कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 105, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ६३
कोई कहती—इस तत्त्वज्ञ मुनि में लज्जा नहीं है। कोई कहती--इस जनक से बढ़कर कठोर अन्य कोई व्यक्ति नहीं है। यह श्रेष्ठ कुमार यदि इस धनुष को न झुकावे, तो पीनस्तनी सीता भाग्यहीन हो जायगी।
मयूर-सदृश नारियाँ इस प्रकार कह रही थीं। उधर साधुजन शुभबचन कह रहे थे। स्वर्ग में देवता आनन्दित हो रहे थे। तत्र वे (राम) नाग (मत्तगज) तथा नाग (पर्वत) को लजाते हुए आगे पग बढ़ाते हुए चले।
उन्होंने बड़े स्वर्ण-पर्वत-सदृश उस धनुष को इस प्रकार उठाया, मानो वे सुवर्ण-चूड़ियाँ पहनी हुई दुर्लभ रत्न-समान (सीता) को पहनाने के लिए कोई दीर्घ पुष्पमाला उठा रहे हों।
देखने में बाधा पड़ेगी, इस भय से सभी दर्शक निर्निमेष नयनों से देख रहे थे, किन्तु वे लोग यह देख और समझ भी नहीं पाये कि कब उन्होंने धनुष के एक सिरे को पैर से दबाया और कब उसको झुकाकर दूसरे सिरे पर डोरी चढ़ा दी। उन्होंने केवल धनुष का उठाना देखा और उसके टूटने की ध्वनि सुनी।
उस ध्वनि को सुनते ही देवता डर गये कि ब्रह्माण्ड ही फट गया है। वे चिन्ता करने लगे कि अब हम किसकी शरण में जायें। अब इस पृथ्वी की क्या दशा हुई। मैं क्या कहूँ? नीचे इस पृथ्वी को अपने सिरपर ढोनेवाला, इसका मूल स्वरूप आदिशेष भी यों भयभीत हुआ, मानो उसके सिर पर वज्र गिर पड़ा हो।
'जयशील, शत्रु-भयंकर, शूलधारी जनक को आज पुण्यफल प्राप्त हुआ है'—यह सोचकर देवों ने पुष्प-वर्षा की। मेघों ने सोने की वर्षा की। झाग-भरे सभी समुद्रों ने विविध रत्नों को बिखेरकर आनन्द-घोष किया। मुनियों ने आशीष दिये।
मिथिला नगरी में श्वेतशंख तथा अमृतनादयुक्त विविध वाद्य बज उठे। पुष्प-मालाएँ, आभरण, चन्दन, सुगंध-चूर्ण, सुगंध-द्रव्य, समुद्रों से उत्पन्न उज्ज्वल मुक्ताएँ, स्वर्ण, मणियों, उत्तम वस्त्र आदि वस्तुएँ वहाँ के लोग दान करने लगे। वह नगर ऐसा लगा, जैसे पर्वकाल में (पूर्णिमा या अमावास्या के दिन) समुद्र उमड़ पड़ा हो।
भाले के जैसे नुकीले नयन और रात्रि में शोभायमान चन्द्रोपम वदनवाली रमणियाँ, वर्षा-ऋतु में गगन के नीर-भरे बादलों को देखकर नाचनेवाली मयूरों की जैसी नाच उठीं। उस समय सुनाद-भरी मकरवीणा की संगीत-सुधा बरसने लगी और मंदहास तथा कर्णाभरणों की चमक चारों ओर छा गई।
मानिनी नारियों ने, जिनके रक्तवर्ण और काले सुन्दर नयन मस्ती से भरे थे, अपना मान छोड़कर अपने-अपने प्रियतम का आलिंगन कर लिया। विशाल समुद्र में जैसे सफेद बादल पानी पिये, वैसे ही दरिद्रों ने जनक-महाराज की संपत्ति को भर लिया।
नर्तकों के मधुर गीत, रमणियों के अमृत-गीत, तन्त्री-वाद्य बजानेवालों की मकर-वीणा से उत्पन्न मधु-सदृश दिव्य गीत तथा वंशी के विविध गीत—इन सबका पान करते हुए देवता अपने शरीर और प्राण के जड़ीभूत होने से यों खड़े रहे, मानो चित्र ही हों।
देवलोक की अप्सराएँ, प्रभु के धनुष तोड़ने का अद्भुत दृश्य देखने के लिए