कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ | कंब रामायण
भूतल पर उतर आई तथा अंगो के व्यापार मे, आकार मे, नाच मे, गान मे—सभी प्रकार से, भूतल की नारियो के साथ एकाकार हो गई और पृथ्वी की ललनाओ का (अप्सरा समझकर) आलिंगन करने लगी किन्तु इन ललनाओं को अपनी पलकें स्पंदित करते हुए देखकर विस्मय-विमुग्ध हो गई।
(दर्शकों में से) कुछ कहते—देखो, यह दशरथ का पुत्र है। कुछ कहते, यह कमलनयन है (विष्णु का भी एक नाम कमलनयन या 'पुण्डरीकाक्ष' है)। कुछ कहते—इसका शरीर ही कालमेघ है और (अतसी) पुष्प की तुलना करता है। कुछ कहते—यह मनुष्य नही है, मीन-भरे समुद्र का निवासी विष्णु ही है, किन्तु ससार भ्रम मे पड़ा है (इनको पहचान नही रहा है)।
कुछ कहते—इस कुमार (के सौन्दर्य) को देखने के लिए उस कुमारी (सीता) को सहस्र नयन चाहिए और उस लतांगी (सीता के सौन्दर्य) को देखने के लिए इस पुरुषश्रेष्ठ को भी वैसे ही सहस्र नयन चाहिए। फिर कहते—देखो, इसका भाई भी कितना सुन्दर है। इनको प्राप्त करके पृथ्वी अत्यत पुण्यवती हुई है। और, कुछ कहते—इस नगर मे इन कुमारों को ले आनेवाले मुनिवर (विश्वामित्र) को हम सभी नमस्कार करें।
यहाँ राजदरबार में यह दृश्य था। उधर चन्द्र और रात्रि के चले जाने पर (राम के) पुनर्दर्शन की अभिलाषा से, प्राणो को कुछ रोककर बैठी हुई उस लघुकटि, पीन उरोज, लाल रेखाओ से युक्त और काले भाले जैसे तीक्ष्ण नयन तथा स्वर्ण-कंकण से सुशोभित सीता की क्या दशा हुई, अब हम इसका वर्णन करेंगे।
वह सीता दोलायमान प्राणो के साथ (उष्णता से) शरीर को गलानेवाली पुष्प-शय्या को छोड़कर स्वर्णाभरणो से अलकृत चेरियो से घिरी हुई, वहाँ से उठी और सुन्दर कमल-सरोवर के तट पर एक स्फटिक-प्रासाद मे, चन्द्रकान्त से उत्पन्न शीतल जल से छिड़कायी हुई कोमल शय्या पर, बड़ी कठिनाई से जा लेटी।
(विरह-ताप से पीडित वह कहने लगी) शीतल सुरभित कमललताओ ! ऐसा प्रतीत होता है कि एक बाला की विरह-व्यथा को समझने की उदारता तुममें है, इसीलिए तुमने अपने पत्तो की छटा मे (उस श्रीरामचन्द्र के शरीर का) अपूर्व रंग दिखाकर मेरी मनोव्यथा को कुछ कम किया है, किन्तु मेरे पल्लव-समान रंग का हरण करनेवाले (उन रामचन्द्र) के नेत्रो की आतरिक काति को भी (अपने दलो में) दिखाकर मेरे प्राणो को लौटाने से क्यो पीछे हटती हो ?
(उन राम की भुजाओ को देखकर) लज्जित मेरु-सदृश उनका धनुष तथा उनकी डोरी पर सचरण करनेवाले उनके हस्त, स्तभ-सदृश उनके स्कध, बाणों से भरा तूणीर, उज्ज्वल चन्द्रिका-जैसा यज्ञोपवीत और जयमाला से अलकृत उनका वक्ष—ये सब फिर देखने को मिलेंगे, तो मेरे प्राण भी देखे जा सकेंगे। (अर्थात्, तभी मेरे प्राण बचेंगे, अन्यथा अदृश्य हो जायेंगे)।
नभोमडल मे प्रकाशमान चन्द्रमा और उनके साथ भ्रमरावृत पुष्पमालाधारी केशों