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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 549 में से

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पृष्ठ 140

१२८ कंब रामायण

भी व्याकुल हो भाग खडे होते थे, जो मधु से पूर्ण पुष्पो से अलंकृत कोमल कुंतलवाली और मयूर-तुल्य थी, इसलिए मद्यपान नही करती थी कि उसके हृदय में निवास करनेवाला प्रेमी मद्यसेवी नही था।

एक नारी क्रोध का अभिनय दिखानेवाले व्यक्ति के सामान ही यम-समान नेत्रो को लाल किये, ललाट पर टेढ़ी भौहो को चढ़ाये, चमकते दाँतो को कटकटाती हुई मनोहर पल्लवों को परास्त करनेवाले अपने करतलो से ताली बजाती थी।

एक रमणी, काँपते हुए अतिरक्त अधर-बिंब को श्वेत ज्योत्स्ना पर क्रोध करनेवाले अपने दाँतो से दबाये हुए, बहुत पैने और खून से लथपथ शूल-जैसी आँखो से घूर रही थी। उसकी देह से जो स्वेद बह चला, वह (शरीर से) बाहर उमड़ते हुए मद्य के समान ही दीखता था।

किसी नारी के बिंबफल-सदृश उभडे अधर से प्रकट होनेवाली लाली आँखो में जा चढ़ी। वह सोचती कुछ थी और कहती कुछ। उसके अनुपम कमल-तुल्य वदन पर भ्रू-रूपी धनुष झुक गये। ललाट-रूपी चन्द्र भी ओस बरसाने लगा।

(किसी के) सेमल के फूल-जैसे अधर की लाली छूट रही थी, दाँतो से मधुर-रस (लार) बह रहा था, स्तन-कुचुक का बंधन और नीवी-बंधन ढीले पड़ रहे थे, लहराते हुए केशपाश छूटकर लटक रहे थे। उसके वदन से हास उत्पन्न हो रहा था। पति-समागम और मद्यपान—दोनों एक ही जैसे (लक्षणवाले) होते हैं।

‘मुखर नूपुरवाले मन्मथ से मै जो पीड़ित हूँ, इस उस (मेरे प्रियतम) को बताओ,’ यो कहकर अपनी सखी को प्रियतम के पास भेजती हुई रत्न-खचित मेखलावाली एक (रमणी) ने फिर प्रश्न किया—‘हे सखी, क्या तुम भी मेरे मन के जैसे ही (प्रियतम के पास) रह जाओगी या (शीघ्र समाचार लेकर) लौट आओगी?’

हरिण को भी मुग्ध करनेवाले नयनोंवाली एक (रमणी) ने, किसी एक बलशाली नरेश के निकट, अपने अनुकूल रहनेवाली सभी सखियो को, एक के पीछे एक को भेज दिया। फिर स्वय ही अकेली उस (प्रियतम) के पास चल पड़ी।

सुगन्धित पुष्प-शय्या की परतों पर, सीमा-रहित प्रेम-समुद्र में डूबी हुई, मधु-भाषिणी एक (रमणी) ने अपने पति के मब नाम बतानेवाले तोते को बहुत आनंदित होकर अंक मे भर लिया।

उज्ज्वल ललाटवाली एक (रमणी) सुगंधित स्थान में रहती हुई, अपने सगी तोते को अंक मे लिये कह रही थी कि मेरे प्राण-सम (पति) को तू आज नहीं ला सका, फिर तू मेरी क्या सहायता कर सकता है? मेरे लिए तू क्रौंच पक्षी के समान (दुःख को बढ़ाने-वाला) हो गया है, और वह क्रुद्ध होकर रो पड़ी।

प्रियतम ने उसकी सौत का नाम लेकर उसका संबोधन किया, तो स्वर्ण-कंकण-धारिणी मयूर-सदृश एक (रमणी), अंकुर-सम दाँतो को प्रकट करती हुई हँस पड़ी और ‘कयल’ मीन-जैसे उसके नयनो से अश्रुधारा बह चली।

एक पुरुष ने अपने पूर्व अपराध के कारण मान किये बैठी हुई अपनी प्रेयसी का