भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 549 में से

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पृष्ठ 187

अयोध्याकाण्ड १७५

से संयुक्त चमकते हुए वस्त्र गगन से सरक पड़े—(अर्थात्, राम के सौन्दर्य को देखकर नारियाँ मुग्ध हुईं, जिससे उसके शरीर में अनेक काम-विकार उत्पन्न हो गये। मेघ-से 'केश', चन्द्र- से 'वदन', मुक्ताकण-से 'अश्रु', कमल-से 'कर', और गगन-मे 'कटि' का अर्थ लगाना चाहिए।) चर्ममय कोशो को हटाकर चमकनेवाले करवालो के जैसे चन्द्र शोभायमान हो रहे थे, (अर्थात् पलको को खोलकर नेत्र चमक रहे थे, जिनसे नारियो के वदन शोभायमान हो रहे थे)। उन चन्द्रों को ढोनेवाली और भार से लचकनेवाली लताओ में दो-दो नारि- केल लगे थे (अर्थात्, स्तन थे), जिन पर ओस की बूँदें फैल रही थी (अर्थात्, स्वेद- कण फैल रहे थे); और जिन पर सोने के पत्र यत्र-तत्र अंकित थे (अर्थात्, सोने के रंग की चित्रियाँ पड़ी थी)। उधर ऐसी घटनाएँ हो रही थी; उधर पुरुष लोग, अपनी माँ का स्मरण कर आनन्दित होनेवाले गाय के बछड़ो के समान (प्रसन्न) खड़े थे; यों रामचन्द्र, अपने पवित्र शीलवाले अपने भाई के साथ, सुमंत्र के द्वारा चलाये जानेवाले रथ पर सवार होकर, प्रसन्न मन से बैठे हुए चक्रवर्त्ती के निकट जा पहुँचे। रामचन्द्र ने महातपस्वी (वसिष्ठ) को नमस्कार किया, फिर चक्रवर्त्ती के कमल- सदृश चरणों को प्रणाम किया। तब चक्रवर्त्ती ने उमड़ते प्रेम के साथ आँखो से आनन्दाश्रु बहाते हुए सीता के वल्लभ (राम) को राज्यलक्ष्मी के निवास-भूत अपने वक्ष से लगा लिया। दशरथ ने मगल के आवामभूत अपने पुत्र का आलिगन क्या किया, वास्तव मे उन्होने समुद्र से आवृत पृथ्वी के भार को वहन करने की (रामचन्द्र की) शक्ति को आँकना चाहा और अपने वक्ष से उन (राम) के, लक्ष्मी तथा पुष्पमालाओं से विभूषित वक्ष को नापकर देखा। फिर, दशरथ ने राम को अपने पार्श्व में बिठा लिया और आनन्द और उमड़ते प्रेम के साथ उन्हे देखकर कहा - परशुराम के महान् यश को छोटा करनेवाले उन्नत कन्धो से युक्त (हे राम)! तुमको पुत्र के रूप में पाने से मुझे जो सबसे उत्तम फल प्राप्त होना है. उसके सपन्न होने का एक उपाय है। वह तुममे ही पूर्ण हो सकता है। हे तात! मै बहुत थक गया हूँ। अवारणीय वार्द्धक्य भी मेरे शरीर में उत्पन्न हो गया है। तुम्हे मेरी ऐसी सहायता करनी चाहिए, जिससे मैं चिंताजनक भू-भार नामक कठोर कारागार से मुक्त होकर अनुपम निःश्रेयस् (मुक्ति) के मार्ग पर जाऊँ और उज्जीवन¹ प्राप्त कर सकूँ। महापुरुषो का कथन है कि सत्पुत्र प्राप्त करना, अपार दुःख से मुक्त होने तथा उभय लोको में आनन्द अनुभव करने का साधन है। तुम तो धर्म-स्वरूप ही हो। तुम्हे पुत्र के रूप में पाकर भी मै चिन्तित रहूँ, यह उचित नहीं। अतः, मेरे प्रति तुम्हारा एक कर्त्तव्य है, उसे सुनो।


१. विशिष्टाद्वैत के अनुसार 'उज्जीवन' मुक्त आत्मा की स्थिति को कहते हैं।