कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ११७
वे रमणियां अपनी सखियो के साथ मिलकर, अपने अग लचकाकर नाचने लगीं; तो पीले सोने के बने 'शुक्ल' (नामक कर्णाभरण) तथा भव्य 'कुलैं' (नामक कर्णाभरण) एक साथ चमक उठे और (उनकी पुष्प-मालाओ में) बैठे हुए भ्रमर उड़कर गुंजार भरने लगे ।
उन (नाचनेवाली स्त्रियों) को देखकर सुगन्धित पुष्प-मालाओं से शोभित वक्ष-वाले पुरुष उन लता-सदृश नारियों को पुष्पित लताओं से पृथक् नहीं पहचान पाते थे और भ्रांत होकर खड़े रह जाते थे ।
रत्नों से खचित पीले स्वर्ण के आभरणों में अलंकृत विशाल जघन, संगीतमय भाषण, शीतल पुष्प-मधु से युक्त केश—इनके साथ जब वे रमणियां झुण्ड बाँधकर समीप आतीं, तो उनकी आहट सुनकर ही कोयलें अपना मुँह बंद कर लेतीं। वह उनके डर के कारण नहीं, किंतु लज्जा के कारण ही था। पारखी व्यक्तियों के सामने कौन मुँह खोल सकता है ?
वे सुन्दरियाँ अपने उन नेत्रों से, जो विष से अधिक कठोर होने पर भी अमृत जैसे लगते थे, प्रेम के साथ देखकर और कमल-सदृश अपने करों से पकड़कर ऊँचे चढ़े हुए फूल के पौधों को जब झुकाने लगीं, तब वे पौधे उनके नूपुर-भूषित चरणों पर सुकुमार पुष्पों को बरसाते हुए झट झुक गये। यदि जड़ वृक्षों की यह दशा हो, तो अब कौन ऐसा (चेतन) व्यक्ति होगा, जो लतातुल्य सूक्ष्मकटिवाली (स्त्रियां) के निकट झुके बिना रह सके ?
कमल-पुष्प पर आसीन (लक्ष्मी) देवी-जैसी उन (सुन्दरियों) के मनोहर कमल-सदृश करों से छुए जाने पर सुरभित पुष्पालंकृत केशवाले पुरुषों की पर्वत-समान भुजाएँ भी, जिनके बल से भयंकर सिंह भी डर जाते हैं, झुककर रह जाती हैं, तो क्या यह भी कहने योग्य कोई विशेष बात है कि विकसित सुमनवाले पौधे (उन सुन्दरियों के स्पर्श से) झुक जाते हैं ?
मधुर नाद करनेवाले भ्रमरों ने देखा कि पुष्पलताएँ, नदियों या तालाबों से उत्पन्न न होनेवाले (उन रमणियों के) चन्द्रमुख-रूपी कमल-पुष्पों को कुवलय-पुष्पों के साथ खिलाये हुए खड़ी हैं, (अर्थात् वे स्त्रियाँ लतातुल्य हैं, उनके वदन कमल और नेत्र कुवलय हैं)। आश्चर्य में डूबे वे भ्रमर (उन मुख, कमलों पर) ऐसे मँडराने लगे कि उड़ाने पर भी नहीं उड़ते थे। जो नवीनता के प्रेमी होते हैं, वे नई वस्तु को देखने पर क्या, उन्हें छोड़ देंगे ?
कुछ लताएँ झुक-झुक जाती थीं; तो कुछ पुष्पित वृक्ष हाथ की पहुँच से भी ऊँचे होकर ऐसे खड़े रहते थे, जैसे रूठे हुए हों और झुकना नहीं चाहते हो। वह दृश्य ऐसा था, जैसे दृढ़ पर्वत-सदृश पुष्ट भुजाओंवाले उज्ज्वल शरीरवाले, विकसित पुष्पहार धारण करनेवाले पुरुषों के मध्य मयूर-सदृश कुछ (नारियाँ) खड़ी हों।
पुष्पों के चुन लिये जाने पर शोभाहीन होकर म्लान दिखाई पड़नेवाली (शाखाओं को) देखकर चित्र की प्रतिमा (जैसी वे रमणियाँ) सोचती थीं कि ये (शाखाएँ) हमारे पतियों की दृष्टि में सौंदर्यहीन लगेंगी; इसलिए वे अपने रत्नहार, मुक्तामाला, मेखला, कर्णाभरण आदि उतारकर उनको पहना देती थीं और उन शीतल तथा सुकुमार शाखाओं को प्यार-भरी दृष्टि से देखती रहती थीं।