कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ | कंब रामायण
लेश मात्र प्रेम से भी रहित उन (परशुराम) के हाथ के धनुष को लेकर (उसके बदले) उन्हे अनुपम अपयश देनेवाले उन महानुभाव (राम) को (दशरथ ने) अंक में भर लिया, सिर सँघा तथा अपने सुन्दर नेत्रों के आनन्दाश्रु-रूपी कलश-धार से अभिषिक्त किया।
दशरथ ने सोचा—इस छोटी अवस्था मे ही इसने जो अपूर्व कार्य किया है और पराक्रम दिखाया है, वह तीनो लोको के निवासियो के लिए भी असाध्य है। निश्चय ही यह कुमार कर्म करनेवालो को ऐहिक और पारलौकिक फल प्रदान करनेवाला 'परमतत्त्व' है।
तब राम ने पुष्पवर्षा करते हुए आगत देवताओ में सुन्दर शूलधारी वरुण को देखकर, यह कहकर कि—इस महिमा-मय कठोर धनुष को सुरक्षित रखो, उस विष्णु के धनुष को उसे सौंप दिया और आनन्द-घोष करनेवाली अपनी सेना को साथ लेकर प्रसिद्ध तथा जल-समृद्ध अयोध्या नगरी को जा पहुँचे।
सब लोग अयोध्या पहुँचकर आनन्द से रहने लगे। तब एक दिन, पराक्रमशाली तथा मार्जना से युक्त भेरी-वाद्यो से प्रतिध्वनित सेनावाले चक्रवर्ती ने, (भरत से) अति सुन्दर तथा मंगलप्रद वचन कहे —
तात ! तुम्हारे मातामह, प्रसिद्ध शासक केकयाधिप तुम्हे देखना चाहते हैं, अतः आभरणो से प्रकाशमान वक्षवाले ! सरोबरो में स्थित शंख (कीटों) से प्रतिध्वनित केकय देश को तुम जाओ।
(दशरथ के) आदेश देते ही भरत ने उन्हे नमस्कार किया, फिर राम के चरण-कमलो को अपने सिर पर धारण किया और राम के अनन्यप्राण भरत उन्हे छोड़कर इस प्रकार चले, जैसे प्राणो को छोड़कर शरीर चला जा रहा हो।
अयालयुक्त अश्वो तथा रथो से विशिष्ट एव शंखो से प्रतिध्वनित सेनायुक्त 'युधाजित्' नामक राजा उनके साथ चले। भरत अपने अनुज (शत्रुघ्न) को साथ लेकर, सात दिनो मे शीतल जल से समृद्ध केकय देश मे जा पहुँचे।
भरत चले गये। चक्रवर्ती (दशरथ) त्रुटिहीन शासन करते रहे। देवो की तपस्या अभी शेष थी, जिससे आगे जो घटनाएँ घटित हुई, अब उनका वर्णन करेंगे।
(१—५०)