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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 130

११८ | कंब रामायण

घने पुष्पो मे बैठकर मधु का पान करके सचरण करत रहनेवाले भ्रमर, अब सुगन्धित पुष्प मालाओ तथा कलियो को भी उतार देनेवाली (स्त्रियो) के रीते (खाली) केशों मे ही रमने लगे और अपने प्रेम के पात्र पुष्पो पर नही जाते। बडे लोग उत्तम स्थान मे ही सभी भोग्य विषयो का अनुभव करतें हैं।

अपने शरीर-सौंदर्य के कारण, पुष्पासीन (लक्ष्मी) देवी का भी श्रृंगार बनने-वाली (एक सुन्दरी), धवल स्फटिक-शिला मे, कर मे पुष्प लिये दिखाई पड़नेवाले अपने ही प्रतिबिब को देखकर समझ बैठी कि यह कोई अन्य स्त्री है, जो मेरे पति की प्राण-समान प्रेयसी है। वह (अपने) दीर्घ नेत्रो से अश्रु वहाती हुई हाथ से पुष्प लिये वैसे ही खडी रह गई।$^१$

मेघो से घिरे हुए चन्द्र के समान मुखवाली, अनुपम पुष्पलता-तुल्य (एक नारी) ने देखा कि एक राजा अपनी भुजा पर का पुष्पहार उतारकर मयूर-तुल्य किसी (नारी) को पहना रहा है, तब वह कचुक के खुल जाने पर कटि को लचकानेवाले (भारी) स्तनो के अग्रभाग पर, शूल-जैसे नेत्रो से अश्रुवर्षा करती हुई $^२$ वही खडी रही।

एक प्रेमी राजा मयूर की-सी गति से आनेवाली अपनी प्रेयसी के मन की परीक्षा करने की इच्छा से उस सुन्दर उद्यान के एक माधवीलता-कुञ्ज मे जा छिपा। अपने पति के साथ निरंतर रहनेवाली वह सुन्दरी, जो इसके पहले कभी उससे विलग न हुई थी, व्याकुल होकर भटकने लगी, मानो प्राणो की खोज मे शरीर चक्कर लगा रहा हो।

एक नारी, जो घृतसिक्त शूल धारण करनेवाले (अपने) पति से मान करके, इस प्रकार हो गई थी कि उसकी काजल-अंकित काली आँखो मे बहुत लाली उत्पन्न हो गई थी, अपने हाथ की पहुँच से ऊँचे रहनेवाले पुष्पो को देखकर एक कोयल से हाथ जोड़कर विनती करने लगी कि इन पुष्पो को मेरे लिए तोड दो। (मान के कारण पति से न कहकर कोयल से कहती है)।

ऊँचे नारियल के पेड़ पर लगे हुए फल को देखकर एक युवक ने कहा—'आह ! ये (फल) तरुणियो के स्तनो$^३$ के समान हैं'। (यह सुनकर) एक मुग्धा, जो उसकी पत्नी थी, 'ये नारियल किस नारी के स्तनो के-जैसे है ?' यह सोचती हुई क्रुद्ध हुई, सिसकियाँ लेने लगी और स्वेद-सिक्त होकर ठंडी आहे भरने लगी।

युद्ध का संदेश पाते ही फूल उठनेवाली पर्वत-जैसी बलिष्ठ तथा सुन्दर भुजाओ से युक्त मन्मथ-समान अपने पति को पुष्प तोड़ते हुए देखकर, जलद-सदृश केशवाली और


१ इसमें यह अर्थ ध्वनित होता है कि उस स्त्री का पति स्फटिक-शिला में उस नारी का प्रतिबिंब देखकर उसी को अपनी प्रेयसी समझ लेता है और उससे प्रेम करने लगता है। इसपर उसकी प्रेयसी उस प्रतिबिंब को अन्य नारी समझकर रुष्ट होती है।
२ यह विरहिणी नायिका है, अत अपने-पति के स्मरण में अश्रु वहाती है।
३ 'तरुणियो के स्तन'—बहुवचन के प्रयोग से इस मुग्धा नायिका को संदेह हुआ कि उसका पति अन्य स्त्रियो से प्रेम करता है।