टीलो पर लहलहाते वन थे, टीलो के नीचे तलैयो मे 'ककुनीर' (नामक लताएँ) फैली हुई थी और जिसके घाटो मे कमललताएँ फैली हुई थी।
उस (शोण नदी के) स्थान पर पहुँचकर सारी सेना विश्राम करने को ठहर गई, (उधर) सूर्य भी गगन-मडल के मध्य जा पहुँचा, राजा और राजकुमार अपनी-अपनी स्त्रियो के साथ, स्वच्छ जलाशयों से शोभायमान शीतल तथा सुगंधित उद्यान में, भ्रमरो के विश्राम भूत कोमल पुष्पो का चयन तथा जलविहार करने के लिए गये।
(उस उद्यान में, उन सुन्दरियो को देखकर) मयूर वहाँ से कदाचित् यह सोचकर दूर हट गये कि (वे सुन्दरियाँ) भ्रू-रूपी सुदृढ धनुष के द्वारा अरुण रेखाओं से युक्त काली आँखे-रूपी बाण चलाकर कही उन्हे आहत न कर दें। वे तरुणियाँ जब मञ्जुल नूपुरों को बजाती हुई डग भरती थी, तब हस (पुष्पो के मध्य) छिप जाते और गानेवाले भ्रमर (उन पुष्पो से) गुजन करते हुए बाहर-उड़ जाते थे। ऐसा लगता था, मानो वे हस (उन तरुणियो की पदगति से) लज्जित हो पलायन कर रहे हो।
१. इस पद्य में रात्रि को हिरण्यकशिपु और सूर्य को नरसिंह-रूप बतलाया गया है।
बालकाण्ड ११७
वे रमणियां अपनी सखियो के साथ मिलकर, अपने अग लचकाकर नाचने लगीं; तो पीले सोने के बने 'शुक्ल' (नामक कर्णाभरण) तथा भव्य 'कुलैं' (नामक कर्णाभरण) एक साथ चमक उठे और (उनकी पुष्प-मालाओ में) बैठे हुए भ्रमर उड़कर गुंजार भरने लगे ।
उन (नाचनेवाली स्त्रियों) को देखकर सुगन्धित पुष्प-मालाओं से शोभित वक्ष-वाले पुरुष उन लता-सदृश नारियों को पुष्पित लताओं से पृथक् नहीं पहचान पाते थे और भ्रांत होकर खड़े रह जाते थे ।
रत्नों से खचित पीले स्वर्ण के आभरणों में अलंकृत विशाल जघन, संगीतमय भाषण, शीतल पुष्प-मधु से युक्त केश—इनके साथ जब वे रमणियां झुण्ड बाँधकर समीप आतीं, तो उनकी आहट सुनकर ही कोयलें अपना मुँह बंद कर लेतीं। वह उनके डर के कारण नहीं, किंतु लज्जा के कारण ही था। पारखी व्यक्तियों के सामने कौन मुँह खोल सकता है ?
वे सुन्दरियाँ अपने उन नेत्रों से, जो विष से अधिक कठोर होने पर भी अमृत जैसे लगते थे, प्रेम के साथ देखकर और कमल-सदृश अपने करों से पकड़कर ऊँचे चढ़े हुए फूल के पौधों को जब झुकाने लगीं, तब वे पौधे उनके नूपुर-भूषित चरणों पर सुकुमार पुष्पों को बरसाते हुए झट झुक गये। यदि जड़ वृक्षों की यह दशा हो, तो अब कौन ऐसा (चेतन) व्यक्ति होगा, जो लतातुल्य सूक्ष्मकटिवाली (स्त्रियां) के निकट झुके बिना रह सके ?
कमल-पुष्प पर आसीन (लक्ष्मी) देवी-जैसी उन (सुन्दरियों) के मनोहर कमल-सदृश करों से छुए जाने पर सुरभित पुष्पालंकृत केशवाले पुरुषों की पर्वत-समान भुजाएँ भी, जिनके बल से भयंकर सिंह भी डर जाते हैं, झुककर रह जाती हैं, तो क्या यह भी कहने योग्य कोई विशेष बात है कि विकसित सुमनवाले पौधे (उन सुन्दरियों के स्पर्श से) झुक जाते हैं ?
मधुर नाद करनेवाले भ्रमरों ने देखा कि पुष्पलताएँ, नदियों या तालाबों से उत्पन्न न होनेवाले (उन रमणियों के) चन्द्रमुख-रूपी कमल-पुष्पों को कुवलय-पुष्पों के साथ खिलाये हुए खड़ी हैं, (अर्थात् वे स्त्रियाँ लतातुल्य हैं, उनके वदन कमल और नेत्र कुवलय हैं)। आश्चर्य में डूबे वे भ्रमर (उन मुख, कमलों पर) ऐसे मँडराने लगे कि उड़ाने पर भी नहीं उड़ते थे। जो नवीनता के प्रेमी होते हैं, वे नई वस्तु को देखने पर क्या, उन्हें छोड़ देंगे ?
कुछ लताएँ झुक-झुक जाती थीं; तो कुछ पुष्पित वृक्ष हाथ की पहुँच से भी ऊँचे होकर ऐसे खड़े रहते थे, जैसे रूठे हुए हों और झुकना नहीं चाहते हो। वह दृश्य ऐसा था, जैसे दृढ़ पर्वत-सदृश पुष्ट भुजाओंवाले उज्ज्वल शरीरवाले, विकसित पुष्पहार धारण करनेवाले पुरुषों के मध्य मयूर-सदृश कुछ (नारियाँ) खड़ी हों।
पुष्पों के चुन लिये जाने पर शोभाहीन होकर म्लान दिखाई पड़नेवाली (शाखाओं को) देखकर चित्र की प्रतिमा (जैसी वे रमणियाँ) सोचती थीं कि ये (शाखाएँ) हमारे पतियों की दृष्टि में सौंदर्यहीन लगेंगी; इसलिए वे अपने रत्नहार, मुक्तामाला, मेखला, कर्णाभरण आदि उतारकर उनको पहना देती थीं और उन शीतल तथा सुकुमार शाखाओं को प्यार-भरी दृष्टि से देखती रहती थीं।
११८ | कंब रामायण
घने पुष्पो मे बैठकर मधु का पान करके सचरण करत रहनेवाले भ्रमर, अब सुगन्धित पुष्प मालाओ तथा कलियो को भी उतार देनेवाली (स्त्रियो) के रीते (खाली) केशों मे ही रमने लगे और अपने प्रेम के पात्र पुष्पो पर नही जाते। बडे लोग उत्तम स्थान मे ही सभी भोग्य विषयो का अनुभव करतें हैं।
अपने शरीर-सौंदर्य के कारण, पुष्पासीन (लक्ष्मी) देवी का भी श्रृंगार बनने-वाली (एक सुन्दरी), धवल स्फटिक-शिला मे, कर मे पुष्प लिये दिखाई पड़नेवाले अपने ही प्रतिबिब को देखकर समझ बैठी कि यह कोई अन्य स्त्री है, जो मेरे पति की प्राण-समान प्रेयसी है। वह (अपने) दीर्घ नेत्रो से अश्रु वहाती हुई हाथ से पुष्प लिये वैसे ही खडी रह गई।$^१$
मेघो से घिरे हुए चन्द्र के समान मुखवाली, अनुपम पुष्पलता-तुल्य (एक नारी) ने देखा कि एक राजा अपनी भुजा पर का पुष्पहार उतारकर मयूर-तुल्य किसी (नारी) को पहना रहा है, तब वह कचुक के खुल जाने पर कटि को लचकानेवाले (भारी) स्तनो के अग्रभाग पर, शूल-जैसे नेत्रो से अश्रुवर्षा करती हुई $^२$ वही खडी रही।
एक प्रेमी राजा मयूर की-सी गति से आनेवाली अपनी प्रेयसी के मन की परीक्षा करने की इच्छा से उस सुन्दर उद्यान के एक माधवीलता-कुञ्ज मे जा छिपा। अपने पति के साथ निरंतर रहनेवाली वह सुन्दरी, जो इसके पहले कभी उससे विलग न हुई थी, व्याकुल होकर भटकने लगी, मानो प्राणो की खोज मे शरीर चक्कर लगा रहा हो।
एक नारी, जो घृतसिक्त शूल धारण करनेवाले (अपने) पति से मान करके, इस प्रकार हो गई थी कि उसकी काजल-अंकित काली आँखो मे बहुत लाली उत्पन्न हो गई थी, अपने हाथ की पहुँच से ऊँचे रहनेवाले पुष्पो को देखकर एक कोयल से हाथ जोड़कर विनती करने लगी कि इन पुष्पो को मेरे लिए तोड दो। (मान के कारण पति से न कहकर कोयल से कहती है)।
ऊँचे नारियल के पेड़ पर लगे हुए फल को देखकर एक युवक ने कहा—'आह ! ये (फल) तरुणियो के स्तनो$^३$ के समान हैं'। (यह सुनकर) एक मुग्धा, जो उसकी पत्नी थी, 'ये नारियल किस नारी के स्तनो के-जैसे है ?' यह सोचती हुई क्रुद्ध हुई, सिसकियाँ लेने लगी और स्वेद-सिक्त होकर ठंडी आहे भरने लगी।
युद्ध का संदेश पाते ही फूल उठनेवाली पर्वत-जैसी बलिष्ठ तथा सुन्दर भुजाओ से युक्त मन्मथ-समान अपने पति को पुष्प तोड़ते हुए देखकर, जलद-सदृश केशवाली और
१ इसमें यह अर्थ ध्वनित होता है कि उस स्त्री का पति स्फटिक-शिला में उस नारी का प्रतिबिंब देखकर उसी को अपनी प्रेयसी समझ लेता है और उससे प्रेम करने लगता है। इसपर उसकी प्रेयसी उस प्रतिबिंब को अन्य नारी समझकर रुष्ट होती है।
२ यह विरहिणी नायिका है, अत अपने-पति के स्मरण में अश्रु वहाती है।
३ 'तरुणियो के स्तन'—बहुवचन के प्रयोग से इस मुग्धा नायिका को संदेह हुआ कि उसका पति अन्य स्त्रियो से प्रेम करता है।
बालकाण्ड ११६
कोकिल-जैसी बचनवाली उस स्त्री ने निकट आकर उसकी आंखे बंद की, तो उस (पुरुष) ने पूछा—'कौन है?'¹ इसपर वह (नारी) अग्नि के जैसे निःश्वास भरने लगी।
एक राजा मधु-भरे नवविकसित पुष्पों को (अपने हाथ मे) लिये हुए खड़ा था। तब अनेक नारियो ने पंक से अनुत्पन्न, सुगन्धित रक्तकमल-जैसे, अपने करों को एक साथ (उन पुष्पों को लेने के लिए) आगे बढ़ाया, तब वह राजा उनके मध्य, याचकों को कुछ न देनेवाले और 'नाही' भी न कहनेवाले कठोर लोभी के समान ही खड़ा रहा। (एक को देने पर अन्य सुन्दरियाँ रूठ जायेंगी, इस आशंका में पड़ा हुआ वह खड़ा रहा।)
कज्जलांकित नयनोंवाली एक (रमणी) ने अपने सामने ही अपने प्राण-समान प्रभु को किसी दूसरी (स्त्री) का नाम लेते हुए पाया, तो उसने चुभनेवाले शूल जैसी (तीक्ष्ण) दृष्टि से उसकी ओर देखा और वास्तविक लज्जा के भार से दबी हुई, सिर झुकाये, रोती हुई, कोमल पुष्पों को हाथ में लेकर सूंघा, तो उसके निःश्वास के स्पर्श से (वे पुष्प) झुलस गये।
विजयशील रथवाला एक नरेश, जिसके सौंदर्य को देखकर उसकी कुलीन पत्नियो के मनोज्ञ कमलोपम वदन पर के काजल-लगे नयन मुग्ध हो जाते थे, इधर-उधर घूमता हुआ उस महामत्त गज के समान लगता था, जिसके मदजल पर आसक्त हो भ्रमर मँडरा रहे हों।
अनिन्दनीय रूप-युक्त एक नृपति ने, सन्ध्याकालीन उज्ज्वल अर्धचन्द्र के जैसे ललाटवाली (एक पत्नी) को तथा वन्दनीय पातिव्रत्य-युक्त (दूसरी पत्नी) को (अपने लाये गये पुष्पों में से) आधा-आधा भाग बाँटकर दिया, तो वे दोनो उन सुकुमार पुष्पों को नीचे फेंककर, आँखे लाल करती हुई ऐसे लौट चलीं, जैसे कलाप-युक्त मयूर जा रहे हों।²
एक नारी उस उद्यान में, सर्वत्र मधु वहानेवाले सुगन्धित पुष्पों की खोज में इस प्रकार घूमती रही कि सहज गन्ध से युक्त अपने खुले हुए केशों की भी उसे सुध नहीं रही, अपने वस्त्रों का भी उसे ध्यान नहीं रहा, अपने मुक्ताहारों के टूट जाने से दूर-दूर तक बिखरते हुए मोतियों की भी परवाह नहीं रही। (लोग उसे देखकर सोचने लगे) यह अपने प्राणों को खोज रही है या ओर कोई वस्तु ढूँढ़ रही है?
'याल्' (वीणा)-जैसी स्वरवाली तथा लक्ष्मी देवी-जैसी (एक नारी) अतुलनीय बलशाली (अपने पति) नरेश के (प्रेम की भिक्षा मे) झुके खड़े रहने पर भी स्वयं झुकी नहीं (अर्थात्, द्रवित नहीं हुई), फिर उस राजा के निराश होकर चले जाने के पश्चात् वह द्रवितमन हुई। अब अत्यन्त व्याकुल हो गम्भीर चतुर विचार करती हुई पहले उस राजा के स्थान पर अपने तोते को भेजा और (उसकी खोज करने के बहाने से) उसके पीछे-पीछे स्वयं चल पड़ी।
सुन्दर पुष्प-माला से विभूषित वक्ष पर मन्मथ के पाँच बाण शत सहस्र होकर
१. यह ध्वनि है कि पुरुष के प्रश्न करने पर वह नारी यह आशंका कर रही कि इसकी अन्य प्रेमिकाएँ भी है, इसीलिए वह मेरा कर-स्पर्श पहचान नहीं सका है। २. यह अर्थ ध्वनित है कि दोनों पत्नियाँ अपने-अपने मन में अबतक यह सोचे हुए थीं कि नृपति उसी को अधिक चाहते हैं, किन्तु अब पुष्प बाँट देने से वह विचार गलत प्रमाणित हुआ, जिससे दोनों क्रुद्ध हो गईं और रूठकर चली गईं।
| १२० | कंब रामायण |
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गिरने लगे, जिससे एक नृपति का मन विचलित हो उठा। वह कर्त्तव्यविमूढ हो माधवी-लता से पूछने लगा कि क्या तुम मन्दार-पुष्प नहीं दे सकती हो ? (अर्थात्, उन्मत्त-सा प्रलाप करने लगा)। इस प्रकार, वह चन्दनाक्त स्तनों एव पुष्पालीकृत केशोंवाली (अपनी प्रेमिका) के लिए विह्वल हो खड़ा रहा।
एक सुन्दरी ने (अपने पति मे) कोई अपराध जान-बूझकर ढूँढ़ निकाला, जिससे वह अशमनीय कोप से भर गई और मान करने लगी। जब उसके पति ने उसके मान को देख लिया, तब वह प्रकट आनन्दित हो उठी। वह वहाँ से दूर चली गई और सुगन्धित पुष्पों को ढूँढ़-ढूँढ़कर उनकी माला बनाकर पहन लिया किन्तु मान की आशंका से (अपनी पति के वापस न आने के कारण) आईने मे अपना सौन्दर्य देखकर दुःखी होने लगी।
एक विरहिणी कहने लगी—मैं ऐसा अलकार नहीं कर सकी, जिसको देखने के लिए मेरा वह पति आ जाता; जिसके हाथ में यमराज को भोजन देनेवाला शूल रहता है । अब मै इस शरीर के साथ जीवित नहीं रहना चाहती। इस उत्तम साज-शृंगार का क्या प्रयोजन है ? यह कहती हुई वह अपने आभरण इस प्रकार उतारने लगी, जैसे उन्हे गायिका को दे देना चाहती हो (अर्थात्, वह मरना चाहती है और अपने अमूल्य आभरणों को अपने प्रेमपात्र गायिका को दे देना चाहती हों)।
(किसी स्त्री का पालित तोता खो गया था) एक सुन्दरी समीपस्थ पुष्प-शाखा मे छिपे हुए अपने तोते को पकड़ने के लिए द्रवणशील पीत स्वर्ण के चषक को (तोते के लिए कुछ भोजन उसमे रखकर) हाथ मे लिये इस प्रकार बल खाती हुई चलने लगी कि कंचुक-बन्धन में न समाते हुए, उमड़नेवाले स्तनों का भार वहन करने की शक्ति न होने से उसकी सूक्ष्म कटि लचक-लचक जाती हो।
एक सुन्दरी ने राजहंसिनी को देखा; उसकी पदगति को देखा और उसे बन्धु के समान ही अपने समीप आते हुए देखा। उसने सोचा कि यह मित्रता करने के लिए ही आ रही है, यह मेरी सखी हो सकती है। (फिर उसका सम्बोधन करके) कहा—तुम्हे देखने वाले हसेंगे; (क्योंकि तुम वस्त्रहीन हो) यह उचित नहीं; तुम यह वस्त्र पहन लो,—यह कहकर वह उस हंसिनी को वस्त्र देने लगी।
काकली-जैसी मधुर वचनवाली; नीले वस्त्र धारण किये रहनेवाली एक नारी (नीले पट से) अपने विशाल जघन-तट को देखकर यह सोचने लगी कि यह नाचते हुए सर्प के फन जैसा है और फिर वहीं फिरनेवाले मयूर को देखकर डर गई, (क्योंकि मयूर सर्प पर झपटेगा)। वह झट पुष्प-शाखाओं के मध्य जा छिपी और (लज्जा के कारण) पुष्पित शाखा-सदृश अपने हाथों से नेत्र बन्द किये शिथिल खड़ी रही।
अपना उपमान न रखनेवाली एक सुन्दरी अपनी सखी से यह कहकर कि 'हे स्वर्ण-तुल्य मधु-समान लक्ष्मी-सदृश सुन्दरी, मुझे पहचानो'—उस उद्यान में चयन करने योग्य पुष्पभार से लदे एक कुंज के मध्य छिपी रही, (सखी जब उसे पहचान न सकी¹ तब) 'सब
¹ वह सुन्दरी पुष्पित लताओं से इतना सादृश्य रखती थी कि उस लताकुंज में छिपी रहने पर उसे पहचान न सकी।
बालकाण्ड १२१
तो तुम मुझे देख लोगी'-कहती हुई उसके सुन्दर नीलकुवलय-जैसे नयनों को अपने हाथों से बन्द करके हँस पड़ी ।
एक उत्तम ( नृपति ) धनुष की डोरी को अंगुस्ताने पर लगाये हुए दूसरे बलिष्ठ कर में एक रमणीय कोमल कमल-पुष्प लिये हुए केश-रूपी अन्धकार से घिरे नारियों के मुख रूपी कमल-वन के मध्य अरुण किरण-युक्त सूर्य के समान घूम रहा था ।
खेतों के पुष्ट, स्वच्छ रस से भरे इक्षु-रूपी लाल धनुष को हाथ में रखनेवाले मन्मथ भी जिनसे लज्जित होता था, ऐसे सुन्दर पुरुष अपनी मुग्धा पत्नियों के मीठे तथा प्रीतिजनक दिव्य गानों का ऐसे ही विवेचन कर रहे थे, जैसे वे शास्त्रों का विवेचन कर रहे हों ।
धनुष पर चढ़ाने योग्य यष्टि ( तीर ) हाथ में लिये हुए मन्मथ-रूपी ग्वाला जब उद्यानों के भ्रमरों के नाद की मधुर वेणु बजाकर संकेत देने लगा, तब जैसे संध्याकाल में गायों के झुण्ड के मध्य बड़े-बड़े वृषभ चलते हैं, उसी प्रकार नीलकमल-जैसे काजल-लगे नेत्रोंवाली नारियों के घेरे में राजा लोग चलने लगे ।
मन में ( तपस्या के लिए ) उत्साह से भरे हुए मुनियों के द्वारा यह वचन प्रसिद्ध हुआ है कि 'यदि हमें बचना चाहिए, तो मन्मथ के हाथके धनुष से'--किन्तु ( सच्ची बात यह है कि ) पुष्प-लताओं से पुष्प चुननेवाली ( एक नारी की ) भौंह का एक कोना-मात्र ( उन मुनियों के धैर्य को हिला देने के लिए ) पर्याप्त है । (अर्थात्, मन्मथ के धनुष से भी अधिक कठोर स्त्रियों के भौंह-कमान हैं ।)
पुष्प-गंध से सुवासित केश और रमणीय ललाटवाली एक ( सुन्दरी ) कदम्ब-वृक्ष पर ( पुष्प चुनने के लिए ) चढ़े हुए ( अपने ) पति के मन में जा चढ़ी (अर्थात्, उसके मन में जाकर बैठ गई ) । ( उत्तरोत्तर ) विकसित होनेवाले ज्ञान से जो महान हुए हैं, वे भी क्या पीन स्तनोंवाली नारियों पर विजय पा सकते हैं ? ( अर्थात्, उन्हें नहीं भूल सकते ।)
पुष्प-शाखा पर चढ़ा हुआ एक ( पुरुष ), देवताओं के लिए भी जिसका रूप चित्रित करना सम्भव नहीं था, ऐसी रूपवती ( अपनी पत्नी ) के सौन्दर्य में ही डूबा रहा तथा उसी पर अपने नयन गड़ाये रहा और पुष्पों के बदले कलियों और पल्लवों को तोड़-तोड़कर उसे देने लगा ।
अनुपम मुद्गर-जैसी भुजाओंवाला एक पुरुष, भ्रमरों से अलंकृत केशोंवाली ( अपनी पत्नी ) का वदन देखकर, उसके बिंब-समान मुँह के स्पंदन के द्वारा ही यह संकेत पाकर कि उस ( नारी ) के मन में कोप बसा है, अपने मन में व्याकुल हो उठा ।
इस प्रकार, वे नर-नारी विशुद्ध तथा शीतल छाया देनेवाले उद्यान के पुष्पपुंज का चयन करते-करते ऊब गये और फिर धवल वीचियों से भरे निर्मल जल में क्रीडा करने की कामना रखते हुए ( जलक्रीडा के लिए ) उद्यत हुए । ( १-३६ )
अध्याय १६
जलक्रीडा पटल
वे उत्तम नर और अप्सरा-सदृश नारियाँ उस पुष्पोद्यान से निकलकर, शोभाय-मान पुष्पों से युक्त जलाशयों की ओर ऐसे चले आये, जैसे वन्य गज हथिनियों के साथ चलते हैं। तब निर्मल स्वर्ग के निवासी देवता भी उन्हें देखकर लज्जित हो गये और भ्रमर गुंजार भरते हुए वृक्षों में उड़ चले।
उनके जलक्रीडा करने का वह दृश्य ऐसा था, जैसे पुराने काल में गंगा से अलंकृत जटावाले (शिव) के सदृश महान् तपस्वी (दुर्वासा) के शाप से देवेन्द्र का ऐश्वर्य अप्सराओं के साथ, उमड़ते हुए क्षीरसमुद्र में जा डूबा हो। १
काले रंग से युक्त कुवलय-पुष्प उन नारियों के नेत्र-पुष्पों के समान खिले थे; (तो) उन अलंकृत स्वर्धति (नारियों) के नयन (उन) विकसित कुवलय के जैसे ही शोभित थे। रक्त कमल (उन) रमणियों के वदनों के जैसे ही खिले थे (तो) उन रमणियों के वदन (उन) रक्त कमल पुष्पों जैसे ही सुशोभित थे।
(वे रमणियाँ कैसी थीं ?) कुछ रमणियाँ नालयुक्त कमल पर आसीन (लक्ष्मी-देवी) के सदृश (अपने पतियों के) वक्षों का गाढालिंगन करनेवाली थीं, तो कुछ (अपने पतियों के) कंधों का सहारा लिये हुए, विजयलक्ष्मी के सदृश दृष्टिगत होती थीं; कुछ जल को यों फैलाकर उछालती थीं कि वह ताड़ के पत्ते जैसा फैल जाता था, तो कुछ रमणियाँ पोंठी मछलियों के उछलने पर भीत हो (अपने) पुरुषों का आलिंगन कर लेती थीं।
भ्रमरों को आकृष्ट करनेवाली सुगंधि से भरे सुगंध-चूर्ण को तथा सुगंधित तेल से युक्त कस्तूरी को वे एक दूसरे पर छिटकती थीं। कुछ एक दूसरे पर पुष्प-मालाएं फेंकती थीं और कुछ निर्मल जल का बिम्ब-समान मुंह में भरकर अपने प्रेमियों पर फेंकती थीं और कुछ पुङ्गीज-समान करों को जोड़कर उनमें पानी भरकर दूसरों पर फेंकती थीं।
कदली-समान कांट तथा चिकने बाँस-जैसे कंधोंवाली (कुछ नारियाँ) (जल में डुबकी लगाकर ऊपर उठने पर) अपने वदन को ढँकनेवाले पुष्पों-भरे केशों को हटाती हुई पतियों को अपने साथ क्रीडा करने के लिए बुलाती थीं। कुछ रमणियाँ ऐसी थीं, जो स्वर्ण-समान स्तनों पर (जल के) पुष्पों का स्पर्श होने से तड़प उठती थीं।
प्रवाल, बिंबफल तथा कमल की समानता करनेवाले संगीत के अभ्यस्त रमणीय मुँह तथा नीलोत्पल जैसे मनोहर नयनों से युक्त कटिशीन रमणियाँ (जल के) भीतर रहनेवाले चंचल मीनों को देखकर अपने पतियों से पूछती थीं कि 'क्या जलधाराओं के भी नयन होते हैं?'
कमलों से आच्छादित जल, मधुपूर्ण पुष्पों से शोभित लंबे केशोंवाली, कमलगन्ध-युक्त मुखवाली रमणियों के प्रतिबिम्बित मुखों को (हे जल) में प्रतिबिम्बित देखकर यह सोचने लगीं
बालकाण्ड १२३
कि यह सुन्दर ललाटवाली (कोई अन्य नारी है, जो) मेरे हँसने पर हँसती है, अतः मेरी यह सखी है, फिर आनन्द से अपने निर्दोष स्तनों का हार उतारकर उस प्रतिबिम्ब को देने लगी।
भ्रमरों से घिरे पुष्प-हारों से शोभित रमणियाँ (अपने) प्रियतमों की वज्र-सदृश दृढ़ भुजाओं का आलिंगन करने की इच्छा से जलाशय के तट की ओर चलने लगीं, तो वे गगनोन्नत पर्वतों पर रहनेवाले सुकुमार मयूरों के समान लगती थीं। उनके कर्णाभरणों की कान्ति छिटक रही थी और श्रेष्ठ मुक्ताओं का हार (उनके ऊपर) प्रकाशमान था।
न जाने, उस जलक्रीडा के समय (पति के द्वारा) क्या अपराध हुआ, जिससे लाल रेखाओं से युक्त 'कयल' मीन जैसी आँखोंवाली एक सुन्दरी अपनी आँखें (और भी) लाल करती हुई, क्रोध से जाकर कमलवन के भीतर छिप रही और उसका पति यह नहीं पहचान सकने के कारण कि कौन पंकज है और कौन उसकी पत्नी का मुख है, सन्देह-ग्रस्त ही खड़ा रहा।
जब-जब वे सुन्दरियाँ जल में डुबकी लगाकर ऊपर उठती थीं, तब-तब (उनके) पल्लव-समान हाथों के स्वर्ण-कंकण और शंख-वलय भ्रमर के साथ बोल उठते थे। उनके भारी नितम्बों पर से अनेक लड़ियों की मेखलाएँ खिसक जाती और उनके छोटे पैरों से उलझ जाती थीं; तब वे रमणियाँ यह सोचकर कि पैरों में साँप ही लिपट गये हैं, डर से थरथरा उठतीं।
वहाँ वर्तुल अंगदों से भूषित विशाल भुजाओं से शोभायमान, पुष्पमालाधारी एक नृपति जल में मग्न हो क्रीडा करनेवाली नारियों के दल से घिरा हुआ इस प्रकार खड़ा था, जिस प्रकार मंदरपर्वत (क्षीर सागर के) मथन के समय समुद्र से, अमृत के साथ उत्पन्न देवनारियों से घिरा हुआ खड़ा हो।
'तोड़ि' (नामक कंकणों) से शोभित कमल-समान लाल-लाल कर, स्वच्छ हास-युक्त अरुण मुँह तथा लता-समान कटि-सहित सुन्दरियों के मध्य एक राजा इस प्रकार खड़ा था, जिस प्रकार सुगन्धित कमल-भरे किनारोंवाले वन-सरोवर में हथिनियों से घिरा हुआ कोई मत्तगज खड़ा हो।
अरण्य के मयूरों के गर्व को भी मिटानेवाले सौन्दर्य से युक्त तथा निरन्तर बरसने-वाले मेघ की समानता करनेवाले दीर्घ केशों से विभूषित रमणियों के मध्य एक राजा इस प्रकार खड़ा था, जिस प्रकार आकाशगंगा के मध्य अनेक स्थानों में चमकते हुए नक्षत्रों से घिरा हुआ उज्ज्वल किरणोंवाला चन्द्रमा खड़ा हो।
इक्षु का धनुष रखनेवाला बलिष्ठ भुजाशाली (मन्मथ) को (सौन्दर्य) गुण के अतिरिक्त बाण भी देनेवाले दीर्घ नयनों से विभूषित एक सुभ्रू, सखियों के द्वारा अलंकृत होकर, नारियों के मध्य इस प्रकार शोभायमान थी, जिस प्रकार त्रिविध जलज-पुष्पों से प्रकाशित सरोवर में शतदल पुष्प (कमल) शोभित हो।
'ये दृढ़ तथा कठोर शृङ्ग हैं, नहीं, ये तो दमकते हुए प्रवाल हैं'—यों कहने योग्य वदन पर सच्छत्रमान (विशाल) नयनों से शोभायमान एक रमणी मयूर-जैसी सखियों
१२४ कव रामायण
से घिरी हुई इस प्रकार खड़ी थी, जिस प्रकार पल्लवो तथा पुष्पो के साथ बढनेवाली लताओ से घिरी हुई, सागर से उत्पन्न कोमल पुष्पवाली कल्पलता हो।
रथ से लिये हुए ( अग-जैसे ) जघनवाली, नारिकेल-वृक्ष से लिये हुए ( फल जैसे ) स्तनोवाली, अन्यत्र कही प्राप्त न होनेवाले सौन्दर्य से युक्त एक सुन्दरी जल मे मग्न होकर इस प्रकार ऊपर उठी कि कंचुक मे बँधे हुए उमके स्तन बाहर दिखाई देने लगे। तब उमका वदन निर्मल जल मे दृश्यमान चन्द्र के प्रतिबिंब के सदृश शोभित हुआ।
पर्वतो को परास्त करनेवाली भारी भुजाएँ, वस्त्र के अन्दर न समानेवाले विशाल जघन, घटो के समान स्तन—ये मब परस्पर धक्का देते हुए सघर्ष-से करने लगे, जिससे ( उस सरोवर का ) जल तटो को पारकर फैल गया ।
लाल अधर श्वेत हो गये, नेत्र लाल हो गये, शरीर का अगराग गलित हो गया, ( कटि मे बँधा ) वस्त्र खिसक गया। कुंकुमराग से लिप्त भारी स्तनोवाली रमणियाँ उस जलाशय मे इस प्रकार मग्न होने लगी कि उस समय वह जलाशय भी प्रेम के साथ आलिंगित होनेवाले उनके पति के समान दीखता था ।
'विशुद्ध ज्ञानवान् व्यक्ति के साथ सहवास करनेवाले ( साधारण ) नर भी ज्ञान प्राप्त करते हैं', यह कथन ठीक ही है, उसी प्रकार (उम जलाशय के) मीन भी मधु, कस्तूरी, शालवृक्ष का धुआँ, अगरु लकड़ी का धुआँ—इनकी गंध से सुवासित हो उठे थे। ( उपर्युक्त कथन के लिए ) इससे बढ़कर अब और क्या उदाहरण आवश्यक है ?
बडे राजाओं की देह से प्राप्त चन्दन-लेप, क्रीडा मे निरत रमणियो से प्राप्त कुंकुम-राग—इनसे भर जाने से वह मनोहर जलाशय ऐसा दिखाई पड़ता था, जैसे कोई नील मेघ आकाश की लालिमा से रँग गया हो ।
शरीर पर के अगरु, चन्दन आदि से बने अंगराग के धुल जाने से चाशनी-जैसी मीठी बोली तथा बिम्ब-जैसे लाल अधर से शोभित वे सुन्दरीयाँ सान पर चढाये गये रत्न के समान चमक उठी।
झपटनेवाले सिंह के समान एक वीर की स्वच्छ स्वर्णाभरण-भूषित भुजाओ पर आर्द्रचन्दन से लिखा गया चित्र जल का प्रवाह लगने से धुल गया । उसे देखकर एक तन्वी के लाल रेखाओ से अंकित काले नेत्र लाल हो उठे ।
काम-वेदना से जली हुई तथा नितंब-भार से युक्त एक रमणी के देह ताप से तप्त होकर, मकरंद-पूर्ण, नवविकसित तथा मधुस्रावी केशरवाले पुष्पो से युक्त वह तरंगायमान शीतल जलाशय भी उष्ण हो उठा ।
अनुपम पुष्पो से अलकृत भुजाओंवाले एक नरेश ने (अंजलि मे) जल उठाकर एक रमणी के तैलाक्त केशो पर चढ़ाया, जैसे रक्तपकज पर आसीन लक्ष्मी को श्रेष्ठगज अपने हाथ ( सूँड़ ) से जल-स्नान करा रहा हो।
तरुण हस कमल-पुष्पो पर बैठे थे। वे ऐसे लगते थे, मानो यह सोचकर कि ये कमल हमारी चंचल गति को परास्त करनेवाली ( सुन्दरीयो ) के मृदुल पदो की समानता कर रहे हैं, क्रोध प्रकट करते हुए उन पुष्पो को ( अपने पैरो से ) रौंद रहे हों।
बालकाण्ड १२५
चन्दन के धुल जाने पर नख-क्षतो के चिन्हो-सहित दृष्टिगत होनेवाले (उन रमणियो के) स्तन, सुन्दर धागो में लिपटे स्वर्णकलश-जैसे थे। उन कलशो को देखकर कितने पुरुषो के चित्त जल उठे—मै क्या कहूँ ?
चक्रधारी एक नरेश ने अपने दीर्घ घने दलवाले कमल-जैसे हस्त से (कुछ सकेत) प्रकट किया, उसको देखकर 'बीलि' (नामक लाल) फल के समान अधरवाली एक तन्वी ने अपनी सखी के कटाक्ष के द्वारा ही उसका उत्तर दिलाया।
लहरो के आगे ढकेले जाने और उथल-पुथल होने से निर्मल जल मे श्वेत पंकज डूब-डूब जाते थे, मानो वे कमल चितकबरे हरिण की समानता करनेवाली उन (सुन्दरियो) के बदन की सदृशता न कर सकने के कारण ही लज्जित हो अपने को (जल में) छिपा रहे हो।
उपर्युक्त ढंग से जलक्रीडा करने के पश्चात् वीर-वलयधारी पुरुष तथा स्त्रियाँ उस जलाशय से निकलकर, उसको शोभाहीन बनाते हुए किनारे पर आ गईं और योग्य वस्त्रो तथा आभरणो को पहना।
जलक्रीडा के बाद (उनके बाहर) निकल आने से, वह जलाशय उस आकाश के सदृश दीखने लगा, जिसमें से तैरते हुए चन्द्र और नक्षत्र अदृश्य हो गये हो, या अबतक उसमे जो कमल-पुष्प (सुन्दरियो के बदन आदि) विकसित थे, वे अब उससे दूर हट गये हो।
हरिण-सदृश नयनोवाली (रमणियो) ने पुरुषो-सहित जो जलक्रीडा की थी, उसको देखता हुआ उष्णकिरण (सूर्य) मीनो से पूर्ण समुद्र मे समा गया, मानो वह स्वयं भी वैसा ही जलविहार करना चाहता हो।
अपनी निर्बलता के कारण हारकर भी फिर अपने शत्रु पर चढ़ आनेवाले राजा के जैसे ही, सर्वत्र रमणियो के वदनो से पराजित हुआ चन्द्रमा, फिर प्रकट हुआ। (१-३३)
अध्याय १७
मद्यपान पटल
सर्वत्र शीतल ज्योत्स्ना इस प्रकार फैल गई, मानो वह श्वेत रंग के मद्य की बाढ हो, या संगीत ही साकार होकर जगत् में फैल गया हो, या (प्राणियो के) हृदय की कामना बहिर्गत हो गई हो।
सम्मिलित रहनेवाले लोगो (स्त्री-पुरुषो) के लिए सुखदायक मद्य बनकर वियोग का दुःख भोगनेवालो के लिए प्राण-पीडक विष बनकर तथा प्रणय-कलह मे क्रुद्ध व्यक्तियो के लिए सहायक दूत बनकर, वह समृद्ध ज्योत्स्ना मन्मथ की प्रार्थना से सर्वत्र फैलने लगी।
(उस चाँदनी में) सब नदियाँ गंगा नदी के समान दृष्टिगत होती थी, सब समुद्र
१२६ | कंब रामायण
विख्यात क्षीरसमुद्र से लगते थे, सब पर्वत अनंत भगवान् ( शिव ) के पर्वत ( कैलास ) के समान दीखते थे, उस चाँदनी के प्रसार के बारे में हम और क्या कहें ?
सभी निर्मल दिशाएँ तथा उनमें रहनेवाले सब चेतन-अचेतन पदार्थ उस चंद्रिका की बाढ में श्वेत हो गये थे, मानो समुद्र से घिरी यह धरती, वज्र-सदृश करवाल-युक्त मकर-केतन (मन्मथ) के (जन्मदिवस के सूचक) श्वेतवस्त्र को धारण किये हुए शोभित हो रही हो ।
सब रमणियाँ, उज्ज्वल तारकों के सदृश मुक्ताओं (के बने चँदोवे ) की छाया में, संचरमाण मेघों के विश्रामस्थान बने हुए उद्यान-रूपी जवनिकांतर में, सरोवरों के समान चमकते हुए स्फटिकों से प्रकाशमान काननों में और शोभायमान पुष्प-कुंजों में जा पहुँचीं ।
पुष्पों से सुरभित कुंतलवाली ( रमणियाँ ) पुष्पों की शय्याओं के ( रति ) समर में आनन्द पाने का विचार करती हुई मनोहर स्वर्ण-चषकों में ढाले गये अमृत-सदृश मद्य का पान करने लगीं ।
नक्षत्रों से शोभित गगन पर विहार करनेवाली (अप्सराएँ) तथा विद्याधर सुंदरियाँ भी जिनकी सुन्दरता की समता नहीं कर सकती, वैसी (सुन्दर) शरीरवाली तथा हरिणों को परास्त करनेवाले नयनों से युक्त वे ( रमणियाँ ) अपने मुख से मद्य को इस प्रकार पीने लगीं, मानो भ्रमरों से घिरे पुष्प में मधु डाला जा रहा हो ।
वह चषक, जो बिखरे हुए दूध के जैसे चन्द्र-किरणों से अंकित था, (किसी रमणी के ) कर की मनोहर अरुण कांति के पड़ने से लाल दिखाई पड़ने लगा है । उस अनुपम सुंदरी के मुख में गिरा हुआ मद्य अमृत बनकर चमक उठा ( अर्थात्, उसके श्वेत दाँतों की छाया से मद्य भी श्वेत हो उठा ), तब उसकी अंजन-लगी आँखें भी लाल हो गईं ।
पुष्पमाला, 'पुनहु' ( एक सुगन्धित द्रव्य ), शीतल अगरु का धूम, इनसे सुवासित कुंतलवाली (रमणियाँ), जिस श्वेत मद्य का पान करती थीं, वह ( मद्य ) अग्निकुण्ड में डाले गये होमघृत के समान अंतर में स्थित कामाग्नि को भड़काकर बाहर प्रकट कर देता था ।
क्रांतिपूर्ण ललाटवाली एक ( सुन्दरी ) स्वर्ण के बने शीतल सुगंधित मद्य-भरे चषक में अपने भव्य प्रतिबिंब को देखकर ( यह समझकर कि कोई अन्य नारी मद्यपान कर रही है ) कह उठी—'हे सखी, मेरे साथ तुम भी आनन्द से मद्यपान करो ।' विष समान दीर्घ नयन तथा सुधा-समान मधुरवाणी युक्त ( तरुणियों ) के अज्ञान-सदृश अज्ञान भी क्या कहीं हो सकता है ?
( यह टूट न जाये ) ऐसा डर उत्पन्न करनेवाली सूक्ष्मकटि-युक्त अप्सरा-समान कोई ( सुन्दरी ) अलकभार, विषाक्त शूल-सदृश काले नयन, रक्त मुख—इनसे सुशोभित हँसता हुआ अपना वदन मद्य में ( प्रतिबिंबित ) देखकर ( यह समझकर कि यह कोई अन्य नारी है ) कह उठी कि 'हे पगली, तू ने यह क्या काम किया ? यहाँ ( सुराही में ) अधिक मात्रा में मद्य के रहते हुए भी तू व्यर्थ ही जूठन का पान करती है' और अपने दंत-रूपी कुंद-कलियों को प्रकट करती हुई हँस पड़ी ।
अनुपम रूपवती, अन्यादृश ( विचित्र ) कठोरता रखनेवाले तथा हत्यारे शूल की समानता करनेवाले नयनों से युक्त ( एक रमणी ) रत्नमय मधुपात्र में श्वेत ज्योत्स्ना पड़ने
बालकाण्ड १२७
से उसे मधु से भरा हुआ समझकर उठाकर पीने लगी, तो आसपास के सब लोग उसका उपहास करते हुए हँस पडे, वह (वेचारी) अपने मन में बहुत लज्जित हुई।
किंशुक पुष्प-समान मुखवाली एक (तरुणी), जिसका मृदु वचन ऐसा था कि उसे सुनकर लोग कहते थे कि ‘वीणा तथा वेणु को नाद-माधुरी देनेवाली इसकी ही बोली है,’ नालसहित नीलकुवलय १ को भीतर रखनेवाले सुगन्धित मद्य-भरे पात्र में, अपने करवाल-तुल्य नयनों का प्रतिबिंब देखा और भ्रमर की भ्रान्ति से उस (प्रतिबिंब) को उड़ाने लगी।
वहाँ सोने का कर्णभूषण पहनी हुई, एक (तरुणी) ने मद्य मे दिखाई देनेवाले सुन्दर चन्द्र-प्रतिबिंब को अपने नयनों को सतुष्टि देती हुई देखा और उसे समझकर मधुर बच्चन कहने लगी—‘(हे चन्द्र !) तू आकाश के राहु नामक सर्प से डरकर यहाँ (इस मद्य पात्र मे) आ छिपा है, मैंने तुझे अभय प्रदान किया, तू डर मत।’
नदी-धारा की भौंरी एक ही स्थान पर स्थिर खड़ी रह गई है, ऐसा अनुमान उत्पन्न करनेवाली नाभि से शोभित एक (तरुणी) ने रक्त-मधु की वर्षा करनेवाले पुष्पों के चँदोवे को चीरकर नीचे झरनेवाली घनी ज्योत्स्ना को देखा और (मद्यपान से) ज्ञानभ्रष्ट हो जाने के कारण अथवा स्त्री-सहज अबोधता के कारण उसे मद्य समझकर पात्र मे भरने का प्रयत्न करने लगी।
बिजली के समान लचकती हुई कटिवाली एक (सुन्दरी) की उज्ज्वल अमृत-तुल्य मधुर वाणी बीच मे ही (पूर्ण हुए बिना ही) स्खलित हो जाती थी। वह (नारी) अपने जघन पर की मेखला को हटाकर उसके स्थान में पुष्पहारों को पहनने लगी और स्वर्ण-हार को केशों में धारण करने लगी। (ये सब मद्यपान से मत्त व्यक्ति के कार्य हैं।)
एक (रमणी) ने मद्य-भरे रत्नखचित चषक मे हास्ययुक्त अपने वदन (के प्रति-बिंब) को देखकर यह सोचा कि गगन पर का चन्द्र मधु की कामना से (उस पात्र मे) उतर आया है वह उस (प्रतिबिंब) से कहने लगी—‘हृदय को आनन्द देनेवाले अपने पति के साथ जब मैं मान करूँगी, तब तुम यदि मुझे जलाओगे नहीं, किंतु शीतल ही बने रहोगे, तो मैं यह मद्य तुमको पीने के लिए दूँगी।’
तिल-पुष्प सदृश सुन्दर नासिकावाली, आभूषण पहनी हुई एक रमणी नशे के कारण यह भी न जान सकी कि हाथ के काँप उठने से मद्य आसन पर गिर गया है और यह सोच कर कि अभी पात्र मे मद्य है उसे हाथ से उठाकर अपने पद्मराग तुल्य अधर से लगा लिया।
झुण्डो मे मँडराते हुए भ्रमर आकाश मे ऐसे फैले हुए थे, जैसे किसी बड़े लोभी की सम्पत्ति की कामना करते हुए याचक आ जुटे हो। एक सुन्दरी, मधुस्त्रावी कमल-समान अपने अरुण मुँह को खोलकर मद्य पीने से डरती थी (इसलिए कि कही भ्रमर मुँह मे न घुस जाये), अतः चपक मे कमल के खोखले नाल को रखकर उसके द्वारा मद्य (चूसकर) पीने लगी।
एक (रमणी), जिसकी आँखें चर्मकोष से तत्क्षण निकाले गये खड्ग के समान चमक उठती थी और जिनको देखकर जलपक्षियों से भरे कमल तड़ाग मे रहनेवाले मीन
१ कहा जाता है कि मद्य में सुगन्ध उत्पन्न करने के लिए कुवलय, कमल आदि पुष्पों को डाला जाता था।
१२८ कंब रामायण
भी व्याकुल हो भाग खडे होते थे, जो मधु से पूर्ण पुष्पो से अलंकृत कोमल कुंतलवाली और मयूर-तुल्य थी, इसलिए मद्यपान नही करती थी कि उसके हृदय में निवास करनेवाला प्रेमी मद्यसेवी नही था।
एक नारी क्रोध का अभिनय दिखानेवाले व्यक्ति के सामान ही यम-समान नेत्रो को लाल किये, ललाट पर टेढ़ी भौहो को चढ़ाये, चमकते दाँतो को कटकटाती हुई मनोहर पल्लवों को परास्त करनेवाले अपने करतलो से ताली बजाती थी।
एक रमणी, काँपते हुए अतिरक्त अधर-बिंब को श्वेत ज्योत्स्ना पर क्रोध करनेवाले अपने दाँतो से दबाये हुए, बहुत पैने और खून से लथपथ शूल-जैसी आँखो से घूर रही थी। उसकी देह से जो स्वेद बह चला, वह (शरीर से) बाहर उमड़ते हुए मद्य के समान ही दीखता था।
किसी नारी के बिंबफल-सदृश उभडे अधर से प्रकट होनेवाली लाली आँखो में जा चढ़ी। वह सोचती कुछ थी और कहती कुछ। उसके अनुपम कमल-तुल्य वदन पर भ्रू-रूपी धनुष झुक गये। ललाट-रूपी चन्द्र भी ओस बरसाने लगा।
(किसी के) सेमल के फूल-जैसे अधर की लाली छूट रही थी, दाँतो से मधुर-रस (लार) बह रहा था, स्तन-कुचुक का बंधन और नीवी-बंधन ढीले पड़ रहे थे, लहराते हुए केशपाश छूटकर लटक रहे थे। उसके वदन से हास उत्पन्न हो रहा था। पति-समागम और मद्यपान—दोनों एक ही जैसे (लक्षणवाले) होते हैं।
‘मुखर नूपुरवाले मन्मथ से मै जो पीड़ित हूँ, इस उस (मेरे प्रियतम) को बताओ,’ यो कहकर अपनी सखी को प्रियतम के पास भेजती हुई रत्न-खचित मेखलावाली एक (रमणी) ने फिर प्रश्न किया—‘हे सखी, क्या तुम भी मेरे मन के जैसे ही (प्रियतम के पास) रह जाओगी या (शीघ्र समाचार लेकर) लौट आओगी?’
हरिण को भी मुग्ध करनेवाले नयनोंवाली एक (रमणी) ने, किसी एक बलशाली नरेश के निकट, अपने अनुकूल रहनेवाली सभी सखियो को, एक के पीछे एक को भेज दिया। फिर स्वय ही अकेली उस (प्रियतम) के पास चल पड़ी।
सुगन्धित पुष्प-शय्या की परतों पर, सीमा-रहित प्रेम-समुद्र में डूबी हुई, मधु-भाषिणी एक (रमणी) ने अपने पति के मब नाम बतानेवाले तोते को बहुत आनंदित होकर अंक मे भर लिया।
उज्ज्वल ललाटवाली एक (रमणी) सुगंधित स्थान में रहती हुई, अपने सगी तोते को अंक मे लिये कह रही थी कि मेरे प्राण-सम (पति) को तू आज नहीं ला सका, फिर तू मेरी क्या सहायता कर सकता है? मेरे लिए तू क्रौंच पक्षी के समान (दुःख को बढ़ाने-वाला) हो गया है, और वह क्रुद्ध होकर रो पड़ी।
प्रियतम ने उसकी सौत का नाम लेकर उसका संबोधन किया, तो स्वर्ण-कंकण-धारिणी मयूर-सदृश एक (रमणी), अंकुर-सम दाँतो को प्रकट करती हुई हँस पड़ी और ‘कयल’ मीन-जैसे उसके नयनो से अश्रुधारा बह चली।
एक पुरुष ने अपने पूर्व अपराध के कारण मान किये बैठी हुई अपनी प्रेयसी का