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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 174

१६२ कंब रामायण

निकटस्थ लोग सोचने लगे—खुले हुए व्रण से प्रवाहित रक्त के जैसे (लाल) नेत्रों से अग्नि-ज्वाला प्रसारित करनेवाले (इन परशुराम) का यह कोप किसलिए उत्पन्न हुआ? क्या स्वर्ग को धरती पर गिराने के लिए? भूलोक को आकाश में उठाने के लिए? या असख्य प्राणियों को यम के मुख में डालने के लिए? (किसलिए ये कोप कर रहे हैं?)

युद्ध के मध्य तीव्र हो उठनेवाले परशु के अग्र भाग से अग्नि-शिखा प्रज्वलित हो उठी। जिससे रथारूढ होकर (मेरु) पर्वत की परिक्रमा करनेवाला सूर्य भी दिग्भ्रान्त हो भटकने लगा। (उनके शरीर से) ऐसा प्रज्वलित तेज निकल पड़ा, मानों समुद्र में रहने-वाली वडवाग्नि ही आकाश तक उठकर प्रज्वलित होती हुई धरती पर चली आ रही हो।

उनकी बलिष्ठ भुजाएँ दिगन्तों में जा फैलीं। चारो ओर बिखरी हुई उनकी जटामय शिखा नभ को छू रही थी। श्वेत चन्द्र भी उनके अतिनिकट दिखाई देता था। वे समुद्र, जल, अग्नि, वायु, भूमि, आकाश सबके विनाशकारी, कल्पांत के समय में तांडव करनेवाले उमापति (रुद्र) की समता कर रहे थे।

(ऐसे वे परशुराम आ पहुँचे) जिनके पास अति तीक्ष्ण धारवाला ऐसा फरसा था, जिसका प्रयोग करके उन्होंने सैकत वेला-युक्त समुद्र से घिरे हुए समस्त भूलोक पर छा जानेवाली बलशाली सेना से विशिष्ट तथा पराक्रमी नरेशों से तिलकायमान (कार्तवीर्यार्जुन) रूपी सजीव महावृक्ष की एक सहस्त्र उन्नत भुजा-रूपी वज्रमय शाखाओं को काट दिया था।

क्षत्रिय-कुल पर एक कलंक (जमदग्नि की हत्या के कारण) लग गया था, जिससे परशुराम ने भूलोक के राजसमूह का समूल नाश करते हुए अपने परशु से इक्कीस पीढ़ियों तक उनके प्राण हरे थे, भूमि के पापों का उन्मूलन किया था और उमड़ते समुद्र-जैसे तरगायित उनके रक्त-प्रवाह में डूबकर अकेले ही गोता लगाया था।

क्षमास्वरूप महान् तपस्या तथा जलानेवाली अग्नि-स्वरूप महान् कोप—ये जिसमें अत्यधिक मात्रा में थे, अस्त्र-प्रयोग की स्पर्धा में जिनके सम्मुख शिथिल पड़कर कार्त्तिकेय बीच में ही (स्पर्धा छोड़कर) चले गये थे और जिन्होंने क्रोध के साथ विलक्षण तीक्ष्ण बाणों का प्रयोग करके उच्च शिखरवाले (क्रौंच) पर्वत में ऐसा छेद कर दिया था, जो ऊँचे उडनेवाले पक्षियों के लिए (आने-जाने का) एक सुन्दर मार्ग बन गया था।१

जो अनायास ही पर्वतों को (भूमि में) धँसा सकते थे, समुद्रों को बहा देने में समर्थ थे और जिन्होंने मेघस्पर्शी पर्वत को भेद दिया था, वे परशुधारी वहाँ आ


१. यह कथा प्रसिद्ध है कि सुब्रह्मण्य और परशुराम ने शिवजी से अस्त्र-विद्या प्राप्त की। अस्त्र-विद्या की परीक्षा के समय सुब्रह्मण्य बाणों से क्रौंच पर्वत को भेद नहीं सके; किन्तु परशुराम ने अपने बाणों का प्रयोग कर उसमें छेद कर दिया। उसके पश्चात सुब्रह्मण्य ने अपना भाला फेंककर उस पर्वत को तोड दिया। उस पर्वत के शिखर के गिरने से दक्षिण दिशा में सरोवर ध्वस्त हो गये। तब वहाँ के हंस परशुराम-कृत छेद के मार्ग से क्रौंच पर्वत के उत्तर में पहुँच गये और हिमालय के मानस में निवास करने लगे।—अनु०