कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ कव रामायण
से घिरी हुई इस प्रकार खड़ी थी, जिस प्रकार पल्लवो तथा पुष्पो के साथ बढनेवाली लताओ से घिरी हुई, सागर से उत्पन्न कोमल पुष्पवाली कल्पलता हो।
रथ से लिये हुए ( अग-जैसे ) जघनवाली, नारिकेल-वृक्ष से लिये हुए ( फल जैसे ) स्तनोवाली, अन्यत्र कही प्राप्त न होनेवाले सौन्दर्य से युक्त एक सुन्दरी जल मे मग्न होकर इस प्रकार ऊपर उठी कि कंचुक मे बँधे हुए उमके स्तन बाहर दिखाई देने लगे। तब उमका वदन निर्मल जल मे दृश्यमान चन्द्र के प्रतिबिंब के सदृश शोभित हुआ।
पर्वतो को परास्त करनेवाली भारी भुजाएँ, वस्त्र के अन्दर न समानेवाले विशाल जघन, घटो के समान स्तन—ये मब परस्पर धक्का देते हुए सघर्ष-से करने लगे, जिससे ( उस सरोवर का ) जल तटो को पारकर फैल गया ।
लाल अधर श्वेत हो गये, नेत्र लाल हो गये, शरीर का अगराग गलित हो गया, ( कटि मे बँधा ) वस्त्र खिसक गया। कुंकुमराग से लिप्त भारी स्तनोवाली रमणियाँ उस जलाशय मे इस प्रकार मग्न होने लगी कि उस समय वह जलाशय भी प्रेम के साथ आलिंगित होनेवाले उनके पति के समान दीखता था ।
'विशुद्ध ज्ञानवान् व्यक्ति के साथ सहवास करनेवाले ( साधारण ) नर भी ज्ञान प्राप्त करते हैं', यह कथन ठीक ही है, उसी प्रकार (उम जलाशय के) मीन भी मधु, कस्तूरी, शालवृक्ष का धुआँ, अगरु लकड़ी का धुआँ—इनकी गंध से सुवासित हो उठे थे। ( उपर्युक्त कथन के लिए ) इससे बढ़कर अब और क्या उदाहरण आवश्यक है ?
बडे राजाओं की देह से प्राप्त चन्दन-लेप, क्रीडा मे निरत रमणियो से प्राप्त कुंकुम-राग—इनसे भर जाने से वह मनोहर जलाशय ऐसा दिखाई पड़ता था, जैसे कोई नील मेघ आकाश की लालिमा से रँग गया हो ।
शरीर पर के अगरु, चन्दन आदि से बने अंगराग के धुल जाने से चाशनी-जैसी मीठी बोली तथा बिम्ब-जैसे लाल अधर से शोभित वे सुन्दरीयाँ सान पर चढाये गये रत्न के समान चमक उठी।
झपटनेवाले सिंह के समान एक वीर की स्वच्छ स्वर्णाभरण-भूषित भुजाओ पर आर्द्रचन्दन से लिखा गया चित्र जल का प्रवाह लगने से धुल गया । उसे देखकर एक तन्वी के लाल रेखाओ से अंकित काले नेत्र लाल हो उठे ।
काम-वेदना से जली हुई तथा नितंब-भार से युक्त एक रमणी के देह ताप से तप्त होकर, मकरंद-पूर्ण, नवविकसित तथा मधुस्रावी केशरवाले पुष्पो से युक्त वह तरंगायमान शीतल जलाशय भी उष्ण हो उठा ।
अनुपम पुष्पो से अलकृत भुजाओंवाले एक नरेश ने (अंजलि मे) जल उठाकर एक रमणी के तैलाक्त केशो पर चढ़ाया, जैसे रक्तपकज पर आसीन लक्ष्मी को श्रेष्ठगज अपने हाथ ( सूँड़ ) से जल-स्नान करा रहा हो।
तरुण हस कमल-पुष्पो पर बैठे थे। वे ऐसे लगते थे, मानो यह सोचकर कि ये कमल हमारी चंचल गति को परास्त करनेवाली ( सुन्दरीयो ) के मृदुल पदो की समानता कर रहे हैं, क्रोध प्रकट करते हुए उन पुष्पो को ( अपने पैरो से ) रौंद रहे हों।