कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ६५
से अलंकृत दीर्घधनुर्धारी एक मेघ आया था, जो अपने दो नयनों से मेरे प्राणरूपी जल को उठाकर पी गया। वह मेघ मेरे हृदय में अब भी छाया हुआ है और सदा छाया रहेगा।
निष्ठुर मन्मथ ने ऐसे तीक्ष्ण वाण मेरे हृदय पर मारे हैं, जो तूल को जलाने-वाली अग्नि के समान मेरे प्राण हरकर चले गये हैं और उसे पीडित कर रहे हैं। अब मैं अत्यंत व्याकुल हो रही हूँ, ऐसी दशा में पास आकर मुझ अबला को जो अभयदान न दे, जो यह न कहे कि 'डरो मत, डरो मत'—उसका पौरुष भी कोई पौरुष है ?
हे कभी कृश न होनेवाले (मेरे) स्तन! उमड़ते-उमड़ते रहकर तुमने क्या काम किया ? उदय न होनेवाले (अर्थात्, सर्वदा एक जैसे चमकनेवाले) चन्द्र-जैसा कान्तिमान् वदनवाले, (शिव के) कठोर धनुष को उठानेवाले उस महाप्रभु (राम) के वक्ष का गाढालिंगन यदि प्राप्त करना चाहते हो, तो उसके लिए उचित तपस्या करो।
यह चन्द्रमा कहाँ से निकल आया है, जो मेरे ऐसे स्तनों पर विष बरसा रहा है, जिनसे मेरे हृदय में अनंग के द्वारा छोड़े गये शरों से उत्पन्न विरह-पीड़ा उमड़ रही है। विष बरसाने पर भी यह रात्रि-काल में उदित होनेवाला चन्द्र$^१$ नहीं है, क्योंकि इसके मध्य कलंक नहीं दीखता।
ह मेरे हृदय ! अनंग ने निकट आकर, क्रुद्ध हो शर बरसाये; उनके विष से जलाये जाकर भी मेरे ये प्राण जले नहीं है; किन्तु ये (प्राण) मेरे शरीर से निकलकर उष्ण मदजल बरसानेवाले काले हाथी के जैसे दीखनेवाले उस युवक (राम) के चरणों$^२$ की शरण में पहुँच गये थे। वे प्राण फिर लौटकर कैसे आयें ?
मानों गगनगत-मेघ, बिजली के साथ, इस धरती पर उतर पड़ा हो, ऐसा ही दीखनेवाला वह श्वेत यज्ञोपवीतधारी राजकुमार (रामचन्द्र) आया और चला गया। वह यद्यपि मेरे हृदय-गत है, तथापि मैं उसे जान नहीं पाती कि वह कौन है ? वह यद्यपि मेरे नयन-गत है, तथापि मैं उसे देख नहीं पाती। यह क्यों ?
उदार समुद्र में उत्पन्न, अन्यत्र दुर्लभ अमृत को पाकर भी उसे मनोहर स्वर्णकलश में न भरकर बहा देनेवाले मूर्ख के समान मैं रह गई और उस कुमार की महान् बलिष्ठ भुजाओं को देखते ही आलिंगन में न बाँधकर मैंने उसे हाथ से जाने दिया। अब बहुत कहने से क्या प्रयोजन ?
सोने के लेप-जैसे चिह्न-भरे स्तनोंवाली (सीता), उपर्युक्त प्रकार से कहती हुई, अत्यन्त व्याकुल हो, सिसक-सिसककर रोने और दुःख-सागर में डूबने लगी। इतने में मुदित-मन और अंजन-अंजित नयनोंवाली एक सखी पर्वत-जैसे धनुष के तोड़े जाने का समाचार लेकर आई। उसका वर्णन हम अभी करेंगे।
विशाल सरोवर में उत्पन्न नील कुईं समान नयनोंवाली माला नामक सखी, लचकती हुई बिजली की-सी शीघ्रता से आई; उसके रत्नमय कंठहार और कर्णाभूषण इन्द्रधनुष का
१. रामचन्द्र का मुख ही सीता की दृष्टि में फिर रहा है, जिसे वह चन्द्रमा समझती है। २. 'विष्णुपद' के दो अर्थ होते हैं—(१) स्वर्ग तथा (२) राम के चरण। मृत्यु प्राप्त करने पर प्राण फिर कैसे शरीर में आये, यह संकेत है।