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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ
१६०कंब रामायण

में भरकर कहा--रमणीय नयनवाले (राम) की पत्नी बनने योग्य इसके अतिरिक्त कोई दूसरी नारी कहाँ है ? सीता को देख-देखकर उनकी आँखें आनन्द से भर गईं और उनके मन उमग से भर गये।

उन्होंने अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और कहा कि स्त्री-समुदाय के भूषण-जैसी तुमको असीम स्वर्ग, असंख्य अपूर्व आभरण, (दासियो के रूप मे) असंख्य सुन्दरियाँ, विशाल भूमप्रदेश और अमूल्य रेशमी वस्त्र आदि स्त्री-समुदाय के भूषण प्राप्त हों। यह कहकर उन्होने कई आभरण आदि उन्हे दिये।

पवन से तरंगायित समुद्र-जैसे नील वर्णवाले करुणासमुद्र (राम), शास्त्र-समुद्र स्वरूप मुनियो का आदेश पाकर, आनन्द-समुद्र बने हुए मनवाली (सीता) के साथ अपने पुरातन पर्यंक क्षीर-समुद्र जैसे पर्यंक पर जा पहुँचे।

[ इस पद्य मे 'समावेशन' नामक विधान की ओर संकेत है, जिसमे दंपती ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एक साथ रहकर चार रात्रि व्यतीत करते हैं।]

मीन मास (फाल्गुन) के उत्तरफाल्गुनी नक्षत्र-युक्त दिन मे सहस्र नामवाले सिंह-सदृश (राम) का विवाह सम्पन्न हुआ, और उसके योग्य मंगलप्रद होमाग्नि को वसिष्ठ मुनि ने समृद्ध किया।

अकलंक जयशाली (जनक) ने (दशरथ आदि) बन्धु-जनो से परामर्श करके निश्चय किया कि अपनी दूसरी पुत्री (ऊर्मिला) तथा अपने अनुज की दो पुत्रियों (मांडवी और श्रुतकीर्ति) इन तीनो लक्ष्मी-सदृश कन्याओ का विवाह राम के तीनो भाइयो के साथ कर दिया जाय।

पुष्पमालाधारी जनक और घृतसिक्त शूलधारी कुशध्वज नामक उनके अनुज, दोनों की तीन पुत्रियों के साथ, जो सभी योग्य गुणो से शोभित थी, काजल लगी आँखोंवाली थी, और सुन्दरियों के सदृश रमणीय थी, और प्राप्तवय थी, तीनो (लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न) ने विवाह कर लिया।

उन सब (भाइयो) का विवाह सम्पन्न होने के पश्चात् चक्रवर्ती (दशरथ) अनेक वर्षों से अर्जित अपने यशमात्र को छोड़कर, उसके अतिरिक्त अन्य सब प्रकार की सम्पत्ति का दान कर दिया और जिसने जो-जो और जितना भी माँगा, उसको वह सब दे दिया।

(उस प्रकार) दान करके चक्रवर्ती दशरथ विलक्षण तथा असीम आनन्द को प्राप्त हुए, फिर वेद-शास्त्रो के मर्मज्ञ तथा महातपस्वी मुनियो के साथ, उस (मिथिला) नगर में विश्राम करते रहे। इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत हुए। उसके पश्चात् क्या घटित हुआ, वह (आगे) कहेंगे। (१-१०४)

अध्याय २२

परशुराम पटल

जनक-पुत्री के संग श्रीराम नानाविध भोगों का उचित प्रकार से अनुभव कर रहे थे। उस समय महातपस्वी कौशिक, वेद-विहित रीति से आशीर्वाद देकर, उत्तर दिशा में अत्युन्नत हिमालय की ओर चले।

एक दिन बलशाली चक्रवर्ती (दशरथ) ने आदेश दिया कि हमारी सेना अब हमारे साथ सुन्दर (अयोध्या) नगर के लिए प्रस्थान करे। हाथियों के जैसे नरेशों से वंदित होते हुए, वे एक अनुपम रथ पर आरूढ हुए।

सर्व प्रकार के बलों से युक्त दशरथ (अयोध्या के) मार्ग पर आ पहुँचे, उस समय, उनके पुत्र तथा पुत्रवधुएँ उनके चरण की वंदना करके उनके संग हो लिये। राजकुमार तथा अन्य लोग उनके पार्श्वों में चलने लगे। मिथिला नगर की प्राचीन जनता भी उनके वियोग से ऐसा दुःख अनुभव करने लगी, जैसा प्राणों के वियोग से शरीर को होता है।

दीर्घ किरीटधारी (दशरथ) यथाविधि आगे-आगे जा रहे थे और उस मनोहर महानगर मिथिला के निवासियों के मन उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। उनके मध्य में, अपने ही सदृश (अपने) भाइयों के द्वारा अनुगत होते हुए, वीर (राम) मेघस्थ बिजली-सदृश कटिवाली (सीता) के साथ सुन्दर ढंग से चलने लगे।

वे जब इस प्रकार जा रहे थे, तब मयूर उनके दक्षिण की ओर आये (जो शुभ-शकुन था) और कौए आदि पक्षी बाईं ओर जाकर उनके मार्ग में बाधा उपस्थित करने लगे (जो अपशकुन था)। यह देखकर गजतुल्य (दशरथ) यह सोचकर कि 'मार्ग में कुछ बाधा उपस्थित होनेवाली है', अपने आकाशस्पर्शी रथ के साथ आगे न बढ़कर मार्ग के मध्य में ही रुक गये।

इस प्रकार रुककर उन्होंने एक शकुन-शास्त्रज्ञ को बुलाकर पूछा कि ये (शकुन) अच्छे हैं या कुछ विपदा आनेवाली है ? तुम निष्पक्ष होकर सच-सच बताओ। तब पर्वत-तुल्य भुजावाले उन चक्रवर्ती के सम्मुख पक्षियों के संकेत को पहचाननेवाले उस व्यक्ति ने कहा—अब कुछ बाधा उपस्थित होनेवाली है, किन्तु फिर वह दूर हो जायगी।

शकुनज्ञ यह कह ही रहा था, इतने में (परशुराम), जिनकी जटाओं से आकाश के अन्धकार को दूर करनेवाली कांति चारों ओर बिखर रही थी, जिनके हाथ में फरसा था, जो चलनेवाले स्वर्ण-पर्वत के सदृश थे, जो अग्नि उगलते थे, जो अग्नि के समान भयंकर नेत्रवाले थे और जो वज्र-सदृश कठोर वचन-युक्त थे, वहाँ आ पहुँचे।

(उनको देखकर) उद्वेलित समुद्र में फँसी हुई नौका के जैसे लोग डगमगा उठे; महान् दिग्गज, जो स्तंभ के जैसे धरती को धारे खड़े थे, डिग उठे; समुद्र बौखलाकर उमड़ गये और स्थानांतरित होने लगे, स्वर्ग के निवासी भयभीत हो अपना-अपना स्थान छोड़ भागने लगे; रक्तस्वर्ण का एक धनुष झुकाकर, उसकी डोरी को चढ़ाकर टंकारित करते हुए तथा उसपर तीक्ष्ण बाण चुन-चुनकर रखते हुए (परशुराम) आये।

१६२ कंब रामायण

निकटस्थ लोग सोचने लगे—खुले हुए व्रण से प्रवाहित रक्त के जैसे (लाल) नेत्रों से अग्नि-ज्वाला प्रसारित करनेवाले (इन परशुराम) का यह कोप किसलिए उत्पन्न हुआ? क्या स्वर्ग को धरती पर गिराने के लिए? भूलोक को आकाश में उठाने के लिए? या असख्य प्राणियों को यम के मुख में डालने के लिए? (किसलिए ये कोप कर रहे हैं?)

युद्ध के मध्य तीव्र हो उठनेवाले परशु के अग्र भाग से अग्नि-शिखा प्रज्वलित हो उठी। जिससे रथारूढ होकर (मेरु) पर्वत की परिक्रमा करनेवाला सूर्य भी दिग्भ्रान्त हो भटकने लगा। (उनके शरीर से) ऐसा प्रज्वलित तेज निकल पड़ा, मानों समुद्र में रहने-वाली वडवाग्नि ही आकाश तक उठकर प्रज्वलित होती हुई धरती पर चली आ रही हो।

उनकी बलिष्ठ भुजाएँ दिगन्तों में जा फैलीं। चारो ओर बिखरी हुई उनकी जटामय शिखा नभ को छू रही थी। श्वेत चन्द्र भी उनके अतिनिकट दिखाई देता था। वे समुद्र, जल, अग्नि, वायु, भूमि, आकाश सबके विनाशकारी, कल्पांत के समय में तांडव करनेवाले उमापति (रुद्र) की समता कर रहे थे।

(ऐसे वे परशुराम आ पहुँचे) जिनके पास अति तीक्ष्ण धारवाला ऐसा फरसा था, जिसका प्रयोग करके उन्होंने सैकत वेला-युक्त समुद्र से घिरे हुए समस्त भूलोक पर छा जानेवाली बलशाली सेना से विशिष्ट तथा पराक्रमी नरेशों से तिलकायमान (कार्तवीर्यार्जुन) रूपी सजीव महावृक्ष की एक सहस्त्र उन्नत भुजा-रूपी वज्रमय शाखाओं को काट दिया था।

क्षत्रिय-कुल पर एक कलंक (जमदग्नि की हत्या के कारण) लग गया था, जिससे परशुराम ने भूलोक के राजसमूह का समूल नाश करते हुए अपने परशु से इक्कीस पीढ़ियों तक उनके प्राण हरे थे, भूमि के पापों का उन्मूलन किया था और उमड़ते समुद्र-जैसे तरगायित उनके रक्त-प्रवाह में डूबकर अकेले ही गोता लगाया था।

क्षमास्वरूप महान् तपस्या तथा जलानेवाली अग्नि-स्वरूप महान् कोप—ये जिसमें अत्यधिक मात्रा में थे, अस्त्र-प्रयोग की स्पर्धा में जिनके सम्मुख शिथिल पड़कर कार्त्तिकेय बीच में ही (स्पर्धा छोड़कर) चले गये थे और जिन्होंने क्रोध के साथ विलक्षण तीक्ष्ण बाणों का प्रयोग करके उच्च शिखरवाले (क्रौंच) पर्वत में ऐसा छेद कर दिया था, जो ऊँचे उडनेवाले पक्षियों के लिए (आने-जाने का) एक सुन्दर मार्ग बन गया था।१

जो अनायास ही पर्वतों को (भूमि में) धँसा सकते थे, समुद्रों को बहा देने में समर्थ थे और जिन्होंने मेघस्पर्शी पर्वत को भेद दिया था, वे परशुधारी वहाँ आ


१. यह कथा प्रसिद्ध है कि सुब्रह्मण्य और परशुराम ने शिवजी से अस्त्र-विद्या प्राप्त की। अस्त्र-विद्या की परीक्षा के समय सुब्रह्मण्य बाणों से क्रौंच पर्वत को भेद नहीं सके; किन्तु परशुराम ने अपने बाणों का प्रयोग कर उसमें छेद कर दिया। उसके पश्चात सुब्रह्मण्य ने अपना भाला फेंककर उस पर्वत को तोड दिया। उस पर्वत के शिखर के गिरने से दक्षिण दिशा में सरोवर ध्वस्त हो गये। तब वहाँ के हंस परशुराम-कृत छेद के मार्ग से क्रौंच पर्वत के उत्तर में पहुँच गये और हिमालय के मानस में निवास करने लगे।—अनु०

बालकाण्ड १६३

पहुँचे। प्रभु (रामचन्द्र) के जन्म के कारण-भूत दशरथ चक्रवर्त्ती ने उन्हें देखा और उस कठोर व्यक्ति के आगमन से आशंकित होकर भारी वेदना से ग्रस्त हो गये।

उमंग से चलनेवाली सेना भयग्रस्त हो इधर-उधर भागने लगी; उज्ज्वल भृकुटियो को परस्पर सम्मिलित कर (भौंहें सिकोड़कर), आँखों से चिनगारियाँ उगलते हुए, वज्र के सदृश, अत्यन्त क्रोध के साथ, वे (परशुराम) रथ पर आनेवाले सिंह के समान कुमार के सम्मुख आये; मनोहर नयनवाले नृप-कुमार (राम) भी यह सोचने लगे कि यह महात्मा कौन हैं १ इतने मे-

चक्रवर्त्ती (दशरथ) बीच में आ पहुँचे और अति सुन्दर सत्कार करके अपने सुवासित सिर को धरती पर लगाकर उनके चरणों को प्रणाम किया; किन्तु (उनकी परवाह न करके) वे अपने कोप का पार न पाकर कल्पात की अग्नि-ज्वाला फैलाते हुए वीर (राम) के सम्मुख आकर बोले-

जो धनुष टूट गया, उसकी शक्ति को मैं जानता हूँ। अब तुम्हारी स्वर्ण-भूषित भुजा के बल की परीक्षा करने की मेरी इच्छा है। युद्ध करके पुष्ट हुई मेरी भुजाओ में कुछ खुजलाहट भी हो रही है यहाँ मेरे आगमन का कारण यही है; दूसरा कुछ नहीं।

जब वे (राम से) ये वचन कह रहे थे, तब चक्रवर्त्ती ने घबराकर उनसे निवेदन किया-आपने सारी भूमि को जीतकर एक मुनि (कश्यप) को दान कर दिया था। आप जैसे कृपालु के लिए शिव, विष्णु और ब्रह्मा भी कोई वस्तु नहीं हैं, (तो) ये क्षुद्र मनुष्य किस वित्ते के हैं १ अब यह (मेरा पुत्र) और मेरे प्राण आपकी शरणागत हैं।

(दशरथ ने आगे कहा-) आग उगलनेवाले परशु को धारण करनेवाले ! महान् पापो को इच्छा-पूर्वक करनेवाले ही तो मरण के पात्र होकर (आपके द्वारा) मृत्यु प्राप्त करते हैं १ क्या इस (राम) ने अहंकार के मद मे बुद्धि-भ्रष्ट होकर कोई अपराध किया है १ युद्ध करने योग्य बलवानो के निकट न जाकर निर्बल व्यक्तियों के पास जाने से बलवानो के बल की क्या शोभा हो सकती है १

हे अपार तपस्या-सपन्न ! आपने सप्तद्वीपमय पृथ्वी पर एकाधिकार प्राप्त करने के पश्चात् उसे (पृथ्वी को) 'लो, तुम इसे अपनाओ', कहकर (कश्यप को) दे दिया था। अब फिर ऐसा काम न कीजिए। विशाल शीतल समुद्र से आवृत भूमि पर स्थित नरपतियो पर कृपा कीजिए और अपना कोप शात कीजिए। क्या आपका यह कोप उचित है १-यों विविध प्रकार की बाते कही।

(दशरथ ने आगे कहा-) उस पराक्रम से भी क्या होता है, जो निष्पक्ष न हो, केवल बढ़ा हुआ हो और सब लोग जिसकी निन्दा करते हो। क्या उस पराक्रम से कोई धर्म-कर्म पूर्ण हो सकता है १ बल या पराक्रम वही तो (सार्थक) होता है, जो धर्म-मार्ग पर स्थित हो और श्रेष्ठ यश से संयुक्त हो। हे पराक्रमी! (आप जो अब करने को उद्यत हो रहे हैं) क्या यह पराक्रम कहलाने योग्य है १'

'मेरा पुत्र (आप से) वैर करनेवाला नहीं है। हे उपलस्तंभ-सदृश भुजावाले ! यदि यह (पुत्र) प्राणहीन हो आये, तो मै अपने बंधु-जन तथा प्रजा के साथ प्राण-त्याग

१६४कंब रामायण

करूँगा और स्वर्ग प्राप्त करूँगा। हे महात्मन् ! मै आपका चरण-दाम हूँ। मेरे कुल सहित मुझे न मिटा दें। आप से मेरी यही विनती है।

यों प्रार्थना करनेवाले अपने पैरो पर पडे हुए (चक्रवर्त्ती) को (परशुराम ने) कुछ वस्तु ही नही समझा, किन्तु प्रज्वलित दृष्टि से देखकर वे स्वर्ण रंग के वस्त्रधारी (राम) के सम्मुख आ पहुँचे उनकी यह निष्ठुरता देखकर तथा अपना कोई उपाय फलीभूत होते न देखकर (दशरथ) विकल-प्राण हुए और बिजली को देखे हुए साँप के समान मूर्च्छित हो गये।

मानधन मुकुटधारी (चक्रवर्त्ती) की मूर्च्छा की कुछ परवाह न करनेवाले तथा स्वयं उनको (परशुराम को) भी वैसी ही दशा मे पहुँचानेवाला जो कर्म-परिपाक उन्हें घेर रहा था, उसे दूर करने का उपाय न जाननेवाले उन्होने (परशुराम ने) कहा- 'डमरूधारी उमापति वह पुराना का धनुष शक्तिहीन हो गया था। उसका पुराना वृत्तान्त तुम सुनो-

भूलोकवासियो के लिए अप्राप्य शिल्प-निपुणता से युक्त विश्वकर्मा ने पुरातन काल में एक चक्रवाले रथ पर आरूढ (सूर्य) की भ्राति उत्पन्न करनेवाले, अति प्रकाशमान, तोड़ने में दुष्कर तथा सञ्चरणशील मेघो से आवृत उत्तर मेरु के बल से युक्त, दो अनुपम धनुष निर्मित किये।

उनमें से एक को उमापति ने ग्रहण किया, दूसरे धनुष को, विराट् रूप धारण कर सारे विश्व को नापनेवाले त्रिविक्रम (विष्णु) ने अपने सुन्दर कर में धारण किया। यह विषय जानकर देवताओ ने ब्रह्मा से पूछा कि उन दोनो धनुषो मे अधिक बलवान् कौन है ?

सुरभित कमल पर आसीन (ब्रह्मा) ने सोचा कि देवता लोग (दोनो धनुषो की परीक्षा लेने का) जो विचार कर रहे हैं, वह उचित ही है, और एक सफल उपाय के द्वारा उन शक्तिशाली धनुषो के व्याज से परब्रह्म के रूप मे एक बनकर रहनेवाले उन दोनो देवो के मध्य घोर युद्ध उत्पन्न कर दिया।

दोनो (शिव और विष्णु) दोनों धनुषो पर डोरी चढ़ाकर युद्ध करने लगे, तो सातो लोक भय-कम्पित हो गये। दिशाएँ डगमगाने लगी। दोनो कोपाग्नि उगलने लगे। तब त्रिपुर का दाह करनेवाले (शिव) का धनुष कुछ टूट गया- इस पर वे (शिव) अधिक क्रोध से भर गये।

(शिव) फिर युद्ध के लिए उद्यत हुए, तो देवो ने उन्हें युद्ध से हटा दिया। ललाटनेत्र (शिव) ने अपना धनुष देवाधिदेव (इन्द्र) के हाथ मे दे दिया उधर विजयशील नीलवर्णदेव (विष्णु) भी अपना धनुष महान् तपस्वी ऋचीक मुनि को देकर चले गये।

ऋचीक ने वह धनुष मेरे पिता को दिया और अपने पिता से मैने यह धनुष प्राप्त किया। हे वत्स ! यदि तुम इस मेरे धनुष को चढ़ा दोगे, तो तुम्हारी ममता करनेवाला नृप अन्य कोई नही होगा। मैं तुम्हारे साथ युद्ध करने को जो विचार कर रहा हूँ, वह भी छोड़ दूँगा और सुनो-

सड़े हुए धनुष को तोड़नेवाला जो बल है, उस पर फूल उठना अच्छा नहीं है। हे मनुवशज ! और भी सुनो। (मेरा) तुम क्षत्रियो के साथ पुराना वैर है प्राचीन काल में

बालकाण्ड १६५

एक दानव-समान राजा ने मेरे निर्दोष पिता को क्रोध-हीन (तपस्वी) जानकर भी मारा था, तो मैंने क्रुद्ध होकर—

इक्कीस बार, धरती के किरीटधारी राजाओं को उग्र परशु की धार से समूल उखाड़ फेंका। उनके शरीर से प्रवाहित रक्त-धारा में यथाविधि, अपने पिता के प्रति करणीय तर्पण-कृत्य पूरा किया। (इसके उपरान्त) अपने कोप को दबा दिया।

समस्त पृथ्वी को मुनिवर (काश्यप) को दान कर दिया; अपने बड़े-बड़े वैरियाँ को दबा दिया। बड़े तप में निरत होकर (महेन्द्र) नामक पर्वत पर निवास करता रहा। तुम्हारे शिवधनुष को तोड़ने की ध्वनि वहाँ पर सुनाई दी, तो कोप उत्पन्न हुआ और यहाँ आया हूँ। यदि तुम बलवान् हो, तो तुम्हारे साथ युद्ध करूँगा। पहले इस धनुष को चढ़ाओ—

(परशुराम के) इस प्रकार कहते ही, राम ने मुस्कराकर, प्रकाशमान वदन से कहा—नारायण ने अपने बल से जिस धनुष का अभ्यास किया था, वह मुझे दीजिए। परशुराम ने वह धनुष दिया। वीर (राम) ने उसे लिया और अपने भुजबल से उसे झुकाया, जिसे देख भारी घनी जटावाले (परशुराम) भी भयभीत हो गये। फिर (राम ने) कहा—

यद्यपि तुमने भूलोक के राजकुल का विनाश किया है, तो भी वेदज्ञ ऋषिवर के पुत्र हो, और तपस्वी का वेष धारण किया है, अतः तुम (मेरे लिए) अवध्य हो; किन्तु मेरा बाण भी व्यर्थ न होनेवाला है, अतः इसका लक्ष्य क्या हो—शीघ्र बताओ।

(राम के वचन सुनकर परशुराम ने कहा—) हे नीतिज्ञ ! कोप न करो; तुम सबके (सारे विश्व के) आदि (कारण) हो, मैंने तुम्हे पहचान लिया। हे तुलसीमालाधारी चक्रधारिन् ! श्वेत चन्द्र-कलाधारी (शिव) का धनुष टुकड़े-टुकड़े क्या हुआ, वह तो तुम्हारे पकड़ने के भी योग्य नहीं था।

स्वर्णमय वीर-कंकण तथा रमणीयता से युक्त चरणवाले ! तुम चक्रधारी (विष्णु) ही हो, यह सत्य है। अतः, अब (तुम्हारे रहते हुए) संसार पर क्या विपदा आ सकती है ? मैंने जो धनुष तुमको दिया है, वह भी तुम्हारे बल के लिए पर्याप्त नहीं है।

तुम्हारे द्वारा चढ़ाया हुआ यह बाण व्यर्थ न हो, इसलिए वह मेरे किये गये सब तप को मिटा दे। परशुराम के यह कहते ही, (श्रीराम का) हाथ किंचित् ढीला पड़ गया। वह बाण भी जाकर उनकी सारी तपस्या को सँजोकर लौट आया।

तब, स्वच्छ नीलरत्न-वर्णवाले ! मनोहर तुलसीमाला धारण करनेवाले ! सब के प्राणभूत पुण्यस्वरूप ! तुम्हारे संकल्पित सब कार्य अनायास ही पूर्ण हो जायेंगे। अब मुझे आज्ञा दो।—यह कहकर परशुराम प्रणाम करके चले गये।

पुनः प्राप्त प्रजावाले, विपदा से विमुक्त हो उल्लसित होनेवाले, मत्तगज की सेना-वाले (दशरथ) जो दुर्लंघ्य विपत्-सागर को पार कर चुके थे, अब आनन्द नामक वेलाहीन समुद्र में डूब गये।

१६६ | कंब रामायण

लेश मात्र प्रेम से भी रहित उन (परशुराम) के हाथ के धनुष को लेकर (उसके बदले) उन्हे अनुपम अपयश देनेवाले उन महानुभाव (राम) को (दशरथ ने) अंक में भर लिया, सिर सँघा तथा अपने सुन्दर नेत्रों के आनन्दाश्रु-रूपी कलश-धार से अभिषिक्त किया।

दशरथ ने सोचा—इस छोटी अवस्था मे ही इसने जो अपूर्व कार्य किया है और पराक्रम दिखाया है, वह तीनो लोको के निवासियो के लिए भी असाध्य है। निश्चय ही यह कुमार कर्म करनेवालो को ऐहिक और पारलौकिक फल प्रदान करनेवाला 'परमतत्त्व' है।

तब राम ने पुष्पवर्षा करते हुए आगत देवताओ में सुन्दर शूलधारी वरुण को देखकर, यह कहकर कि—इस महिमा-मय कठोर धनुष को सुरक्षित रखो, उस विष्णु के धनुष को उसे सौंप दिया और आनन्द-घोष करनेवाली अपनी सेना को साथ लेकर प्रसिद्ध तथा जल-समृद्ध अयोध्या नगरी को जा पहुँचे।

सब लोग अयोध्या पहुँचकर आनन्द से रहने लगे। तब एक दिन, पराक्रमशाली तथा मार्जना से युक्त भेरी-वाद्यो से प्रतिध्वनित सेनावाले चक्रवर्ती ने, (भरत से) अति सुन्दर तथा मंगलप्रद वचन कहे —

तात ! तुम्हारे मातामह, प्रसिद्ध शासक केकयाधिप तुम्हे देखना चाहते हैं, अतः आभरणो से प्रकाशमान वक्षवाले ! सरोबरो में स्थित शंख (कीटों) से प्रतिध्वनित केकय देश को तुम जाओ।

(दशरथ के) आदेश देते ही भरत ने उन्हे नमस्कार किया, फिर राम के चरण-कमलो को अपने सिर पर धारण किया और राम के अनन्यप्राण भरत उन्हे छोड़कर इस प्रकार चले, जैसे प्राणो को छोड़कर शरीर चला जा रहा हो।

अयालयुक्त अश्वो तथा रथो से विशिष्ट एव शंखो से प्रतिध्वनित सेनायुक्त 'युधाजित्' नामक राजा उनके साथ चले। भरत अपने अनुज (शत्रुघ्न) को साथ लेकर, सात दिनो मे शीतल जल से समृद्ध केकय देश मे जा पहुँचे।

भरत चले गये। चक्रवर्ती (दशरथ) त्रुटिहीन शासन करते रहे। देवो की तपस्या अभी शेष थी, जिससे आगे जो घटनाएँ घटित हुई, अब उनका वर्णन करेंगे।

(१—५०)

कंब रामायण

अयोध्याकाण्ड

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मंगलाचरण

कुब्जा (मंथरा) तथा क्षात्र धर्मवाली विमाता (कैकेयी) के क्रूरतापूर्ण कार्य के कारण राज्य त्याग कर, अरण्य एवं समुद्र को पारकर, रावण आदि के वध के द्वारा स्वर्ग-वासियों तथा पृथ्वीवासियों की विपदा को दूर करनेवाले चरणों से शोभायमान, हे प्रभो! (हे राम!) ज्ञानी लोग कहते हैं कि तुम उन सब पदार्थों में, जो (पदार्थ) मूल प्रकृति से विवर्त्तित होकर अनंत रूप में फैले हुए पंच महाभूतों के कार्य-रूप हैं, अंदर और बाहर में इस प्रकार परिव्याप्त होकर रहते हो, जिस प्रकार शरीर और प्राण रहते हैं तथा प्राण और बुद्धि रहते हैं।


अध्याय १

मंत्रणा पटल

दशरथ के कर्णमूल में एक केश, अपने काले रंग को छोड़कर श्वेत रंग के साथ दिखाई पड़ा। वह ऐसा लगा, मानो उन (दशरथ) के कान में यह बात कहने के लिए आया हो कि हे राजन्! अब तुम्हारी अवस्था इस योग्य हो गई है कि तुम अपना राज्य अपने पुत्र (राम) को देकर तपस्या में निरत हो जाओ।

मानो यमराज के बाण ही (दशरथ के) पके केश-रूप में आये हों—यों सूर्यकुल (दशरथ) ने अपना मुख आईने में देखते समय अपने पके हुए केश को देखा।

अलंकारों से भूषित, अधिक क्रोध से भरे, एवं हौदोंवाले बड़े-बड़े हाथियों से युक्त चक्रवर्ती (दशरथ), मेघों के समान नगाड़ों के गरजते तथा अपने चारों ओर अति सुन्दर चामरों के डुलते हुए मंत्रणा-गृह में आ पहुँचे।

१७०कंब रामायण

वहाँ पहुँचकर चक्रवर्त्ती ने अपने साथ आये (सामन्तो) नरेशो, अनुपम बन्धुजनों तथा परिवार के अन्य लोगो को मृदुल वचनो से वहाँ से भेज दिया और एकात मे इस प्रकार बैठे रहे, जिस प्रकार चक्रपाणि (विष्णु) तटस्थ रहकर ससार की रक्षा करने के निमित्त एकात मे योग-निद्रा धारण करते हैं।

उन चक्रवर्त्ती ने, जो चन्द्रोपम तथा गगनोन्नत श्वेत छत्र के साथ संसार की रक्षा करते थे, देवो के गुरु वृहस्पति के समान रहनेवाले अपने मंत्रियो को बुला भेजा।

उस समय वे वसिष्ठ मुनि मंत्रणागृह मे जा पहुँचे, जो सुन्दर वीर-कंकण धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती को पौरोहित्य-रूपी रक्षा देने तथा मार्ग-दर्शन कराने के कारण अत्यधिक आदरणीय थे, देवो तथा मुनियो के लिए देवतुल्य थे, एवं त्रिमूर्त्तियों के साथ चौथे देव के सदृश थे।

फिर वे मत्री लोग आ पहुँचे, जो कुलक्रम से (इक्ष्वाकु-वंश के राजाओ के) मंत्री का कार्य करते आये थे, प्रभूत कला-सपन्न थे, बहुश्रुत थे, पुरुषार्थ-संपन्न थे, अपने हित की हानि होने की संभावना होने पर भी जो तटस्थता को नहीं त्यागनेवाले थे, क्रोध आदि दुर्गुणों को जिन्होने मूल-सहित मिटा दिया था तथा अपूर्व धर्मों का आचरण करते थे।

जो वर्त्तमान व्यापारो से भावी परिणामो का अनुमान लगाने मे समर्थ थे, जो बुद्धिबल से युक्त थे, भाग्य का परिणाम होने पर भी भावी को बदलने का उपाय करने में चतुर थे, जो उत्तम कुल के योग्य सदाचार से युक्त थे, जिन्होने अनेक अपूर्व शास्त्रों का अध्ययन किया था, जो अभिमान मे चमरी-मृग के समान थे।$^१$

वे ऐसे शीलवान् थे कि उचित काल, स्थान, साधन आदि को शास्त्रानुकूल रीति से परखकर, दैव की अनुकूलता को भी देखकर, धर्म की उन्नति करनेवाले थे। यश देनेवाले कार्यों को जानकर उनके द्वारा राजा के पुरुषार्थो को बढानेवाले थे।

चक्रवर्त्ती के क्रुद्ध होने पर भी वे मत्री अपने प्राणो की रक्षा की चिन्ता नही करते थे, किन्तु राजा के क्रोध को सहकर भी अपने सिद्धान्त पर दृढ रहते थे और नीति का ही कथन करते थे। सन्मार्ग से कभी न डिगनेवाले थे। त्रिकाल के व्यापारो को जाननेवाले थे। (स्वय विचार करके किये गये निर्णय को) एक ही बार प्रतिपादित करनेवाले थे।

चक्रवर्त्ती के लाभ और हानि का विवेचन करके अन्त में वैद्य के समान (उनके हित को ही) सोचनेवाले थे। अकस्मात् कोई विपदा उत्पन्न होने पर पूर्व जन्म के सुकृत के समान आकर सहायता करनेवाले थे।

सपत्ति से युक्त ऐसे मत्री यद्यपि साठ सहस्र थे, तथापि चक्रवर्त्ती का हित करने के विषय मे सबकी बुद्धि एक ही थी। वे अपूर्व मंत्रणा-शक्ति से संपन्न थे। ऐसे वे मत्री वीचियो से भरे समुद्र के समान वहाँ आ पहुँचे।

वे मंत्री यथाक्रम आये। उन्होने पहले महान् ज्ञानी वसिष्ठ को प्रणाम किया,


१. अभिमान में चमरी-मृग के समान थे—अर्थात, जिस प्रकार अपने केश खोकर चमरी-मृग जीवित नहीं रहता, उसी प्रकार ये मंत्री अभिमान को खोकर जीवित रहनेवाले नही थे।—अनु०

अयोध्याकाण्ड १७१

फिर अपने राजा को प्रणाम किया और यथोचित स्थान पर आसीन हुए। वे उचित शब्द तथा अर्थ के ज्ञान से युक्त चक्रवर्त्ती की कृपा-दृष्टि के पात्र बने।

इस प्रकार, जब वे आसीन हो गये, तब चक्रवर्त्ती ने उनके मुखो की ओर क्रम से देखकर कहा, मेरी एक चिरकालिक इच्छा है, मेरी बुद्धि के अनुकूल रहनेवाले आप लोग ध्यान से सुने—

मैं सूर्यकुल के उत्तम राजाओ की परंपरा मे स्थिर रहकर, आप लोगो की सहायता से साठ सहस्र वर्ष से शासन करता रहा हूँ।

मैंने कन्याओ के लिए योग्य पातिव्रत्य रखनेवाली धरती का धर्मपूर्ण शासन किया है और अवतक संसार के प्राणियो का हित करता रहा हूँ। अब मै अपने जीवन को सफल करना चाहता हूँ।

मै तपस्या के योग्य वार्द्धक्य को प्राप्त कर चुका हूँ। अवतक मैं, फनवाले आदि-शेष, दिग्गज, प्रसिद्ध कुलशैल—इन सब के भार को कम करके इस पृथ्वी का भार वहन करता रहा। किन्तु, अव इस भार को वहन करने की किंचित् भी शक्ति मुझमे नही रही।

मेरे कुल में उत्पन्न मेरे पूर्वज, अपने पुत्रो को राज्य का भार देकर स्वयं अरण्य में चले जाते थे और क्रूर इंद्रिय-समुदाय को संयम मे लाकर मोक्ष प्राप्त करते थे। ऐसे राजा (हमारे कुल मे) असख्य उत्पन्न हुए हैं।

समुद्र से आवृत्त धरती मे, स्वर्ग मे, पाताल मे, सर्वत्र मैने शत्रुओ को परास्त किया। अव क्या मै काम आदि अंतःशत्रुओ के वशीभूत रहकर भय के साथ जीवन व्यतीत करूँगा ?

मैने अलक्तक-रस (महावर) लगे हुए कोमल चरणवाली कैकेयी के सारथ्य करते हुए रथ पर आरूढ होकर, कठोर क्रोधवाले दस राक्षसो के रथ को विध्वस्त किया और उन राक्षसो को परास्त किया। ऐसे मेरे लिए, पंचेन्द्रिय-रूपी रथो को, जिन पर मन-रूपी भूत आरूढ रहता है, परास्त करना क्या कठिन कार्य है ?

कोई (क्षत्रिय) जबतक वह शत्रुओ की सेना के साथ युद्ध करते हुए न मरे या उत्तम ज्ञान को प्राप्त न करे अथवा संपत्ति की नश्वरता को देखकर संसार की आसक्ति को न छोड़ दे, तबतक उसे मुक्ति नही प्राप्त होती।

इस ससार के लोगो के लिए इस सत्य को भूलने से बढ़कर हानिकारक विषय और कुछ नही है कि हमारी मृत्यु अवश्य होनेवाली है। यदि विरक्ति-रूपी नौका हमारी सहायता न करे, तो इस जीवन-रूपी समुद्र को हम कैसे पार कर सकते हैं ?

यदि महिमा से पूर्ण वैराग्य तथा उस (वैराग्य) से उत्पन्न होनेवाला सत्यज्ञान--ये दोनो पंख हमारे पास हों, तो हम इस जीवन-रूपी कारागार से मुक्ति पा सकते हैं।

मेरा मन, सुख की परंपरा के जैसे (अर्थात्, सुख की भ्रांति उत्पन्न करते हुए) आनेवाले इन्द्रिय-रूपी शत्रुओ को मिटाकर मोक्ष नामक अनुपम साम्राज्य को पाना चाहता है। अव इस ससार के राज्य को वह (मेरा मन) नही चाहता।

आपलोगो को (मंत्रियो के रूप में) पाने के कारण मै सारे ससार की

१७२ कम्ब रामायणं

यथाविधि रक्षा करस का और पुण्य-कार्य किये। यों, इस ससार के जीवन में मेरी सहायता करनेवाले आपलोगो को, मेरे परलोक-जीवन के लिए भी कुछ सहायता करनी है। जब हम अपने पूर्वकृत पापो को अपार करुणापूर्ण तपस्या से दूर कर सकते हैं, तब कौन ऐसा मनुष्य होगा, जो अनुपम अमृत को छोड़कर उसके विरोधी कठोर विषय का पान करेगा ? आलान में बँधे हुए मत्तगज की पीठ पर के मयूरपंखो तथा श्वेत छत्र की सुखद छाया शाश्वत नही होती। अनेक दिनो से आस्वादित होकर जो जूठा हो गया है, उसके आस्वादन में अब क्या आनन्द आ सकता है ? पुत्र न होने से मैं अनेक दिनो तक दुःखी रहा। मेरे उस दुःख को दूर करने के लिए राम उत्पन्न हुआ। अब मै उसको प्रसन्न रखकर स्वय इस ससार की बाधा से मुक्त होने का उपाय करूँगा। 'राम के पिता ने युद्ध-क्षेत्र में मृत्यु नही प्राप्त की। अधिक वृद्ध होने पर भी वह आसक्ति-हीन नही हुआ'—ऐसा अपयश उत्पन्न हो, तो मेरा जीवन ही व्यर्थ हो जायगा। रामचन्द्र जैसा पुत्र मुझे हुआ है और सीता जैसी लक्ष्मी के साथ उसका विवाह होते हुए मैने देखा है। अब मै उस (राम) का विवाह क्षमा नामक गुणवाली भूदेवी के साथ होते हुए देखना चाहता हूँ । भूमि नामक गौरवपूर्ण रमणी का तथा अरुण कमल पर आसीन लक्ष्मी का, अपने मनोनुकूल पति पाने का जो सौभाग्य होता है, उसके फलीभूत होने में विलम्ब करना उचित नही है। अतः, मै गम को राज्य देकर, अज्ञान-जन्य इस जन्म को दूर करने के उपाय-भूत महान् तपस्या करने के लिए, मै अरण्य को जाऊँगा। इसके बारे में आपलोगो का विचार क्या है ?—यो दशरथ ने कहा। पुष्ट कंधोवाले दशरथ के यो कहने पर मंत्रियो के मन में आनन्द उमड़ उठा, किन्तु साथ ही, उस समय चक्रवर्ती के वियोग को सोचकर, उनकी वही दशा हुई, जो दो बछड़ो के प्रति अपने प्रेम से व्याकुल होनेवाली गाय की होती है। दुःखी होने पर भी मंत्रियो ने सोचा कि चक्रवर्ती के लिए उस प्रकार करने के अतिरिक्त अन्य कोई हितकर कार्य नही है, तथा विशाल ससार में रहनेवाले प्राणियो को राम के समान प्रिय अन्य कोई नही है, इस प्रकार सोचकर एव भावी प्रबल होने के कारण वे (मत्री) उस विचार से सहमत हुए। वेदो के अधिष्ठाता चतुर्मुख के पुत्र (वसिष्ठ मुनि) ने, मंत्रियो के विचारो को, अपने पुत्र पर अधिक अनुरक्त चक्रवर्ती के मन को तथा ससार के प्राणियो के हित की तटस्थता के साथ विचार कर ये वचन कहे— हे चक्रवर्ती ! इसके पूर्व, तुम्हारे वश में उत्पन्न प्रसिद्ध चक्रवर्तियो मे किसने श्रीराम जैसा पुत्र पाया था ? तुम शास्त्रो के ज्ञाता हो, तुम्हारे लिए ऐसा कार्य उचित ही है, हे विवेकशील ! तुमने धर्म के अनुकूल ही सोचा है।

अयोध्याकाण्ड १७३

हे महाभाग ! तुमने पुण्यकारक अनेक यज्ञ किये हैं। अब तुम्हें अपूर्व तपस्या करना ही उचित है। तुम्हारा पुत्र वीर-कंकणधारी (राम) पृथ्वी का इस प्रकार शासन करेगा कि सुन्दर (समुद्र-रूपी) मेखला-भूषित भूमि तुम्हारे वियोग से नेत्रहीन न होगी।

'धर्म ही (राम के रूप में) अवतीर्ण हुआ है', इसके अतिरिक्त हम और क्या कह सकते हैं ? वह विजयी (राम), सारे पदार्थों की सृष्टि कर, उनकी रक्षा कर, फिर उनका विनाश करनेवाले त्रिदेवों के व्यापारों को भी सुधारेगा ।

हे बुद्धि-बल से युक्त ! सौन्दर्य से सम्पन्न श्रीदेवी और भूदेवी, दोनो जिसको अपना प्राण-समान पति मानती हैं, वह केवल उनको तथा तुमको ही प्रिय नहीं है, अपितु वह संसार के सब प्राणियों को प्रिय है ।

हे वीर ! उस (राम) के नाम का उच्चारण करने से ही प्रतिदिन के क्लेश दूर हो जाते हैं। इस कारण से, ब्राह्मण आदि तुम्हारे पुत्र को, उनके सुकृत के फलस्वरूप उत्पन्न मानते हैं । (राम के प्रति) अन्य लोगों के प्रेम के बारे में और क्या कहना है ?

महान् कीर्त्ति से युक्त जानकी, भूदेवी से भी उत्तम है। लक्ष्मी, सरस्वती तथा पार्वती से भी उत्तम है। रामचन्द्र उस (सीता) के नयनों से भी उत्तम हैं। साधारण लोग तथा पंडित, पिये जानेवाले जल और अपने प्राणों से भी बढ़कर उस (राम) को चाहते हैं ।

हे चक्रवर्ती ! मानवों, देवों तथा अन्य (नागों) के एवं सर्वप्राणियों के दुःखों को दूर करके उनकी रक्षा करनेवाला, राम से बढ़कर और कोई नहीं है। अतः, विचार करने पर विदित होता है कि तुम्हारे लिए यही उचित है कि राम को राज्य देकर तपस्या करने के लिए जाओ ।

वसिष्ठ के ये वचन सुनकर, दशरथ को जो आनन्द हुआ, वह रामचन्द्र के जन्म पर, शिव-धनुष के टूटने पर और परशुराम के परास्त होने पर जो आनन्द हुआ था, उनसे भी बढ़कर था ।

दशरथ ने ऐसे आनन्द के साथ नयनों में अश्रु भरकर महिमामय गुरु वसिष्ठ के चरणों को नमस्कार किया और कहा—हे भगवन् ! आपने अच्छा कहा । आपकी कृपा से ही मैं अबतक भूमि का भार वहन कर सका । यह कार्य राम के लिए कुछ कठिन नहीं होगा ।

हे पितृतुल्य ! आपके परामर्श से मेरे कुल के राजा लोग अनन्त यश के भागी बने और अनेक यज्ञ करके दोनों प्रकार के कर्मों से मुक्त हुए; मुझे भी आपकी वही कृपा प्राप्त हुई है ।—यों कहकर दशरथ आनन्दित हुए ।

निष्कलंक तपस्या से संपन्न मुनिवर मौन हो रहे । तब सुमंत ने सब विषयों का विचार करनेवाले मंत्रियों के मुख से प्रकाशित उनके हृदय के भाव को जानकर, अपने कर जोड़कर राजा से यों निवेदन किया—

'राम राज्य प्राप्त करेंगे', इस समाचार से आनन्दित होनेवाले हृदयों को, तपस्या करने के लिए आपके जाने का समाचार जला रहा है । अपने कुल के पूर्वजों का धर्म त्यागना भी ठीक नहीं है । अतः, धर्म से बढ़कर निष्ठुर विषय अन्य कुछ नहीं है ।

१७४ | कंब रामायण

आलान में बाँधे जानेवाले मत्तगजों की सेना से युक्त राजाओं, नगर के लोगों, मंत्रियों तथा मुनियों के हृदय-रूपी नगाड़ों को ध्वनित करते हुए (अर्थात्, आनन्दित करते हुए) आप, नीलरत्न-सदृश देह-कांतिवाले अपने (राम) को राजा बनावें, फिर परलोक के अनुकूल व्यापार संपन्न करें।

सुमंत्र के इस प्रकार कहने पर चक्रवर्ती ने कहा—तुमने ठीक कहा, पहले राम को मुकुट पहनाकर फिर अन्य कर्त्तव्य करना है। तुम शीघ्र जाकर लक्ष्मी-सदृश (सीता) के पति को ले आओ।

दशरथ के मन-सदृश वह सुमंत्र, पुष्पमाला-भूषित चक्रवर्ती को प्रणाम करके, पर्वत-समान सौधों से युक्त राजवीथी में, त्वरित गति से, स्वर्णमय रथ को यों चलाता हुआ गया, मानो उसने सब लोकों को प्राप्त कर लिया हो और राम के प्रासाद में प्रविष्ट हुआ।

उस प्रासाद में रामचन्द्र, नारियों में अमृत-समान सीता के साथ सुखासीन थे और उनके एक ओर, उनसे पृथक् न होनेवाले लक्ष्मण भी धनुष धारण करके खड़े थे। उस मधुर दृश्य को देखकर सुमंत्र के नयन तथा मन भ्रमरी के समान संतृप्त हो गये।

रामचन्द्र को देखकर सुमंत्र ने हाथ जोड़कर निवेदन किया कि हे प्रभु ! इस संसार के स्वामी (दशरथ) ने आदेश दिया है कि एक मुख्य कार्य के लिए मैं आपको ले आऊँ। यह सुनते ही कमलनयन प्रभु (राम) झट उठ और सजल मेघ के समान चलकर ध्वजा से भूषित उस रथ पर आरूढ़ हो गये।

नगाड़े मेघ-पंक्ति के समान बज उठे, सुन्दरियों की कलाइयों से फिसल पड़ने-वाली शंख की चूड़ियाँ बज उठीं, देवगण, यह विचारकर कि हमारा अभीष्ट पूर्ण होने-वाला है, आनन्द-ध्वनि कर उठे, राम के शिर पर आवेष्टित पुष्पमालाओं पर के भ्रमर गुंजार कर उठे।

सर्वत्र वाद्य-घोष भर गया, संगीत-नाद भर गया, मन्मथ के बाण भर गये, प्रत्यंचा के घोष भर गये। (वहाँ की रमणियों के) मनोभाव-रूपी बाढ, संयम के बाँध को तोड़कर उमड़ उठी और वे रमणियाँ हरिणियों के समान सर्वत्र फैल गईं।

दीर्घस्तंभों से युक्त द्वारों में कमल-पुष्प—(अर्थात्, रमणियों के मुख), कुंडलों एवं खुले हुए केश-पाशों के साथ, प्रासादों के ऊपर प्रफुल्लित हो रहे थे, तथा गवाक्षों में भ्रमरों, करवालों, रक्त-सिक्त भालों तथा मीनों के साथ दिखाई पड़ रहे थे।

पूर्णचन्द्र सदृश वदनवाले, कालमेघ-सदृश, देवाधिदेव (राम) के पर्वत-समान (दृढ) वक्ष पर स्थित पुष्पमालाओं में, बिंब-सदृश अधरवाली सुन्दरियों के, संयम, लज्जा आदि गुणों से अनुस्यूत, मीन (तुल्य नयन) मधुरगान करनेवाले भ्रमरों के साथ उलझे पड़े रहे।

(जब रामचन्द्र वीथी में जा रहे थे, तब) मेघों के साथ चन्द्र नीचे की ओर झुक आया, जिनमें पुष्प बरस पड़े, उत्पल-समान नयनों की कोरों से मुक्ताकण बरस पड़े, झूलते पुष्पों से युक्त पुष्ट स्तन (फूलकर) हारों के मध्य समा गये, विकसित कमल-पुष्पों

अयोध्याकाण्ड १७५

से संयुक्त चमकते हुए वस्त्र गगन से सरक पड़े—(अर्थात्, राम के सौन्दर्य को देखकर नारियाँ मुग्ध हुईं, जिससे उसके शरीर में अनेक काम-विकार उत्पन्न हो गये। मेघ-से 'केश', चन्द्र- से 'वदन', मुक्ताकण-से 'अश्रु', कमल-से 'कर', और गगन-मे 'कटि' का अर्थ लगाना चाहिए।) चर्ममय कोशो को हटाकर चमकनेवाले करवालो के जैसे चन्द्र शोभायमान हो रहे थे, (अर्थात् पलको को खोलकर नेत्र चमक रहे थे, जिनसे नारियो के वदन शोभायमान हो रहे थे)। उन चन्द्रों को ढोनेवाली और भार से लचकनेवाली लताओ में दो-दो नारि- केल लगे थे (अर्थात्, स्तन थे), जिन पर ओस की बूँदें फैल रही थी (अर्थात्, स्वेद- कण फैल रहे थे); और जिन पर सोने के पत्र यत्र-तत्र अंकित थे (अर्थात्, सोने के रंग की चित्रियाँ पड़ी थी)। उधर ऐसी घटनाएँ हो रही थी; उधर पुरुष लोग, अपनी माँ का स्मरण कर आनन्दित होनेवाले गाय के बछड़ो के समान (प्रसन्न) खड़े थे; यों रामचन्द्र, अपने पवित्र शीलवाले अपने भाई के साथ, सुमंत्र के द्वारा चलाये जानेवाले रथ पर सवार होकर, प्रसन्न मन से बैठे हुए चक्रवर्त्ती के निकट जा पहुँचे। रामचन्द्र ने महातपस्वी (वसिष्ठ) को नमस्कार किया, फिर चक्रवर्त्ती के कमल- सदृश चरणों को प्रणाम किया। तब चक्रवर्त्ती ने उमड़ते प्रेम के साथ आँखो से आनन्दाश्रु बहाते हुए सीता के वल्लभ (राम) को राज्यलक्ष्मी के निवास-भूत अपने वक्ष से लगा लिया। दशरथ ने मगल के आवामभूत अपने पुत्र का आलिगन क्या किया, वास्तव मे उन्होने समुद्र से आवृत पृथ्वी के भार को वहन करने की (रामचन्द्र की) शक्ति को आँकना चाहा और अपने वक्ष से उन (राम) के, लक्ष्मी तथा पुष्पमालाओं से विभूषित वक्ष को नापकर देखा। फिर, दशरथ ने राम को अपने पार्श्व में बिठा लिया और आनन्द और उमड़ते प्रेम के साथ उन्हे देखकर कहा - परशुराम के महान् यश को छोटा करनेवाले उन्नत कन्धो से युक्त (हे राम)! तुमको पुत्र के रूप में पाने से मुझे जो सबसे उत्तम फल प्राप्त होना है. उसके सपन्न होने का एक उपाय है। वह तुममे ही पूर्ण हो सकता है। हे तात! मै बहुत थक गया हूँ। अवारणीय वार्द्धक्य भी मेरे शरीर में उत्पन्न हो गया है। तुम्हे मेरी ऐसी सहायता करनी चाहिए, जिससे मैं चिंताजनक भू-भार नामक कठोर कारागार से मुक्त होकर अनुपम निःश्रेयस् (मुक्ति) के मार्ग पर जाऊँ और उज्जीवन¹ प्राप्त कर सकूँ। महापुरुषो का कथन है कि सत्पुत्र प्राप्त करना, अपार दुःख से मुक्त होने तथा उभय लोको में आनन्द अनुभव करने का साधन है। तुम तो धर्म-स्वरूप ही हो। तुम्हे पुत्र के रूप में पाकर भी मै चिन्तित रहूँ, यह उचित नहीं। अतः, मेरे प्रति तुम्हारा एक कर्त्तव्य है, उसे सुनो।


१. विशिष्टाद्वैत के अनुसार 'उज्जीवन' मुक्त आत्मा की स्थिति को कहते हैं।

१७८कंब रामायण

प्रति उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। उन (चक्रवर्ती) के मन से सब चिंताएँ दूर हो गईं और वे तृप्ति से भर गये उनके नयनों से (आनन्द के) अश्रु बहने लगे। फिर, सभासदों को देखकर चक्रवर्ती ने कहा—

निष्पक्षता, धर्मनिष्ठा, सच्चारित्र्य, दुष्कार्यों के प्रति घृणा इत्यादि सद्गुणों से भूषित हे सभासद नरेशो ! यह (राम) मेरा ही पुत्र नहीं, अपने आचरण से यह तुम सबके पुत्र के समान है। इसे अपनाकर तुम सब इसका हित करते रहो।

फिर, सभा को विसर्जित करके चक्रवर्ती (राम के राजतिलक के लिए) एक शुभ मुहूर्त निश्चित करने के विचार से ज्योतिष-शास्त्र के पंडितों को साथ लेकर एक पर्वत-सदृश उन्नत मंडप मे जा पहुँचे ।

उस समय (राम के राज्य तिलक के) समाचार को सुनकर चार दासियाँ, बड़ी उमग से (कौशल्या के आवास की ओर) दौड़ पड़ी, तो उनके स्तनों के बंधन खुल गये, केश-पाश बिखर गये, वस्त्र खिसक गये, किन्तु उनकी सूक्ष्म कटियाँ किसी प्रकार नहीं टूटी।

वे चारों सुन्दरियाँ नाच उठीं। अपनी पूर्व-दशा को भूलकर गाने लगीं। जिस किसी को देखती थीं, उसको हाथ जोड़कर नमस्कार करतीं। इसका ध्यान उन्हें नहीं रहा कि वे क्या कह रही हैं। यो वे (कौशल्या के) प्रासाद के निकट जा पहुँचीं।

घनश्याम की जननी कौशल्या ने, अपने पास आई हुई उन दासियों को प्रेम से देखा और पूछा—'हे बिंबफल-समान ओंठोंवाली रमणियों ! तुमको देखने से विदित होता है कि तुम कोई शुभ समाचार लाई हो। शीघ्र कहो, वह क्या है।

तब दासियों ने निवेदन किया कि चक्रवर्ती तुम्हारे ज्येष्ठ पुत्र को, यह कहकर कि 'नरेशो द्वारा तुम्हारे वीर-वलय-भूषित चरणों के वन्दित होते हुए तुम चिरकाल तक पृथ्वी का शासन करो'—अपने प्राचीन मुकुट को उन्हें पहनानेवाले हैं।

इस समाचार के सुनते ही कौशल्या के मन मे 'राम को राज्य-संपत्ति मिलनेवाली है।' इस विचार से जो आनन्द का सागर उमड़ा था, उसे, 'चक्रवर्ती राज्य त्याग कर (अरण्य मे) जानेवाले हैं।' इस विचार-रूपी वड़वाग्नि ने सुखा दिया।

फिर भी, कौशल्या ने उन स्त्रियों को अपूर्व रत्नहार और धन दिये और अपने प्रेम के पात्र-भूत सुमित्रा को साथ लेकर चक्रधारी (भगवान् रंगनाथ) के मंदिर मे जा पहुँची।

मंदिर में पहुँचकर, लक्ष्मी और भूदेवी-सहित उस भगवान् के, जो सब देवों के प्राण हैं, ज्ञान हैं तथा (सब के) आदि कारण हैं, चरण-कमलों को प्रणाम किया।

सब लोकों को अपने उदर में अन्तर्भूत करनेवाले नारायण को अपने गर्भ में रखनेवाली उम तपस्यामयी (कौशल्या) ने भगवान से प्रार्थना की कि तुमने मुझे जो पुत्र दिया है, उसपर अनुग्रह करना भी तुम्हारा ही कर्त्तव्य है।

यों प्रार्थना करके चारो वेदों में प्रतिपादित विधान से उस नारायण की विशेष पूजा करके, उन्होंने (कौशल्या ने) उत्तम तपस्या से सम्पन्न लोगों को वत्स-युक्त धेनुएँ दान कीं।

उन्होंने ब्राह्मणों को स्वर्ण, उत्तम रत्न, चंदन-रस, भूमि, कन्याएँ इत्यादि सब प्रकार की वस्तुएँ दान कीं। उन्हें अन्न और उत्तम वस्त्र भी दान किये।

अयोध्याकाण्ड १७९

इस प्रकार दान करके, भगवान् रंगनाथ के सद्यःप्रसूत कमल-जैसे चरणों को नमस्कार करके, ( भगवान् की ) प्रार्थना करके तथा मंदिर की परिक्रमा करके कौशल्या अपने दोषहीन संपत्ति से भरे प्रासाद मे आईं और व्रत आदि अनुष्ठान करने लगीं । ( १—६८ )


अध्याय ३

मंथरा-षड्यंत्र पटल

उधर सुगन्धित पुष्पमालाधारी चक्रवर्ती ने गणितज्ञों ( मुहूर्त्त का विचार करनेवाले ) को देखकर, उनकी स्तुति करके फिर कहा, तीक्ष्ण परशुधारी ( परशुराम ) को परास्त करनेवाले राम को मुकुट पहनाने के लिए सुयोग्य शुभ दिन बतलाइए ।

ज्योतिष के सब विद्वानो ने उत्तर दिया, आपके पुत्र के लिए योग्य दिन कल ही है । यह आनन्ददायक वचन सुनकर वीर-वलय से भूषित, मत्तगज-सदृश चक्रवर्ती ने आज्ञा दी कि निष्कलंक तपस्यावान् तथा अमृत-समान उत्तम वसिष्ठ को ले आओ । मुनिवर आ पहुँचे ।

दशरथ ने उन मुनिवरो से कर जोड़कर निवेदन किया, शुभ मुहूर्त्त कल ही है ; अतः कोदण्डधारी राम से आज ही आवश्यक व्रत करावें तथा उसे हितकारी उपदेश भी दें ।

मुनिवर भी अपनी उमंग के साथ होड़ करते हुए आगे बढ़ चले और मनु-कुल के प्रभु ( राम ) के प्रासाद में जा पहुँचे । मुनिवर का आगमन सुनकर पुष्पमाला-भूषित ( राम ) उनके सम्मुख आये और उनको अपने भवन के भीतर ले गये ।

अशिथिल तपोव्रत से सम्पन्न मुनिवर ने शास्त्रो के ज्ञाता उस उदार पुरुष ( राम ) से कहा—हे युद्धचतुर ! तुम पर अपार प्रेम रखनेवाले चक्रवर्ती तुम को कल ही राज्य देना चाहते हैं ।

यह कहकर वे फिर राम की ओर देखकर बोले—मुझे कुछ हितकारी वचन तुमसे कहने हैं। उन वचनों को सावधान होकर सुनो और उन पर दृढ रहो, फिर घनी मालाओ से भूषित राम से कहने लगे ।

वेदज्ञ लोग, श्यामवर्ण विष्णु, ललाटनेत्र ( शिव ), कमलभव ( ब्रह्मा ), उत्पन्न पञ्चभूतों तथा सत्य से भी श्रेष्ठ होते हैं, अतः तुम सच्चे हृदय से उनका आदर करना ।

हे वत्स ! देवताओं में ऐसे लोगो की गिनती नहीं है, जो वेदज्ञो के क्रोध से पतन को प्राप्त हुए और जिन्होने उनकी कृपा से शीघ्र उद्धार प्राप्त किया ।

हे वत्स ! वेदज्ञ ऐसे होते हैं, अतः कठोर पापो से रहित इन ब्राह्मणो के चरणों को अपने मुकुट पर धारण किये हुए उनकी स्तुति करो और उनके बताये धर्म के मार्ग पर स्थिर रहो ।

१८० | कंब रामायण

विधि भी उन ब्राह्मणों की आज्ञा के अनुसार बनने और बिगड़ने को सन्नद्ध रहती हैं। अतः, इहलोक और परलोक में देव-समान वेदज्ञ विप्रों की प्रस्तुति करने के जैसा उत्तम कार्य और कोई नहीं है।

वर्त्तुलाकार चक्रायुध, उज्ज्वल परशु तथा भ्रान्ति-रहित वाणी को शस्त्र के रूप में धारण करनेवाले त्रिमूर्त्ति भी यदि सद्धर्म को, मन की स्वच्छता को तथा दया को छोड़ दें, तो इससे उनका कुछ हित नहीं हो सकता।

स्वभाव से ही न्याय पर दृढ़ रहनेवाले (हे कुमार)। जूआ आदि प्रसिद्ध दुर्व्यसन तुझमें नहीं हैं, फिर भी यह जान लो कि वे दुर्व्यसन सब दोषों की प्राप्ति के हेतु बनते हैं।

यदि हमारे मन में किसी के प्रति विरोध भाव नहीं रहे, तो युद्ध भी शान्त हो जायेंगे (अर्थात्, युद्ध नहीं होंगे), इस प्रकार (युद्ध नहीं करने से) यश की भी हानि नहीं होती, सेना की क्षति भी नहीं होती। जब इस प्रकार हित होना संभव हो, तब शत्रु के समूल नाश की कामना करने की आवश्यकता ही नहीं रह जायगी।

विषयों में प्रवृत्त होनेवाली पञ्चेन्द्रियों को शान्त करके, संपत्ति को बढ़ाकर, निष्पक्षता तथा मन की दृढ़ता के साथ किया जानेवाला शासन ही सच्चा शासन है। हे वत्स! वैसा शासन, तलवार की धार पर खड़े रहकर की जानेवाली तपस्या के सदृश होता है।

भले ही कोई शासक उमापति (शिव) की, गरुडवाहन (विष्णु) की और अनिमेष आठ आँखोंवाले (ब्रह्मा) की भुजाओं की शक्ति से युक्त हो, तथापि उसके लिए भी मन्त्रियों के परामर्श के अनुसार कार्य करना ही हितकारक होता है।

अस्थि-चर्ममय शरीरवाले मनुष्यों तथा वैसे शरीर से रहित अन्य लोगों (अर्थात् देवों) को भी, अपने बलवान् शत्रु पञ्चेन्द्रियों का दमन करने से क्या फल मिल सकता है? तीनों अनादि लोकों में प्रेम से बढ़कर अन्य कोई फलदायक गुण नहीं हैं।

राज्य के प्राण हैं प्रजा, उन प्राणों की रक्षा करनेवाला शरीर हैं राजा। यदि वह राजा धर्म के अनुकूल रहकर सच्ची करुणा पर निश्चित रूप से दृढ़ खड़ा रहे, तो उसके लिए अन्य यज्ञ करने की आवश्यकता ही क्या है?

यदि राजा मधुरभाषी हो, दाता हो, विवेकवान् हो, कर्मनिरत हो, पवित्र हो, ऋजु हो, विजयी हो, न्यायपरायण हो सन्मार्ग से पृथक् न होनेवाला हो, तो उस (राजा) का कभी नाश नहीं होगा।

जो राजा, सदाचार के विरोधी कार्यों से दूर रहकर, सोने को तौलनेवाली तुला के समान निष्पक्ष भाव से रहता है, उसके लिए अच्छे स्वभाववाले मंत्रियों के द्वारा परीक्षा करके, कार्यविशेष के लिए, निर्धारित समय के अतिरिक्त अन्य कोई नेत्र नहीं हैं।

(कभी) परिवर्त्तित न होनेवाली नियति भी, आलोचना से परे सत्कार्यवाले मुनियों की वाणी के अनुसार चलती है, यह जानकर उन (मुनियों) पर दृढ़ श्रद्धा रखनी चाहिए। उसमें उन (मुनियों का) प्रेम (श्रद्धा रखनेवालों की रक्षा के लिए) शस्त्र का काम देगा।

अयोध्याकाण्ड १८१

पृथ्वी पर धूमकेतु के जैसे उत्पन्न, मेखलाधारिणी, रमणियो की कामव्याधि नहीं हो, तो (किसी को) कोई बड़ी विपदा उत्पन्न नहीं होगी। नरक की यातना भी उत्पन्न नहीं होगी।

तत्त्वज्ञ मुनिवर (वसिष्ठ), सब लोकों को अपने उदर में समानेवाले (विष्णु के अवतार राम) को इस प्रकार के नीतिबोधक मधुर वचन कहकर, उनके ज्ञान को बढ़ाकर, उन (राम) के साथ सहस्र शिरवाले¹ भगवान् (विष्णु) के मंदिर में गये।

वसिष्ठ (राम को साथ लेकर) सर्पशय्या पर शयन करनेवाले भगवान् (रंगनाथ) के सम्मुख जा पहुँचे। उनकी पूजा की और चतुर्वेदों के मंत्रों से अभिमंत्रित पुण्य-जल से राम को स्नान कराया। फिर, राजाओं के लिए उचित, विद्वानों के द्वारा प्रतिपादित, सब आचार संपन्न किये और श्वेत दर्भों के आसन पर (राम को) आसीन कराया।

जब रामचन्द्र इस प्रकार आसीन हुए, तब यज्ञोपवीत से अलंकृत वक्षवाले (वसिष्ठ) ने शीघ्र जाकर प्रतापी राजा को (राम के व्रत आदि संपन्न करने का) समाचार दिया। चक्रवर्ती ने नगर को अलंकृत करने की आज्ञा दी।

'वल्लुवर' (ढिंढोरा पीटकर राजाज्ञा की घोषणा देनेवाली एक जाति) लोगों ने नगर की वीथियों में घूमते हुए ढिंढोरा पीट-पीटकर घोषणा की कि रामचन्द्र कल ही राजमुकुट धारण करनेवाले हैं। अतः, इस सुन्दर नगर को अलंकृत कीजिए। इस घोषणा से देवता भी आनन्दित हो उठे।

'काव्यों में प्रतिपादित यशवाले राम, कल ही रत्नमय राजकिरीट धारण करने-वाले हैं'—यह सूचना लोगों के कानों को आनन्द देनेवाली थी। इतना ही नहीं, यह (वचन) सब लोगों के लिए देवों के आहारभूत हविर्भाग तथा अमृत के समान तृप्तिकारक था।

नगर के लोग कोलाहल कर उठे। आनन्द में नाचने-गाने लगे। उनके शरीर स्वेद से भर गये। वे फूल उठे। उनकी देह पुलक से भर गई। वे चक्रवर्ती की स्तुति करने लगे। जो भी यह शुभ समाचार देता था, उसे वे अपार द्रव्य देते थे।

प्रेम से भरे उस नगर के लोगों ने उस सुन्दर नगर का इस प्रकार अलंकरण किया, जैसे पुंजीभूत किरणोंवाले सूर्य को ही सँवार रहे हों या शेषनाग पर सोनेवाले विष्णु के विशाल वक्ष पर स्थित कौस्तुभ मणि को सान पर रखकर उसे चमका रहे हों।

श्वेत, काले, रक्तवर्ण तथा अन्य रंगवाली ध्वजाओं की पंक्तियाँ ऐसी लगती थीं, मानो मधुस्रावी पुष्प-मालाओं से युक्त राम के वैभव को देखने के लिए सब प्रकार के विहग उस सुन्दर नगर में आ पहुँचे हों।

उस नगर में युवतियों की जाँघों के जैसे कदली-वृक्ष लगाये गये। उन (युवतियों) की ग्रीवाओं के जैसे क्रमुक-वृक्ष लगाये गये। उनके दाँतों की जैसी मुक्ता-पंक्तियाँ सजाई गईं तथा उनके स्तनों के जैसे कनक-कलश श्रेणियों में रखे गये।


१. वेदों में प्रतिपादित 'सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्ष. सहस्रपात्' वाक्य के अनुसार ही यहाँ विष्णु को सहस्र शिरोवाला कहा गया है।