भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 549 में से

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पृष्ठ 182
१७०कंब रामायण

वहाँ पहुँचकर चक्रवर्त्ती ने अपने साथ आये (सामन्तो) नरेशो, अनुपम बन्धुजनों तथा परिवार के अन्य लोगो को मृदुल वचनो से वहाँ से भेज दिया और एकात मे इस प्रकार बैठे रहे, जिस प्रकार चक्रपाणि (विष्णु) तटस्थ रहकर ससार की रक्षा करने के निमित्त एकात मे योग-निद्रा धारण करते हैं।

उन चक्रवर्त्ती ने, जो चन्द्रोपम तथा गगनोन्नत श्वेत छत्र के साथ संसार की रक्षा करते थे, देवो के गुरु वृहस्पति के समान रहनेवाले अपने मंत्रियो को बुला भेजा।

उस समय वे वसिष्ठ मुनि मंत्रणागृह मे जा पहुँचे, जो सुन्दर वीर-कंकण धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती को पौरोहित्य-रूपी रक्षा देने तथा मार्ग-दर्शन कराने के कारण अत्यधिक आदरणीय थे, देवो तथा मुनियो के लिए देवतुल्य थे, एवं त्रिमूर्त्तियों के साथ चौथे देव के सदृश थे।

फिर वे मत्री लोग आ पहुँचे, जो कुलक्रम से (इक्ष्वाकु-वंश के राजाओ के) मंत्री का कार्य करते आये थे, प्रभूत कला-सपन्न थे, बहुश्रुत थे, पुरुषार्थ-संपन्न थे, अपने हित की हानि होने की संभावना होने पर भी जो तटस्थता को नहीं त्यागनेवाले थे, क्रोध आदि दुर्गुणों को जिन्होने मूल-सहित मिटा दिया था तथा अपूर्व धर्मों का आचरण करते थे।

जो वर्त्तमान व्यापारो से भावी परिणामो का अनुमान लगाने मे समर्थ थे, जो बुद्धिबल से युक्त थे, भाग्य का परिणाम होने पर भी भावी को बदलने का उपाय करने में चतुर थे, जो उत्तम कुल के योग्य सदाचार से युक्त थे, जिन्होने अनेक अपूर्व शास्त्रों का अध्ययन किया था, जो अभिमान मे चमरी-मृग के समान थे।$^१$

वे ऐसे शीलवान् थे कि उचित काल, स्थान, साधन आदि को शास्त्रानुकूल रीति से परखकर, दैव की अनुकूलता को भी देखकर, धर्म की उन्नति करनेवाले थे। यश देनेवाले कार्यों को जानकर उनके द्वारा राजा के पुरुषार्थो को बढानेवाले थे।

चक्रवर्त्ती के क्रुद्ध होने पर भी वे मत्री अपने प्राणो की रक्षा की चिन्ता नही करते थे, किन्तु राजा के क्रोध को सहकर भी अपने सिद्धान्त पर दृढ रहते थे और नीति का ही कथन करते थे। सन्मार्ग से कभी न डिगनेवाले थे। त्रिकाल के व्यापारो को जाननेवाले थे। (स्वय विचार करके किये गये निर्णय को) एक ही बार प्रतिपादित करनेवाले थे।

चक्रवर्त्ती के लाभ और हानि का विवेचन करके अन्त में वैद्य के समान (उनके हित को ही) सोचनेवाले थे। अकस्मात् कोई विपदा उत्पन्न होने पर पूर्व जन्म के सुकृत के समान आकर सहायता करनेवाले थे।

सपत्ति से युक्त ऐसे मत्री यद्यपि साठ सहस्र थे, तथापि चक्रवर्त्ती का हित करने के विषय मे सबकी बुद्धि एक ही थी। वे अपूर्व मंत्रणा-शक्ति से संपन्न थे। ऐसे वे मत्री वीचियो से भरे समुद्र के समान वहाँ आ पहुँचे।

वे मंत्री यथाक्रम आये। उन्होने पहले महान् ज्ञानी वसिष्ठ को प्रणाम किया,


१. अभिमान में चमरी-मृग के समान थे—अर्थात, जिस प्रकार अपने केश खोकर चमरी-मृग जीवित नहीं रहता, उसी प्रकार ये मंत्री अभिमान को खोकर जीवित रहनेवाले नही थे।—अनु०

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