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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

अध्याय १६

जलक्रीडा पटल

वे उत्तम नर और अप्सरा-सदृश नारियाँ उस पुष्पोद्यान से निकलकर, शोभाय-मान पुष्पों से युक्त जलाशयों की ओर ऐसे चले आये, जैसे वन्य गज हथिनियों के साथ चलते हैं। तब निर्मल स्वर्ग के निवासी देवता भी उन्हें देखकर लज्जित हो गये और भ्रमर गुंजार भरते हुए वृक्षों में उड़ चले।

उनके जलक्रीडा करने का वह दृश्य ऐसा था, जैसे पुराने काल में गंगा से अलंकृत जटावाले (शिव) के सदृश महान् तपस्वी (दुर्वासा) के शाप से देवेन्द्र का ऐश्वर्य अप्सराओं के साथ, उमड़ते हुए क्षीरसमुद्र में जा डूबा हो। १

काले रंग से युक्त कुवलय-पुष्प उन नारियों के नेत्र-पुष्पों के समान खिले थे; (तो) उन अलंकृत स्वर्धति (नारियों) के नयन (उन) विकसित कुवलय के जैसे ही शोभित थे। रक्त कमल (उन) रमणियों के वदनों के जैसे ही खिले थे (तो) उन रमणियों के वदन (उन) रक्त कमल पुष्पों जैसे ही सुशोभित थे।

(वे रमणियाँ कैसी थीं ?) कुछ रमणियाँ नालयुक्त कमल पर आसीन (लक्ष्मी-देवी) के सदृश (अपने पतियों के) वक्षों का गाढालिंगन करनेवाली थीं, तो कुछ (अपने पतियों के) कंधों का सहारा लिये हुए, विजयलक्ष्मी के सदृश दृष्टिगत होती थीं; कुछ जल को यों फैलाकर उछालती थीं कि वह ताड़ के पत्ते जैसा फैल जाता था, तो कुछ रमणियाँ पोंठी मछलियों के उछलने पर भीत हो (अपने) पुरुषों का आलिंगन कर लेती थीं।

भ्रमरों को आकृष्ट करनेवाली सुगंधि से भरे सुगंध-चूर्ण को तथा सुगंधित तेल से युक्त कस्तूरी को वे एक दूसरे पर छिटकती थीं। कुछ एक दूसरे पर पुष्प-मालाएं फेंकती थीं और कुछ निर्मल जल का बिम्ब-समान मुंह में भरकर अपने प्रेमियों पर फेंकती थीं और कुछ पुङ्गीज-समान करों को जोड़कर उनमें पानी भरकर दूसरों पर फेंकती थीं।

कदली-समान कांट तथा चिकने बाँस-जैसे कंधोंवाली (कुछ नारियाँ) (जल में डुबकी लगाकर ऊपर उठने पर) अपने वदन को ढँकनेवाले पुष्पों-भरे केशों को हटाती हुई पतियों को अपने साथ क्रीडा करने के लिए बुलाती थीं। कुछ रमणियाँ ऐसी थीं, जो स्वर्ण-समान स्तनों पर (जल के) पुष्पों का स्पर्श होने से तड़प उठती थीं।

प्रवाल, बिंबफल तथा कमल की समानता करनेवाले संगीत के अभ्यस्त रमणीय मुँह तथा नीलोत्पल जैसे मनोहर नयनों से युक्त कटिशीन रमणियाँ (जल के) भीतर रहनेवाले चंचल मीनों को देखकर अपने पतियों से पूछती थीं कि 'क्या जलधाराओं के भी नयन होते हैं?'

कमलों से आच्छादित जल, मधुपूर्ण पुष्पों से शोभित लंबे केशोंवाली, कमलगन्ध-युक्त मुखवाली रमणियों के प्रतिबिम्बित मुखों को (हे जल) में प्रतिबिम्बित देखकर यह सोचने लगीं