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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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मंगलाचरण

कुब्जा (मंथरा) तथा क्षात्र धर्मवाली विमाता (कैकेयी) के क्रूरतापूर्ण कार्य के कारण राज्य त्याग कर, अरण्य एवं समुद्र को पारकर, रावण आदि के वध के द्वारा स्वर्ग-वासियों तथा पृथ्वीवासियों की विपदा को दूर करनेवाले चरणों से शोभायमान, हे प्रभो! (हे राम!) ज्ञानी लोग कहते हैं कि तुम उन सब पदार्थों में, जो (पदार्थ) मूल प्रकृति से विवर्त्तित होकर अनंत रूप में फैले हुए पंच महाभूतों के कार्य-रूप हैं, अंदर और बाहर में इस प्रकार परिव्याप्त होकर रहते हो, जिस प्रकार शरीर और प्राण रहते हैं तथा प्राण और बुद्धि रहते हैं।


अध्याय १

मंत्रणा पटल

दशरथ के कर्णमूल में एक केश, अपने काले रंग को छोड़कर श्वेत रंग के साथ दिखाई पड़ा। वह ऐसा लगा, मानो उन (दशरथ) के कान में यह बात कहने के लिए आया हो कि हे राजन्! अब तुम्हारी अवस्था इस योग्य हो गई है कि तुम अपना राज्य अपने पुत्र (राम) को देकर तपस्या में निरत हो जाओ।

मानो यमराज के बाण ही (दशरथ के) पके केश-रूप में आये हों—यों सूर्यकुल (दशरथ) ने अपना मुख आईने में देखते समय अपने पके हुए केश को देखा।

अलंकारों से भूषित, अधिक क्रोध से भरे, एवं हौदोंवाले बड़े-बड़े हाथियों से युक्त चक्रवर्ती (दशरथ), मेघों के समान नगाड़ों के गरजते तथा अपने चारों ओर अति सुन्दर चामरों के डुलते हुए मंत्रणा-गृह में आ पहुँचे।