कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६४ | कंब रामायण |
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करूँगा और स्वर्ग प्राप्त करूँगा। हे महात्मन् ! मै आपका चरण-दाम हूँ। मेरे कुल सहित मुझे न मिटा दें। आप से मेरी यही विनती है।
यों प्रार्थना करनेवाले अपने पैरो पर पडे हुए (चक्रवर्त्ती) को (परशुराम ने) कुछ वस्तु ही नही समझा, किन्तु प्रज्वलित दृष्टि से देखकर वे स्वर्ण रंग के वस्त्रधारी (राम) के सम्मुख आ पहुँचे उनकी यह निष्ठुरता देखकर तथा अपना कोई उपाय फलीभूत होते न देखकर (दशरथ) विकल-प्राण हुए और बिजली को देखे हुए साँप के समान मूर्च्छित हो गये।
मानधन मुकुटधारी (चक्रवर्त्ती) की मूर्च्छा की कुछ परवाह न करनेवाले तथा स्वयं उनको (परशुराम को) भी वैसी ही दशा मे पहुँचानेवाला जो कर्म-परिपाक उन्हें घेर रहा था, उसे दूर करने का उपाय न जाननेवाले उन्होने (परशुराम ने) कहा- 'डमरूधारी उमापति वह पुराना का धनुष शक्तिहीन हो गया था। उसका पुराना वृत्तान्त तुम सुनो-
भूलोकवासियो के लिए अप्राप्य शिल्प-निपुणता से युक्त विश्वकर्मा ने पुरातन काल में एक चक्रवाले रथ पर आरूढ (सूर्य) की भ्राति उत्पन्न करनेवाले, अति प्रकाशमान, तोड़ने में दुष्कर तथा सञ्चरणशील मेघो से आवृत उत्तर मेरु के बल से युक्त, दो अनुपम धनुष निर्मित किये।
उनमें से एक को उमापति ने ग्रहण किया, दूसरे धनुष को, विराट् रूप धारण कर सारे विश्व को नापनेवाले त्रिविक्रम (विष्णु) ने अपने सुन्दर कर में धारण किया। यह विषय जानकर देवताओ ने ब्रह्मा से पूछा कि उन दोनो धनुषो मे अधिक बलवान् कौन है ?
सुरभित कमल पर आसीन (ब्रह्मा) ने सोचा कि देवता लोग (दोनो धनुषो की परीक्षा लेने का) जो विचार कर रहे हैं, वह उचित ही है, और एक सफल उपाय के द्वारा उन शक्तिशाली धनुषो के व्याज से परब्रह्म के रूप मे एक बनकर रहनेवाले उन दोनो देवो के मध्य घोर युद्ध उत्पन्न कर दिया।
दोनो (शिव और विष्णु) दोनों धनुषो पर डोरी चढ़ाकर युद्ध करने लगे, तो सातो लोक भय-कम्पित हो गये। दिशाएँ डगमगाने लगी। दोनो कोपाग्नि उगलने लगे। तब त्रिपुर का दाह करनेवाले (शिव) का धनुष कुछ टूट गया- इस पर वे (शिव) अधिक क्रोध से भर गये।
(शिव) फिर युद्ध के लिए उद्यत हुए, तो देवो ने उन्हें युद्ध से हटा दिया। ललाटनेत्र (शिव) ने अपना धनुष देवाधिदेव (इन्द्र) के हाथ मे दे दिया उधर विजयशील नीलवर्णदेव (विष्णु) भी अपना धनुष महान् तपस्वी ऋचीक मुनि को देकर चले गये।
ऋचीक ने वह धनुष मेरे पिता को दिया और अपने पिता से मैने यह धनुष प्राप्त किया। हे वत्स ! यदि तुम इस मेरे धनुष को चढ़ा दोगे, तो तुम्हारी ममता करनेवाला नृप अन्य कोई नही होगा। मैं तुम्हारे साथ युद्ध करने को जो विचार कर रहा हूँ, वह भी छोड़ दूँगा और सुनो-
सड़े हुए धनुष को तोड़नेवाला जो बल है, उस पर फूल उठना अच्छा नहीं है। हे मनुवशज ! और भी सुनो। (मेरा) तुम क्षत्रियो के साथ पुराना वैर है प्राचीन काल में