कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें१७४ | कंब रामायण
आलान में बाँधे जानेवाले मत्तगजों की सेना से युक्त राजाओं, नगर के लोगों, मंत्रियों तथा मुनियों के हृदय-रूपी नगाड़ों को ध्वनित करते हुए (अर्थात्, आनन्दित करते हुए) आप, नीलरत्न-सदृश देह-कांतिवाले अपने (राम) को राजा बनावें, फिर परलोक के अनुकूल व्यापार संपन्न करें।
सुमंत्र के इस प्रकार कहने पर चक्रवर्ती ने कहा—तुमने ठीक कहा, पहले राम को मुकुट पहनाकर फिर अन्य कर्त्तव्य करना है। तुम शीघ्र जाकर लक्ष्मी-सदृश (सीता) के पति को ले आओ।
दशरथ के मन-सदृश वह सुमंत्र, पुष्पमाला-भूषित चक्रवर्ती को प्रणाम करके, पर्वत-समान सौधों से युक्त राजवीथी में, त्वरित गति से, स्वर्णमय रथ को यों चलाता हुआ गया, मानो उसने सब लोकों को प्राप्त कर लिया हो और राम के प्रासाद में प्रविष्ट हुआ।
उस प्रासाद में रामचन्द्र, नारियों में अमृत-समान सीता के साथ सुखासीन थे और उनके एक ओर, उनसे पृथक् न होनेवाले लक्ष्मण भी धनुष धारण करके खड़े थे। उस मधुर दृश्य को देखकर सुमंत्र के नयन तथा मन भ्रमरी के समान संतृप्त हो गये।
रामचन्द्र को देखकर सुमंत्र ने हाथ जोड़कर निवेदन किया कि हे प्रभु ! इस संसार के स्वामी (दशरथ) ने आदेश दिया है कि एक मुख्य कार्य के लिए मैं आपको ले आऊँ। यह सुनते ही कमलनयन प्रभु (राम) झट उठ और सजल मेघ के समान चलकर ध्वजा से भूषित उस रथ पर आरूढ़ हो गये।
नगाड़े मेघ-पंक्ति के समान बज उठे, सुन्दरियों की कलाइयों से फिसल पड़ने-वाली शंख की चूड़ियाँ बज उठीं, देवगण, यह विचारकर कि हमारा अभीष्ट पूर्ण होने-वाला है, आनन्द-ध्वनि कर उठे, राम के शिर पर आवेष्टित पुष्पमालाओं पर के भ्रमर गुंजार कर उठे।
सर्वत्र वाद्य-घोष भर गया, संगीत-नाद भर गया, मन्मथ के बाण भर गये, प्रत्यंचा के घोष भर गये। (वहाँ की रमणियों के) मनोभाव-रूपी बाढ, संयम के बाँध को तोड़कर उमड़ उठी और वे रमणियाँ हरिणियों के समान सर्वत्र फैल गईं।
दीर्घस्तंभों से युक्त द्वारों में कमल-पुष्प—(अर्थात्, रमणियों के मुख), कुंडलों एवं खुले हुए केश-पाशों के साथ, प्रासादों के ऊपर प्रफुल्लित हो रहे थे, तथा गवाक्षों में भ्रमरों, करवालों, रक्त-सिक्त भालों तथा मीनों के साथ दिखाई पड़ रहे थे।
पूर्णचन्द्र सदृश वदनवाले, कालमेघ-सदृश, देवाधिदेव (राम) के पर्वत-समान (दृढ) वक्ष पर स्थित पुष्पमालाओं में, बिंब-सदृश अधरवाली सुन्दरियों के, संयम, लज्जा आदि गुणों से अनुस्यूत, मीन (तुल्य नयन) मधुरगान करनेवाले भ्रमरों के साथ उलझे पड़े रहे।
(जब रामचन्द्र वीथी में जा रहे थे, तब) मेघों के साथ चन्द्र नीचे की ओर झुक आया, जिनमें पुष्प बरस पड़े, उत्पल-समान नयनों की कोरों से मुक्ताकण बरस पड़े, झूलते पुष्पों से युक्त पुष्ट स्तन (फूलकर) हारों के मध्य समा गये, विकसित कमल-पुष्पों