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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 549 में से

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पृष्ठ 104

६२ कंब रामायण

उज्ज्वल किरीटधारी देवो ने जब देखा कि बलशाली सुन्दर भुजावाले ये (जनक) वृषभवाहन (शिव) के धनुष के कारण उत्पन्न युद्ध मे शिथिल पड़ रहे है, तब उन्होंने कृपा करके इन्हे चतुरंग सेना प्रदान की। उस सेना को देखते ही वे शत्रु राजा डरकर इस प्रकार भागे, जैसे रात मे उल्लू को देखकर कौए डरकर भाग जाते हैं।

तव से अवतक अन्य कोई राजा इस शिव-धनुष के पास भी नही फटका। वे रथी नरेश, जो डर के मारे भाग खडे हुए थे, कभी नही लौटे। हम यही सोचते रह गये कि अब सीता का विवाह नही होनेवाला है। यदि यह कुमार (राम) धनुष चढ़ा दे, तो बड़ा हित होगा और पुष्पमालाालंकृत सीता का लावण्य व्यर्थ नही जायगा।—शतानन्द यों कहकर चुप हो रहे।

अपूर्व तपस्वी (विश्वामित्र) ने उस मुनि के वचनो पर विचार किया, फिर जटालंकृत अपना सिर हिलाया और युद्ध-कला मे निपुण वृषभतुल्य राम के मुख की ओर निहारा। चित्र की प्रतिमा-जैसे सौन्दर्यवान् (रामचन्द्र) ने विश्वामित्र के मन का विचार ताडकर उस दीर्घ शिव-धनु पर दृष्टिपात किया।

प्रवाहित घृत की आहुति पाकर जैसे प्रज्वलित अग्नि ऊपर उठती है, वैसे ही रामचन्द्र अपना आसन छोड़ उठ खडे हुए और (धनुष की ओर) पग धरने लगे। तब देवगण ने 'धनुर्भंग हो गया।' कहकर घोष किया। शत्रुत्रय, (काम¹ क्रोध और मोह) को परास्त करनेवाले ऋषियो ने उन्हे आशीष दिये।

पवित्र तपःसपन्न मुनि की आज्ञा पाकर श्रीराम ने अभी शिव-धनुप को चढाया भी नही था कि अनंग (मन्मथ) ने मनोहर आभूषणो से भूपित तरुणियों के हृदय मे तीर मार-मारकर सहस्रो धनुषों को तोड़ दिया।

वहाँ की नारियाँ कई प्रकार की बातें करने लगी। कोई कहती—यह सामने रखा हुआ धनुष भीतर से बहुत ही कठोर है। और कोई कहती—यदि लज्जाशील सीता के मनोहर लाल कर को इस कुमार (राम) का विशाल हाथ न छुए, तो (अर्थात्, इन दोनो का विवाह न हो तो) क्रात ललाटवाली (सीता) का जीवन ही व्यर्थ हो जायगा।

कुछ नारियाँ अपने करो को जोड़कर कहती—यदि मत्तगज-समान यह राजकुमार हमारी आँखो को आनन्दाश्रु से भरते हुए इस धनुप को न चढ़ा दे, तो हम कस्तूरीगंध-युक्त केशोवाली सीता के साथ जलानेवाली अग्नि मे डूब जायेंगी।

कोई कहती—ये वदान्य महाराज (जनक) यदि सीता का विवाह करना चाहते, तो इस राजकुमार को देखते ही यह कहकर कि 'मेरी कन्या सीता से विवाह कर लो,' पहले ही अपनी कन्या उन्हे दे देते। उलटे, इन्होने गगा को जटा मे बाँधनेवाले (शिवजी) के धनुष को लाकर इस कुमार के सामने रख दिया है यह कैसा भोलापन है ?


¹ संस्कृत-ग्रन्थों मे अरि-षड्वर्ग' प्रसिद्ध र। तमिल-ग्रन्थों मे प्रायश काम, क्रोध, मोह, मद, लोभ, मात्सर्य—इन छह दुर्गुणों को काम, क्रोध और लोभ के अंतर्गत मानकर 'शत्रुत्रय' का प्रयोग होता है। —अनु०