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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड १२७

से उसे मधु से भरा हुआ समझकर उठाकर पीने लगी, तो आसपास के सब लोग उसका उपहास करते हुए हँस पडे, वह (वेचारी) अपने मन में बहुत लज्जित हुई।

किंशुक पुष्प-समान मुखवाली एक (तरुणी), जिसका मृदु वचन ऐसा था कि उसे सुनकर लोग कहते थे कि ‘वीणा तथा वेणु को नाद-माधुरी देनेवाली इसकी ही बोली है,’ नालसहित नीलकुवलय १ को भीतर रखनेवाले सुगन्धित मद्य-भरे पात्र में, अपने करवाल-तुल्य नयनों का प्रतिबिंब देखा और भ्रमर की भ्रान्ति से उस (प्रतिबिंब) को उड़ाने लगी।

वहाँ सोने का कर्णभूषण पहनी हुई, एक (तरुणी) ने मद्य मे दिखाई देनेवाले सुन्दर चन्द्र-प्रतिबिंब को अपने नयनों को सतुष्टि देती हुई देखा और उसे समझकर मधुर बच्चन कहने लगी—‘(हे चन्द्र !) तू आकाश के राहु नामक सर्प से डरकर यहाँ (इस मद्य पात्र मे) आ छिपा है, मैंने तुझे अभय प्रदान किया, तू डर मत।’

नदी-धारा की भौंरी एक ही स्थान पर स्थिर खड़ी रह गई है, ऐसा अनुमान उत्पन्न करनेवाली नाभि से शोभित एक (तरुणी) ने रक्त-मधु की वर्षा करनेवाले पुष्पों के चँदोवे को चीरकर नीचे झरनेवाली घनी ज्योत्स्ना को देखा और (मद्यपान से) ज्ञानभ्रष्ट हो जाने के कारण अथवा स्त्री-सहज अबोधता के कारण उसे मद्य समझकर पात्र मे भरने का प्रयत्न करने लगी।

बिजली के समान लचकती हुई कटिवाली एक (सुन्दरी) की उज्ज्वल अमृत-तुल्य मधुर वाणी बीच मे ही (पूर्ण हुए बिना ही) स्खलित हो जाती थी। वह (नारी) अपने जघन पर की मेखला को हटाकर उसके स्थान में पुष्पहारों को पहनने लगी और स्वर्ण-हार को केशों में धारण करने लगी। (ये सब मद्यपान से मत्त व्यक्ति के कार्य हैं।)

एक (रमणी) ने मद्य-भरे रत्नखचित चषक मे हास्ययुक्त अपने वदन (के प्रति-बिंब) को देखकर यह सोचा कि गगन पर का चन्द्र मधु की कामना से (उस पात्र मे) उतर आया है वह उस (प्रतिबिंब) से कहने लगी—‘हृदय को आनन्द देनेवाले अपने पति के साथ जब मैं मान करूँगी, तब तुम यदि मुझे जलाओगे नहीं, किंतु शीतल ही बने रहोगे, तो मैं यह मद्य तुमको पीने के लिए दूँगी।’

तिल-पुष्प सदृश सुन्दर नासिकावाली, आभूषण पहनी हुई एक रमणी नशे के कारण यह भी न जान सकी कि हाथ के काँप उठने से मद्य आसन पर गिर गया है और यह सोच कर कि अभी पात्र मे मद्य है उसे हाथ से उठाकर अपने पद्मराग तुल्य अधर से लगा लिया।

झुण्डो मे मँडराते हुए भ्रमर आकाश मे ऐसे फैले हुए थे, जैसे किसी बड़े लोभी की सम्पत्ति की कामना करते हुए याचक आ जुटे हो। एक सुन्दरी, मधुस्त्रावी कमल-समान अपने अरुण मुँह को खोलकर मद्य पीने से डरती थी (इसलिए कि कही भ्रमर मुँह मे न घुस जाये), अतः चपक मे कमल के खोखले नाल को रखकर उसके द्वारा मद्य (चूसकर) पीने लगी।

एक (रमणी), जिसकी आँखें चर्मकोष से तत्क्षण निकाले गये खड्ग के समान चमक उठती थी और जिनको देखकर जलपक्षियों से भरे कमल तड़ाग मे रहनेवाले मीन


१ कहा जाता है कि मद्य में सुगन्ध उत्पन्न करने के लिए कुवलय, कमल आदि पुष्पों को डाला जाता था।