भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 184

१७२ कम्ब रामायणं

यथाविधि रक्षा करस का और पुण्य-कार्य किये। यों, इस ससार के जीवन में मेरी सहायता करनेवाले आपलोगो को, मेरे परलोक-जीवन के लिए भी कुछ सहायता करनी है। जब हम अपने पूर्वकृत पापो को अपार करुणापूर्ण तपस्या से दूर कर सकते हैं, तब कौन ऐसा मनुष्य होगा, जो अनुपम अमृत को छोड़कर उसके विरोधी कठोर विषय का पान करेगा ? आलान में बँधे हुए मत्तगज की पीठ पर के मयूरपंखो तथा श्वेत छत्र की सुखद छाया शाश्वत नही होती। अनेक दिनो से आस्वादित होकर जो जूठा हो गया है, उसके आस्वादन में अब क्या आनन्द आ सकता है ? पुत्र न होने से मैं अनेक दिनो तक दुःखी रहा। मेरे उस दुःख को दूर करने के लिए राम उत्पन्न हुआ। अब मै उसको प्रसन्न रखकर स्वय इस ससार की बाधा से मुक्त होने का उपाय करूँगा। 'राम के पिता ने युद्ध-क्षेत्र में मृत्यु नही प्राप्त की। अधिक वृद्ध होने पर भी वह आसक्ति-हीन नही हुआ'—ऐसा अपयश उत्पन्न हो, तो मेरा जीवन ही व्यर्थ हो जायगा। रामचन्द्र जैसा पुत्र मुझे हुआ है और सीता जैसी लक्ष्मी के साथ उसका विवाह होते हुए मैने देखा है। अब मै उस (राम) का विवाह क्षमा नामक गुणवाली भूदेवी के साथ होते हुए देखना चाहता हूँ । भूमि नामक गौरवपूर्ण रमणी का तथा अरुण कमल पर आसीन लक्ष्मी का, अपने मनोनुकूल पति पाने का जो सौभाग्य होता है, उसके फलीभूत होने में विलम्ब करना उचित नही है। अतः, मै गम को राज्य देकर, अज्ञान-जन्य इस जन्म को दूर करने के उपाय-भूत महान् तपस्या करने के लिए, मै अरण्य को जाऊँगा। इसके बारे में आपलोगो का विचार क्या है ?—यो दशरथ ने कहा। पुष्ट कंधोवाले दशरथ के यो कहने पर मंत्रियो के मन में आनन्द उमड़ उठा, किन्तु साथ ही, उस समय चक्रवर्ती के वियोग को सोचकर, उनकी वही दशा हुई, जो दो बछड़ो के प्रति अपने प्रेम से व्याकुल होनेवाली गाय की होती है। दुःखी होने पर भी मंत्रियो ने सोचा कि चक्रवर्ती के लिए उस प्रकार करने के अतिरिक्त अन्य कोई हितकर कार्य नही है, तथा विशाल ससार में रहनेवाले प्राणियो को राम के समान प्रिय अन्य कोई नही है, इस प्रकार सोचकर एव भावी प्रबल होने के कारण वे (मत्री) उस विचार से सहमत हुए। वेदो के अधिष्ठाता चतुर्मुख के पुत्र (वसिष्ठ मुनि) ने, मंत्रियो के विचारो को, अपने पुत्र पर अधिक अनुरक्त चक्रवर्ती के मन को तथा ससार के प्राणियो के हित की तटस्थता के साथ विचार कर ये वचन कहे— हे चक्रवर्ती ! इसके पूर्व, तुम्हारे वश में उत्पन्न प्रसिद्ध चक्रवर्तियो मे किसने श्रीराम जैसा पुत्र पाया था ? तुम शास्त्रो के ज्ञाता हो, तुम्हारे लिए ऐसा कार्य उचित ही है, हे विवेकशील ! तुमने धर्म के अनुकूल ही सोचा है।