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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 549 में से

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पृष्ठ 188
१७८कंब रामायण

प्रति उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। उन (चक्रवर्ती) के मन से सब चिंताएँ दूर हो गईं और वे तृप्ति से भर गये उनके नयनों से (आनन्द के) अश्रु बहने लगे। फिर, सभासदों को देखकर चक्रवर्ती ने कहा—

निष्पक्षता, धर्मनिष्ठा, सच्चारित्र्य, दुष्कार्यों के प्रति घृणा इत्यादि सद्गुणों से भूषित हे सभासद नरेशो ! यह (राम) मेरा ही पुत्र नहीं, अपने आचरण से यह तुम सबके पुत्र के समान है। इसे अपनाकर तुम सब इसका हित करते रहो।

फिर, सभा को विसर्जित करके चक्रवर्ती (राम के राजतिलक के लिए) एक शुभ मुहूर्त निश्चित करने के विचार से ज्योतिष-शास्त्र के पंडितों को साथ लेकर एक पर्वत-सदृश उन्नत मंडप मे जा पहुँचे ।

उस समय (राम के राज्य तिलक के) समाचार को सुनकर चार दासियाँ, बड़ी उमग से (कौशल्या के आवास की ओर) दौड़ पड़ी, तो उनके स्तनों के बंधन खुल गये, केश-पाश बिखर गये, वस्त्र खिसक गये, किन्तु उनकी सूक्ष्म कटियाँ किसी प्रकार नहीं टूटी।

वे चारों सुन्दरियाँ नाच उठीं। अपनी पूर्व-दशा को भूलकर गाने लगीं। जिस किसी को देखती थीं, उसको हाथ जोड़कर नमस्कार करतीं। इसका ध्यान उन्हें नहीं रहा कि वे क्या कह रही हैं। यो वे (कौशल्या के) प्रासाद के निकट जा पहुँचीं।

घनश्याम की जननी कौशल्या ने, अपने पास आई हुई उन दासियों को प्रेम से देखा और पूछा—'हे बिंबफल-समान ओंठोंवाली रमणियों ! तुमको देखने से विदित होता है कि तुम कोई शुभ समाचार लाई हो। शीघ्र कहो, वह क्या है।

तब दासियों ने निवेदन किया कि चक्रवर्ती तुम्हारे ज्येष्ठ पुत्र को, यह कहकर कि 'नरेशो द्वारा तुम्हारे वीर-वलय-भूषित चरणों के वन्दित होते हुए तुम चिरकाल तक पृथ्वी का शासन करो'—अपने प्राचीन मुकुट को उन्हें पहनानेवाले हैं।

इस समाचार के सुनते ही कौशल्या के मन मे 'राम को राज्य-संपत्ति मिलनेवाली है।' इस विचार से जो आनन्द का सागर उमड़ा था, उसे, 'चक्रवर्ती राज्य त्याग कर (अरण्य मे) जानेवाले हैं।' इस विचार-रूपी वड़वाग्नि ने सुखा दिया।

फिर भी, कौशल्या ने उन स्त्रियों को अपूर्व रत्नहार और धन दिये और अपने प्रेम के पात्र-भूत सुमित्रा को साथ लेकर चक्रधारी (भगवान् रंगनाथ) के मंदिर मे जा पहुँची।

मंदिर में पहुँचकर, लक्ष्मी और भूदेवी-सहित उस भगवान् के, जो सब देवों के प्राण हैं, ज्ञान हैं तथा (सब के) आदि कारण हैं, चरण-कमलों को प्रणाम किया।

सब लोकों को अपने उदर में अन्तर्भूत करनेवाले नारायण को अपने गर्भ में रखनेवाली उम तपस्यामयी (कौशल्या) ने भगवान से प्रार्थना की कि तुमने मुझे जो पुत्र दिया है, उसपर अनुग्रह करना भी तुम्हारा ही कर्त्तव्य है।

यों प्रार्थना करके चारो वेदों में प्रतिपादित विधान से उस नारायण की विशेष पूजा करके, उन्होंने (कौशल्या ने) उत्तम तपस्या से सम्पन्न लोगों को वत्स-युक्त धेनुएँ दान कीं।

उन्होंने ब्राह्मणों को स्वर्ण, उत्तम रत्न, चंदन-रस, भूमि, कन्याएँ इत्यादि सब प्रकार की वस्तुएँ दान कीं। उन्हें अन्न और उत्तम वस्त्र भी दान किये।