कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १२१
तो तुम मुझे देख लोगी'-कहती हुई उसके सुन्दर नीलकुवलय-जैसे नयनों को अपने हाथों से बन्द करके हँस पड़ी ।
एक उत्तम ( नृपति ) धनुष की डोरी को अंगुस्ताने पर लगाये हुए दूसरे बलिष्ठ कर में एक रमणीय कोमल कमल-पुष्प लिये हुए केश-रूपी अन्धकार से घिरे नारियों के मुख रूपी कमल-वन के मध्य अरुण किरण-युक्त सूर्य के समान घूम रहा था ।
खेतों के पुष्ट, स्वच्छ रस से भरे इक्षु-रूपी लाल धनुष को हाथ में रखनेवाले मन्मथ भी जिनसे लज्जित होता था, ऐसे सुन्दर पुरुष अपनी मुग्धा पत्नियों के मीठे तथा प्रीतिजनक दिव्य गानों का ऐसे ही विवेचन कर रहे थे, जैसे वे शास्त्रों का विवेचन कर रहे हों ।
धनुष पर चढ़ाने योग्य यष्टि ( तीर ) हाथ में लिये हुए मन्मथ-रूपी ग्वाला जब उद्यानों के भ्रमरों के नाद की मधुर वेणु बजाकर संकेत देने लगा, तब जैसे संध्याकाल में गायों के झुण्ड के मध्य बड़े-बड़े वृषभ चलते हैं, उसी प्रकार नीलकमल-जैसे काजल-लगे नेत्रोंवाली नारियों के घेरे में राजा लोग चलने लगे ।
मन में ( तपस्या के लिए ) उत्साह से भरे हुए मुनियों के द्वारा यह वचन प्रसिद्ध हुआ है कि 'यदि हमें बचना चाहिए, तो मन्मथ के हाथके धनुष से'--किन्तु ( सच्ची बात यह है कि ) पुष्प-लताओं से पुष्प चुननेवाली ( एक नारी की ) भौंह का एक कोना-मात्र ( उन मुनियों के धैर्य को हिला देने के लिए ) पर्याप्त है । (अर्थात्, मन्मथ के धनुष से भी अधिक कठोर स्त्रियों के भौंह-कमान हैं ।)
पुष्प-गंध से सुवासित केश और रमणीय ललाटवाली एक ( सुन्दरी ) कदम्ब-वृक्ष पर ( पुष्प चुनने के लिए ) चढ़े हुए ( अपने ) पति के मन में जा चढ़ी (अर्थात्, उसके मन में जाकर बैठ गई ) । ( उत्तरोत्तर ) विकसित होनेवाले ज्ञान से जो महान हुए हैं, वे भी क्या पीन स्तनोंवाली नारियों पर विजय पा सकते हैं ? ( अर्थात्, उन्हें नहीं भूल सकते ।)
पुष्प-शाखा पर चढ़ा हुआ एक ( पुरुष ), देवताओं के लिए भी जिसका रूप चित्रित करना सम्भव नहीं था, ऐसी रूपवती ( अपनी पत्नी ) के सौन्दर्य में ही डूबा रहा तथा उसी पर अपने नयन गड़ाये रहा और पुष्पों के बदले कलियों और पल्लवों को तोड़-तोड़कर उसे देने लगा ।
अनुपम मुद्गर-जैसी भुजाओंवाला एक पुरुष, भ्रमरों से अलंकृत केशोंवाली ( अपनी पत्नी ) का वदन देखकर, उसके बिंब-समान मुँह के स्पंदन के द्वारा ही यह संकेत पाकर कि उस ( नारी ) के मन में कोप बसा है, अपने मन में व्याकुल हो उठा ।
इस प्रकार, वे नर-नारी विशुद्ध तथा शीतल छाया देनेवाले उद्यान के पुष्पपुंज का चयन करते-करते ऊब गये और फिर धवल वीचियों से भरे निर्मल जल में क्रीडा करने की कामना रखते हुए ( जलक्रीडा के लिए ) उद्यत हुए । ( १-३६ )