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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

बालकाण्ड ११६

कोकिल-जैसी बचनवाली उस स्त्री ने निकट आकर उसकी आंखे बंद की, तो उस (पुरुष) ने पूछा—'कौन है?'¹ इसपर वह (नारी) अग्नि के जैसे निःश्वास भरने लगी।

एक राजा मधु-भरे नवविकसित पुष्पों को (अपने हाथ मे) लिये हुए खड़ा था। तब अनेक नारियो ने पंक से अनुत्पन्न, सुगन्धित रक्तकमल-जैसे, अपने करों को एक साथ (उन पुष्पों को लेने के लिए) आगे बढ़ाया, तब वह राजा उनके मध्य, याचकों को कुछ न देनेवाले और 'नाही' भी न कहनेवाले कठोर लोभी के समान ही खड़ा रहा। (एक को देने पर अन्य सुन्दरियाँ रूठ जायेंगी, इस आशंका में पड़ा हुआ वह खड़ा रहा।)

कज्जलांकित नयनोंवाली एक (रमणी) ने अपने सामने ही अपने प्राण-समान प्रभु को किसी दूसरी (स्त्री) का नाम लेते हुए पाया, तो उसने चुभनेवाले शूल जैसी (तीक्ष्ण) दृष्टि से उसकी ओर देखा और वास्तविक लज्जा के भार से दबी हुई, सिर झुकाये, रोती हुई, कोमल पुष्पों को हाथ में लेकर सूंघा, तो उसके निःश्वास के स्पर्श से (वे पुष्प) झुलस गये।

विजयशील रथवाला एक नरेश, जिसके सौंदर्य को देखकर उसकी कुलीन पत्नियो के मनोज्ञ कमलोपम वदन पर के काजल-लगे नयन मुग्ध हो जाते थे, इधर-उधर घूमता हुआ उस महामत्त गज के समान लगता था, जिसके मदजल पर आसक्त हो भ्रमर मँडरा रहे हों।

अनिन्दनीय रूप-युक्त एक नृपति ने, सन्ध्याकालीन उज्ज्वल अर्धचन्द्र के जैसे ललाटवाली (एक पत्नी) को तथा वन्दनीय पातिव्रत्य-युक्त (दूसरी पत्नी) को (अपने लाये गये पुष्पों में से) आधा-आधा भाग बाँटकर दिया, तो वे दोनो उन सुकुमार पुष्पों को नीचे फेंककर, आँखे लाल करती हुई ऐसे लौट चलीं, जैसे कलाप-युक्त मयूर जा रहे हों।²

एक नारी उस उद्यान में, सर्वत्र मधु वहानेवाले सुगन्धित पुष्पों की खोज में इस प्रकार घूमती रही कि सहज गन्ध से युक्त अपने खुले हुए केशों की भी उसे सुध नहीं रही, अपने वस्त्रों का भी उसे ध्यान नहीं रहा, अपने मुक्ताहारों के टूट जाने से दूर-दूर तक बिखरते हुए मोतियों की भी परवाह नहीं रही। (लोग उसे देखकर सोचने लगे) यह अपने प्राणों को खोज रही है या ओर कोई वस्तु ढूँढ़ रही है?

'याल्' (वीणा)-जैसी स्वरवाली तथा लक्ष्मी देवी-जैसी (एक नारी) अतुलनीय बलशाली (अपने पति) नरेश के (प्रेम की भिक्षा मे) झुके खड़े रहने पर भी स्वयं झुकी नहीं (अर्थात्, द्रवित नहीं हुई), फिर उस राजा के निराश होकर चले जाने के पश्चात् वह द्रवितमन हुई। अब अत्यन्त व्याकुल हो गम्भीर चतुर विचार करती हुई पहले उस राजा के स्थान पर अपने तोते को भेजा और (उसकी खोज करने के बहाने से) उसके पीछे-पीछे स्वयं चल पड़ी।

सुन्दर पुष्प-माला से विभूषित वक्ष पर मन्मथ के पाँच बाण शत सहस्र होकर


१. यह ध्वनि है कि पुरुष के प्रश्न करने पर वह नारी यह आशंका कर रही कि इसकी अन्य प्रेमिकाएँ भी है, इसीलिए वह मेरा कर-स्पर्श पहचान नहीं सका है। २. यह अर्थ ध्वनित है कि दोनों पत्नियाँ अपने-अपने मन में अबतक यह सोचे हुए थीं कि नृपति उसी को अधिक चाहते हैं, किन्तु अब पुष्प बाँट देने से वह विचार गलत प्रमाणित हुआ, जिससे दोनों क्रुद्ध हो गईं और रूठकर चली गईं।