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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 549 में से

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पृष्ठ 175

बालकाण्ड १६३

पहुँचे। प्रभु (रामचन्द्र) के जन्म के कारण-भूत दशरथ चक्रवर्त्ती ने उन्हें देखा और उस कठोर व्यक्ति के आगमन से आशंकित होकर भारी वेदना से ग्रस्त हो गये।

उमंग से चलनेवाली सेना भयग्रस्त हो इधर-उधर भागने लगी; उज्ज्वल भृकुटियो को परस्पर सम्मिलित कर (भौंहें सिकोड़कर), आँखों से चिनगारियाँ उगलते हुए, वज्र के सदृश, अत्यन्त क्रोध के साथ, वे (परशुराम) रथ पर आनेवाले सिंह के समान कुमार के सम्मुख आये; मनोहर नयनवाले नृप-कुमार (राम) भी यह सोचने लगे कि यह महात्मा कौन हैं १ इतने मे-

चक्रवर्त्ती (दशरथ) बीच में आ पहुँचे और अति सुन्दर सत्कार करके अपने सुवासित सिर को धरती पर लगाकर उनके चरणों को प्रणाम किया; किन्तु (उनकी परवाह न करके) वे अपने कोप का पार न पाकर कल्पात की अग्नि-ज्वाला फैलाते हुए वीर (राम) के सम्मुख आकर बोले-

जो धनुष टूट गया, उसकी शक्ति को मैं जानता हूँ। अब तुम्हारी स्वर्ण-भूषित भुजा के बल की परीक्षा करने की मेरी इच्छा है। युद्ध करके पुष्ट हुई मेरी भुजाओ में कुछ खुजलाहट भी हो रही है यहाँ मेरे आगमन का कारण यही है; दूसरा कुछ नहीं।

जब वे (राम से) ये वचन कह रहे थे, तब चक्रवर्त्ती ने घबराकर उनसे निवेदन किया-आपने सारी भूमि को जीतकर एक मुनि (कश्यप) को दान कर दिया था। आप जैसे कृपालु के लिए शिव, विष्णु और ब्रह्मा भी कोई वस्तु नहीं हैं, (तो) ये क्षुद्र मनुष्य किस वित्ते के हैं १ अब यह (मेरा पुत्र) और मेरे प्राण आपकी शरणागत हैं।

(दशरथ ने आगे कहा-) आग उगलनेवाले परशु को धारण करनेवाले ! महान् पापो को इच्छा-पूर्वक करनेवाले ही तो मरण के पात्र होकर (आपके द्वारा) मृत्यु प्राप्त करते हैं १ क्या इस (राम) ने अहंकार के मद मे बुद्धि-भ्रष्ट होकर कोई अपराध किया है १ युद्ध करने योग्य बलवानो के निकट न जाकर निर्बल व्यक्तियों के पास जाने से बलवानो के बल की क्या शोभा हो सकती है १

हे अपार तपस्या-सपन्न ! आपने सप्तद्वीपमय पृथ्वी पर एकाधिकार प्राप्त करने के पश्चात् उसे (पृथ्वी को) 'लो, तुम इसे अपनाओ', कहकर (कश्यप को) दे दिया था। अब फिर ऐसा काम न कीजिए। विशाल शीतल समुद्र से आवृत भूमि पर स्थित नरपतियो पर कृपा कीजिए और अपना कोप शात कीजिए। क्या आपका यह कोप उचित है १-यों विविध प्रकार की बाते कही।

(दशरथ ने आगे कहा-) उस पराक्रम से भी क्या होता है, जो निष्पक्ष न हो, केवल बढ़ा हुआ हो और सब लोग जिसकी निन्दा करते हो। क्या उस पराक्रम से कोई धर्म-कर्म पूर्ण हो सकता है १ बल या पराक्रम वही तो (सार्थक) होता है, जो धर्म-मार्ग पर स्थित हो और श्रेष्ठ यश से संयुक्त हो। हे पराक्रमी! (आप जो अब करने को उद्यत हो रहे हैं) क्या यह पराक्रम कहलाने योग्य है १'

'मेरा पुत्र (आप से) वैर करनेवाला नहीं है। हे उपलस्तंभ-सदृश भुजावाले ! यदि यह (पुत्र) प्राणहीन हो आये, तो मै अपने बंधु-जन तथा प्रजा के साथ प्राण-त्याग

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