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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड १२६

मान दूर करने की इच्छा से उस (रमणी) की, नितंबों पर फैली हुई मेखला को पकड़ा, तब स्वर्णवलय-भूषित उस (स्त्री) के नयनों में न समाकर मोती (जैसे आँसू) झर पड़े और टूट-कर बिखरे हुए मेखला के रत्नों के पास धरती पर जा गिरे।

पुष्प-भार से विकसित कुन्तलवाली (एक रमणी) अपने मन में विविध प्रकार विचार करती हुई बैठी रही कि प्रियतम से साक्षात् होते ही उससे मान करूँ या प्राणों को गलानेवाली विरह-पीडा को दूर करती हुई उससे मिलन का आनन्द उठाऊँ अथवा उसके गुणों का वीणा पर गान करूँ।

एक (रमणी) जो अपनी सखियों पर अपने (पति के साथ हुए) मान को वचनों के द्वारा नहीं प्रकट कर सकी, (किन्तु उन्हें मान की बात जताकर प्रियतम के साथ संधि करा लेना चाहती थी) मकरवीणा पर, विकसित कमल-समान अपने कर को लाल बनाती हुई फेरने लगी और अपने मन की बातें संगीत के द्वारा प्रकट करने लगी।

पुष्पित शाखा समान एक सुन्दरी (अपने पति के न आने से) मिलनसूचक रेखाएँ खींचने लगी, किन्तु उन रेखाओं के अपने अनुकूल फल न दिखाने से निःश्वास भरने लगी।¹ अनंग के अमोघ बाण से आहत होकर वह इस प्रकार पीडित हुई कि देखनेवाले 'इसके प्राण हैं या नहीं'—यह संदेह प्रकट करने लगे।

कुडुक को शोभा देनेवाली अँगुलियों से युक्त एक (रमणी) ने विरह से उद्विग्न होकर अपने सुन्दर (प्रियतम) के पास दूत भेजा। जब वह (प्रियतम) आ पहुँचा, तब उस सुन्दरी के नेत्र लाल हो गये और उसने कपाट बन्द करके मार्ग रोक दिया। न जाने उस सुन्दरी के मन में क्या विचार था?

एक तरुणी, जो पुष्प-शय्या पर (मान किये हुए सोई-सी पड़ी थी) यह चाहने लगी कि अब मान छोड़ दे, किंतु उसकी इच्छा को, उसका पति (जो उसके मान से व्याकुल हो मौन पड़ा था) नहीं समझ सका। तब उस सुन्दरी ने एक झूठी अँगड़ाई लेकर अपने हाथ-पैर फैलाती हुई यह प्रश्न किया कि कितनी घटिकाएँ बीत गई हैं?

एक (सुन्दरी) उतावली हो उठी और महावर लगे पाँव से (अपने पति पर) आघात किया, तो उस (पति) के रोमांच हो आया, मानो (आनन्द के) नीर से सिक्त शरीर-रूपी उद्यान में रोपे गये प्रेम-बीज अंकुरित हुए हों।

शत्रु-नरेशों को सतानेवाले करवाल का धनी एक वीर, रमणी (अपनी पत्नी) के स्तनों को अपनी प्रकृति के विरुद्ध कृश² हुए देखकर मन में उमंग से भर गया और आनन्द के कारण आपे से बाहर हो गया। उसका मुख चमक उठा और उसकी भुजाएँ फूल उठीं।

एक अतिसुन्दर पुरुष ने देखा कि उसकी प्रेयसी पुष्प-शय्या पर पड़ी है, जो मन्मथ


१. विरहिणी नायिका आँख बन्द करके बालू पर वर्तुल रेखा खींचती है, यदि उस रेखा के दोनो सिरे मिल जायें, तो वह मानती कि प्रियतम का मिलन होगा; नहीं मिलें, तो उसे अपशकुन मान लेती है।
२. यह ध्वनित होता है कि उसके वियोग के कारण ही उसकी प्रेयसी के स्तन कृश हो गये थे। अपने प्रति गाढ प्रेम की यह सूचना पाकर वह वीर अति हर्षित हुआ। —अनु०