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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

अध्याय २२

परशुराम पटल

जनक-पुत्री के संग श्रीराम नानाविध भोगों का उचित प्रकार से अनुभव कर रहे थे। उस समय महातपस्वी कौशिक, वेद-विहित रीति से आशीर्वाद देकर, उत्तर दिशा में अत्युन्नत हिमालय की ओर चले।

एक दिन बलशाली चक्रवर्ती (दशरथ) ने आदेश दिया कि हमारी सेना अब हमारे साथ सुन्दर (अयोध्या) नगर के लिए प्रस्थान करे। हाथियों के जैसे नरेशों से वंदित होते हुए, वे एक अनुपम रथ पर आरूढ हुए।

सर्व प्रकार के बलों से युक्त दशरथ (अयोध्या के) मार्ग पर आ पहुँचे, उस समय, उनके पुत्र तथा पुत्रवधुएँ उनके चरण की वंदना करके उनके संग हो लिये। राजकुमार तथा अन्य लोग उनके पार्श्वों में चलने लगे। मिथिला नगर की प्राचीन जनता भी उनके वियोग से ऐसा दुःख अनुभव करने लगी, जैसा प्राणों के वियोग से शरीर को होता है।

दीर्घ किरीटधारी (दशरथ) यथाविधि आगे-आगे जा रहे थे और उस मनोहर महानगर मिथिला के निवासियों के मन उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। उनके मध्य में, अपने ही सदृश (अपने) भाइयों के द्वारा अनुगत होते हुए, वीर (राम) मेघस्थ बिजली-सदृश कटिवाली (सीता) के साथ सुन्दर ढंग से चलने लगे।

वे जब इस प्रकार जा रहे थे, तब मयूर उनके दक्षिण की ओर आये (जो शुभ-शकुन था) और कौए आदि पक्षी बाईं ओर जाकर उनके मार्ग में बाधा उपस्थित करने लगे (जो अपशकुन था)। यह देखकर गजतुल्य (दशरथ) यह सोचकर कि 'मार्ग में कुछ बाधा उपस्थित होनेवाली है', अपने आकाशस्पर्शी रथ के साथ आगे न बढ़कर मार्ग के मध्य में ही रुक गये।

इस प्रकार रुककर उन्होंने एक शकुन-शास्त्रज्ञ को बुलाकर पूछा कि ये (शकुन) अच्छे हैं या कुछ विपदा आनेवाली है ? तुम निष्पक्ष होकर सच-सच बताओ। तब पर्वत-तुल्य भुजावाले उन चक्रवर्ती के सम्मुख पक्षियों के संकेत को पहचाननेवाले उस व्यक्ति ने कहा—अब कुछ बाधा उपस्थित होनेवाली है, किन्तु फिर वह दूर हो जायगी।

शकुनज्ञ यह कह ही रहा था, इतने में (परशुराम), जिनकी जटाओं से आकाश के अन्धकार को दूर करनेवाली कांति चारों ओर बिखर रही थी, जिनके हाथ में फरसा था, जो चलनेवाले स्वर्ण-पर्वत के सदृश थे, जो अग्नि उगलते थे, जो अग्नि के समान भयंकर नेत्रवाले थे और जो वज्र-सदृश कठोर वचन-युक्त थे, वहाँ आ पहुँचे।

(उनको देखकर) उद्वेलित समुद्र में फँसी हुई नौका के जैसे लोग डगमगा उठे; महान् दिग्गज, जो स्तंभ के जैसे धरती को धारे खड़े थे, डिग उठे; समुद्र बौखलाकर उमड़ गये और स्थानांतरित होने लगे, स्वर्ग के निवासी भयभीत हो अपना-अपना स्थान छोड़ भागने लगे; रक्तस्वर्ण का एक धनुष झुकाकर, उसकी डोरी को चढ़ाकर टंकारित करते हुए तथा उसपर तीक्ष्ण बाण चुन-चुनकर रखते हुए (परशुराम) आये।