कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ | कंब रामायण
विख्यात क्षीरसमुद्र से लगते थे, सब पर्वत अनंत भगवान् ( शिव ) के पर्वत ( कैलास ) के समान दीखते थे, उस चाँदनी के प्रसार के बारे में हम और क्या कहें ?
सभी निर्मल दिशाएँ तथा उनमें रहनेवाले सब चेतन-अचेतन पदार्थ उस चंद्रिका की बाढ में श्वेत हो गये थे, मानो समुद्र से घिरी यह धरती, वज्र-सदृश करवाल-युक्त मकर-केतन (मन्मथ) के (जन्मदिवस के सूचक) श्वेतवस्त्र को धारण किये हुए शोभित हो रही हो ।
सब रमणियाँ, उज्ज्वल तारकों के सदृश मुक्ताओं (के बने चँदोवे ) की छाया में, संचरमाण मेघों के विश्रामस्थान बने हुए उद्यान-रूपी जवनिकांतर में, सरोवरों के समान चमकते हुए स्फटिकों से प्रकाशमान काननों में और शोभायमान पुष्प-कुंजों में जा पहुँचीं ।
पुष्पों से सुरभित कुंतलवाली ( रमणियाँ ) पुष्पों की शय्याओं के ( रति ) समर में आनन्द पाने का विचार करती हुई मनोहर स्वर्ण-चषकों में ढाले गये अमृत-सदृश मद्य का पान करने लगीं ।
नक्षत्रों से शोभित गगन पर विहार करनेवाली (अप्सराएँ) तथा विद्याधर सुंदरियाँ भी जिनकी सुन्दरता की समता नहीं कर सकती, वैसी (सुन्दर) शरीरवाली तथा हरिणों को परास्त करनेवाले नयनों से युक्त वे ( रमणियाँ ) अपने मुख से मद्य को इस प्रकार पीने लगीं, मानो भ्रमरों से घिरे पुष्प में मधु डाला जा रहा हो ।
वह चषक, जो बिखरे हुए दूध के जैसे चन्द्र-किरणों से अंकित था, (किसी रमणी के ) कर की मनोहर अरुण कांति के पड़ने से लाल दिखाई पड़ने लगा है । उस अनुपम सुंदरी के मुख में गिरा हुआ मद्य अमृत बनकर चमक उठा ( अर्थात्, उसके श्वेत दाँतों की छाया से मद्य भी श्वेत हो उठा ), तब उसकी अंजन-लगी आँखें भी लाल हो गईं ।
पुष्पमाला, 'पुनहु' ( एक सुगन्धित द्रव्य ), शीतल अगरु का धूम, इनसे सुवासित कुंतलवाली (रमणियाँ), जिस श्वेत मद्य का पान करती थीं, वह ( मद्य ) अग्निकुण्ड में डाले गये होमघृत के समान अंतर में स्थित कामाग्नि को भड़काकर बाहर प्रकट कर देता था ।
क्रांतिपूर्ण ललाटवाली एक ( सुन्दरी ) स्वर्ण के बने शीतल सुगंधित मद्य-भरे चषक में अपने भव्य प्रतिबिंब को देखकर ( यह समझकर कि कोई अन्य नारी मद्यपान कर रही है ) कह उठी—'हे सखी, मेरे साथ तुम भी आनन्द से मद्यपान करो ।' विष समान दीर्घ नयन तथा सुधा-समान मधुरवाणी युक्त ( तरुणियों ) के अज्ञान-सदृश अज्ञान भी क्या कहीं हो सकता है ?
( यह टूट न जाये ) ऐसा डर उत्पन्न करनेवाली सूक्ष्मकटि-युक्त अप्सरा-समान कोई ( सुन्दरी ) अलकभार, विषाक्त शूल-सदृश काले नयन, रक्त मुख—इनसे सुशोभित हँसता हुआ अपना वदन मद्य में ( प्रतिबिंबित ) देखकर ( यह समझकर कि यह कोई अन्य नारी है ) कह उठी कि 'हे पगली, तू ने यह क्या काम किया ? यहाँ ( सुराही में ) अधिक मात्रा में मद्य के रहते हुए भी तू व्यर्थ ही जूठन का पान करती है' और अपने दंत-रूपी कुंद-कलियों को प्रकट करती हुई हँस पड़ी ।
अनुपम रूपवती, अन्यादृश ( विचित्र ) कठोरता रखनेवाले तथा हत्यारे शूल की समानता करनेवाले नयनों से युक्त ( एक रमणी ) रत्नमय मधुपात्र में श्वेत ज्योत्स्ना पड़ने