कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १६५
एक दानव-समान राजा ने मेरे निर्दोष पिता को क्रोध-हीन (तपस्वी) जानकर भी मारा था, तो मैंने क्रुद्ध होकर—
इक्कीस बार, धरती के किरीटधारी राजाओं को उग्र परशु की धार से समूल उखाड़ फेंका। उनके शरीर से प्रवाहित रक्त-धारा में यथाविधि, अपने पिता के प्रति करणीय तर्पण-कृत्य पूरा किया। (इसके उपरान्त) अपने कोप को दबा दिया।
समस्त पृथ्वी को मुनिवर (काश्यप) को दान कर दिया; अपने बड़े-बड़े वैरियाँ को दबा दिया। बड़े तप में निरत होकर (महेन्द्र) नामक पर्वत पर निवास करता रहा। तुम्हारे शिवधनुष को तोड़ने की ध्वनि वहाँ पर सुनाई दी, तो कोप उत्पन्न हुआ और यहाँ आया हूँ। यदि तुम बलवान् हो, तो तुम्हारे साथ युद्ध करूँगा। पहले इस धनुष को चढ़ाओ—
(परशुराम के) इस प्रकार कहते ही, राम ने मुस्कराकर, प्रकाशमान वदन से कहा—नारायण ने अपने बल से जिस धनुष का अभ्यास किया था, वह मुझे दीजिए। परशुराम ने वह धनुष दिया। वीर (राम) ने उसे लिया और अपने भुजबल से उसे झुकाया, जिसे देख भारी घनी जटावाले (परशुराम) भी भयभीत हो गये। फिर (राम ने) कहा—
यद्यपि तुमने भूलोक के राजकुल का विनाश किया है, तो भी वेदज्ञ ऋषिवर के पुत्र हो, और तपस्वी का वेष धारण किया है, अतः तुम (मेरे लिए) अवध्य हो; किन्तु मेरा बाण भी व्यर्थ न होनेवाला है, अतः इसका लक्ष्य क्या हो—शीघ्र बताओ।
(राम के वचन सुनकर परशुराम ने कहा—) हे नीतिज्ञ ! कोप न करो; तुम सबके (सारे विश्व के) आदि (कारण) हो, मैंने तुम्हे पहचान लिया। हे तुलसीमालाधारी चक्रधारिन् ! श्वेत चन्द्र-कलाधारी (शिव) का धनुष टुकड़े-टुकड़े क्या हुआ, वह तो तुम्हारे पकड़ने के भी योग्य नहीं था।
स्वर्णमय वीर-कंकण तथा रमणीयता से युक्त चरणवाले ! तुम चक्रधारी (विष्णु) ही हो, यह सत्य है। अतः, अब (तुम्हारे रहते हुए) संसार पर क्या विपदा आ सकती है ? मैंने जो धनुष तुमको दिया है, वह भी तुम्हारे बल के लिए पर्याप्त नहीं है।
तुम्हारे द्वारा चढ़ाया हुआ यह बाण व्यर्थ न हो, इसलिए वह मेरे किये गये सब तप को मिटा दे। परशुराम के यह कहते ही, (श्रीराम का) हाथ किंचित् ढीला पड़ गया। वह बाण भी जाकर उनकी सारी तपस्या को सँजोकर लौट आया।
तब, स्वच्छ नीलरत्न-वर्णवाले ! मनोहर तुलसीमाला धारण करनेवाले ! सब के प्राणभूत पुण्यस्वरूप ! तुम्हारे संकल्पित सब कार्य अनायास ही पूर्ण हो जायेंगे। अब मुझे आज्ञा दो।—यह कहकर परशुराम प्रणाम करके चले गये।
पुनः प्राप्त प्रजावाले, विपदा से विमुक्त हो उल्लसित होनेवाले, मत्तगज की सेना-वाले (दशरथ) जो दुर्लंघ्य विपत्-सागर को पार कर चुके थे, अब आनन्द नामक वेलाहीन समुद्र में डूब गये।