कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 132, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२० | कंब रामायण |
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गिरने लगे, जिससे एक नृपति का मन विचलित हो उठा। वह कर्त्तव्यविमूढ हो माधवी-लता से पूछने लगा कि क्या तुम मन्दार-पुष्प नहीं दे सकती हो ? (अर्थात्, उन्मत्त-सा प्रलाप करने लगा)। इस प्रकार, वह चन्दनाक्त स्तनों एव पुष्पालीकृत केशोंवाली (अपनी प्रेमिका) के लिए विह्वल हो खड़ा रहा।
एक सुन्दरी ने (अपने पति मे) कोई अपराध जान-बूझकर ढूँढ़ निकाला, जिससे वह अशमनीय कोप से भर गई और मान करने लगी। जब उसके पति ने उसके मान को देख लिया, तब वह प्रकट आनन्दित हो उठी। वह वहाँ से दूर चली गई और सुगन्धित पुष्पों को ढूँढ़-ढूँढ़कर उनकी माला बनाकर पहन लिया किन्तु मान की आशंका से (अपनी पति के वापस न आने के कारण) आईने मे अपना सौन्दर्य देखकर दुःखी होने लगी।
एक विरहिणी कहने लगी—मैं ऐसा अलकार नहीं कर सकी, जिसको देखने के लिए मेरा वह पति आ जाता; जिसके हाथ में यमराज को भोजन देनेवाला शूल रहता है । अब मै इस शरीर के साथ जीवित नहीं रहना चाहती। इस उत्तम साज-शृंगार का क्या प्रयोजन है ? यह कहती हुई वह अपने आभरण इस प्रकार उतारने लगी, जैसे उन्हे गायिका को दे देना चाहती हो (अर्थात्, वह मरना चाहती है और अपने अमूल्य आभरणों को अपने प्रेमपात्र गायिका को दे देना चाहती हों)।
(किसी स्त्री का पालित तोता खो गया था) एक सुन्दरी समीपस्थ पुष्प-शाखा मे छिपे हुए अपने तोते को पकड़ने के लिए द्रवणशील पीत स्वर्ण के चषक को (तोते के लिए कुछ भोजन उसमे रखकर) हाथ मे लिये इस प्रकार बल खाती हुई चलने लगी कि कंचुक-बन्धन में न समाते हुए, उमड़नेवाले स्तनों का भार वहन करने की शक्ति न होने से उसकी सूक्ष्म कटि लचक-लचक जाती हो।
एक सुन्दरी ने राजहंसिनी को देखा; उसकी पदगति को देखा और उसे बन्धु के समान ही अपने समीप आते हुए देखा। उसने सोचा कि यह मित्रता करने के लिए ही आ रही है, यह मेरी सखी हो सकती है। (फिर उसका सम्बोधन करके) कहा—तुम्हे देखने वाले हसेंगे; (क्योंकि तुम वस्त्रहीन हो) यह उचित नहीं; तुम यह वस्त्र पहन लो,—यह कहकर वह उस हंसिनी को वस्त्र देने लगी।
काकली-जैसी मधुर वचनवाली; नीले वस्त्र धारण किये रहनेवाली एक नारी (नीले पट से) अपने विशाल जघन-तट को देखकर यह सोचने लगी कि यह नाचते हुए सर्प के फन जैसा है और फिर वहीं फिरनेवाले मयूर को देखकर डर गई, (क्योंकि मयूर सर्प पर झपटेगा)। वह झट पुष्प-शाखाओं के मध्य जा छिपी और (लज्जा के कारण) पुष्पित शाखा-सदृश अपने हाथों से नेत्र बन्द किये शिथिल खड़ी रही।
अपना उपमान न रखनेवाली एक सुन्दरी अपनी सखी से यह कहकर कि 'हे स्वर्ण-तुल्य मधु-समान लक्ष्मी-सदृश सुन्दरी, मुझे पहचानो'—उस उद्यान में चयन करने योग्य पुष्पभार से लदे एक कुंज के मध्य छिपी रही, (सखी जब उसे पहचान न सकी¹ तब) 'सब
¹ वह सुन्दरी पुष्पित लताओं से इतना सादृश्य रखती थी कि उस लताकुंज में छिपी रहने पर उसे पहचान न सकी।