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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 549 में से

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पृष्ठ 172
१६०कंब रामायण

में भरकर कहा--रमणीय नयनवाले (राम) की पत्नी बनने योग्य इसके अतिरिक्त कोई दूसरी नारी कहाँ है ? सीता को देख-देखकर उनकी आँखें आनन्द से भर गईं और उनके मन उमग से भर गये।

उन्होंने अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और कहा कि स्त्री-समुदाय के भूषण-जैसी तुमको असीम स्वर्ग, असंख्य अपूर्व आभरण, (दासियो के रूप मे) असंख्य सुन्दरियाँ, विशाल भूमप्रदेश और अमूल्य रेशमी वस्त्र आदि स्त्री-समुदाय के भूषण प्राप्त हों। यह कहकर उन्होने कई आभरण आदि उन्हे दिये।

पवन से तरंगायित समुद्र-जैसे नील वर्णवाले करुणासमुद्र (राम), शास्त्र-समुद्र स्वरूप मुनियो का आदेश पाकर, आनन्द-समुद्र बने हुए मनवाली (सीता) के साथ अपने पुरातन पर्यंक क्षीर-समुद्र जैसे पर्यंक पर जा पहुँचे।

[ इस पद्य मे 'समावेशन' नामक विधान की ओर संकेत है, जिसमे दंपती ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एक साथ रहकर चार रात्रि व्यतीत करते हैं।]

मीन मास (फाल्गुन) के उत्तरफाल्गुनी नक्षत्र-युक्त दिन मे सहस्र नामवाले सिंह-सदृश (राम) का विवाह सम्पन्न हुआ, और उसके योग्य मंगलप्रद होमाग्नि को वसिष्ठ मुनि ने समृद्ध किया।

अकलंक जयशाली (जनक) ने (दशरथ आदि) बन्धु-जनो से परामर्श करके निश्चय किया कि अपनी दूसरी पुत्री (ऊर्मिला) तथा अपने अनुज की दो पुत्रियों (मांडवी और श्रुतकीर्ति) इन तीनो लक्ष्मी-सदृश कन्याओ का विवाह राम के तीनो भाइयो के साथ कर दिया जाय।

पुष्पमालाधारी जनक और घृतसिक्त शूलधारी कुशध्वज नामक उनके अनुज, दोनों की तीन पुत्रियों के साथ, जो सभी योग्य गुणो से शोभित थी, काजल लगी आँखोंवाली थी, और सुन्दरियों के सदृश रमणीय थी, और प्राप्तवय थी, तीनो (लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न) ने विवाह कर लिया।

उन सब (भाइयो) का विवाह सम्पन्न होने के पश्चात् चक्रवर्ती (दशरथ) अनेक वर्षों से अर्जित अपने यशमात्र को छोड़कर, उसके अतिरिक्त अन्य सब प्रकार की सम्पत्ति का दान कर दिया और जिसने जो-जो और जितना भी माँगा, उसको वह सब दे दिया।

(उस प्रकार) दान करके चक्रवर्ती दशरथ विलक्षण तथा असीम आनन्द को प्राप्त हुए, फिर वेद-शास्त्रो के मर्मज्ञ तथा महातपस्वी मुनियो के साथ, उस (मिथिला) नगर में विश्राम करते रहे। इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत हुए। उसके पश्चात् क्या घटित हुआ, वह (आगे) कहेंगे। (१-१०४)