कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड १७३
हे महाभाग ! तुमने पुण्यकारक अनेक यज्ञ किये हैं। अब तुम्हें अपूर्व तपस्या करना ही उचित है। तुम्हारा पुत्र वीर-कंकणधारी (राम) पृथ्वी का इस प्रकार शासन करेगा कि सुन्दर (समुद्र-रूपी) मेखला-भूषित भूमि तुम्हारे वियोग से नेत्रहीन न होगी।
'धर्म ही (राम के रूप में) अवतीर्ण हुआ है', इसके अतिरिक्त हम और क्या कह सकते हैं ? वह विजयी (राम), सारे पदार्थों की सृष्टि कर, उनकी रक्षा कर, फिर उनका विनाश करनेवाले त्रिदेवों के व्यापारों को भी सुधारेगा ।
हे बुद्धि-बल से युक्त ! सौन्दर्य से सम्पन्न श्रीदेवी और भूदेवी, दोनो जिसको अपना प्राण-समान पति मानती हैं, वह केवल उनको तथा तुमको ही प्रिय नहीं है, अपितु वह संसार के सब प्राणियों को प्रिय है ।
हे वीर ! उस (राम) के नाम का उच्चारण करने से ही प्रतिदिन के क्लेश दूर हो जाते हैं। इस कारण से, ब्राह्मण आदि तुम्हारे पुत्र को, उनके सुकृत के फलस्वरूप उत्पन्न मानते हैं । (राम के प्रति) अन्य लोगों के प्रेम के बारे में और क्या कहना है ?
महान् कीर्त्ति से युक्त जानकी, भूदेवी से भी उत्तम है। लक्ष्मी, सरस्वती तथा पार्वती से भी उत्तम है। रामचन्द्र उस (सीता) के नयनों से भी उत्तम हैं। साधारण लोग तथा पंडित, पिये जानेवाले जल और अपने प्राणों से भी बढ़कर उस (राम) को चाहते हैं ।
हे चक्रवर्ती ! मानवों, देवों तथा अन्य (नागों) के एवं सर्वप्राणियों के दुःखों को दूर करके उनकी रक्षा करनेवाला, राम से बढ़कर और कोई नहीं है। अतः, विचार करने पर विदित होता है कि तुम्हारे लिए यही उचित है कि राम को राज्य देकर तपस्या करने के लिए जाओ ।
वसिष्ठ के ये वचन सुनकर, दशरथ को जो आनन्द हुआ, वह रामचन्द्र के जन्म पर, शिव-धनुष के टूटने पर और परशुराम के परास्त होने पर जो आनन्द हुआ था, उनसे भी बढ़कर था ।
दशरथ ने ऐसे आनन्द के साथ नयनों में अश्रु भरकर महिमामय गुरु वसिष्ठ के चरणों को नमस्कार किया और कहा—हे भगवन् ! आपने अच्छा कहा । आपकी कृपा से ही मैं अबतक भूमि का भार वहन कर सका । यह कार्य राम के लिए कुछ कठिन नहीं होगा ।
हे पितृतुल्य ! आपके परामर्श से मेरे कुल के राजा लोग अनन्त यश के भागी बने और अनेक यज्ञ करके दोनों प्रकार के कर्मों से मुक्त हुए; मुझे भी आपकी वही कृपा प्राप्त हुई है ।—यों कहकर दशरथ आनन्दित हुए ।
निष्कलंक तपस्या से संपन्न मुनिवर मौन हो रहे । तब सुमंत ने सब विषयों का विचार करनेवाले मंत्रियों के मुख से प्रकाशित उनके हृदय के भाव को जानकर, अपने कर जोड़कर राजा से यों निवेदन किया—
'राम राज्य प्राप्त करेंगे', इस समाचार से आनन्दित होनेवाले हृदयों को, तपस्या करने के लिए आपके जाने का समाचार जला रहा है । अपने कुल के पूर्वजों का धर्म त्यागना भी ठीक नहीं है । अतः, धर्म से बढ़कर निष्ठुर विषय अन्य कुछ नहीं है ।