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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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अयोध्याकाण्ड १८१

पृथ्वी पर धूमकेतु के जैसे उत्पन्न, मेखलाधारिणी, रमणियो की कामव्याधि नहीं हो, तो (किसी को) कोई बड़ी विपदा उत्पन्न नहीं होगी। नरक की यातना भी उत्पन्न नहीं होगी।

तत्त्वज्ञ मुनिवर (वसिष्ठ), सब लोकों को अपने उदर में समानेवाले (विष्णु के अवतार राम) को इस प्रकार के नीतिबोधक मधुर वचन कहकर, उनके ज्ञान को बढ़ाकर, उन (राम) के साथ सहस्र शिरवाले¹ भगवान् (विष्णु) के मंदिर में गये।

वसिष्ठ (राम को साथ लेकर) सर्पशय्या पर शयन करनेवाले भगवान् (रंगनाथ) के सम्मुख जा पहुँचे। उनकी पूजा की और चतुर्वेदों के मंत्रों से अभिमंत्रित पुण्य-जल से राम को स्नान कराया। फिर, राजाओं के लिए उचित, विद्वानों के द्वारा प्रतिपादित, सब आचार संपन्न किये और श्वेत दर्भों के आसन पर (राम को) आसीन कराया।

जब रामचन्द्र इस प्रकार आसीन हुए, तब यज्ञोपवीत से अलंकृत वक्षवाले (वसिष्ठ) ने शीघ्र जाकर प्रतापी राजा को (राम के व्रत आदि संपन्न करने का) समाचार दिया। चक्रवर्ती ने नगर को अलंकृत करने की आज्ञा दी।

'वल्लुवर' (ढिंढोरा पीटकर राजाज्ञा की घोषणा देनेवाली एक जाति) लोगों ने नगर की वीथियों में घूमते हुए ढिंढोरा पीट-पीटकर घोषणा की कि रामचन्द्र कल ही राजमुकुट धारण करनेवाले हैं। अतः, इस सुन्दर नगर को अलंकृत कीजिए। इस घोषणा से देवता भी आनन्दित हो उठे।

'काव्यों में प्रतिपादित यशवाले राम, कल ही रत्नमय राजकिरीट धारण करने-वाले हैं'—यह सूचना लोगों के कानों को आनन्द देनेवाली थी। इतना ही नहीं, यह (वचन) सब लोगों के लिए देवों के आहारभूत हविर्भाग तथा अमृत के समान तृप्तिकारक था।

नगर के लोग कोलाहल कर उठे। आनन्द में नाचने-गाने लगे। उनके शरीर स्वेद से भर गये। वे फूल उठे। उनकी देह पुलक से भर गई। वे चक्रवर्ती की स्तुति करने लगे। जो भी यह शुभ समाचार देता था, उसे वे अपार द्रव्य देते थे।

प्रेम से भरे उस नगर के लोगों ने उस सुन्दर नगर का इस प्रकार अलंकरण किया, जैसे पुंजीभूत किरणोंवाले सूर्य को ही सँवार रहे हों या शेषनाग पर सोनेवाले विष्णु के विशाल वक्ष पर स्थित कौस्तुभ मणि को सान पर रखकर उसे चमका रहे हों।

श्वेत, काले, रक्तवर्ण तथा अन्य रंगवाली ध्वजाओं की पंक्तियाँ ऐसी लगती थीं, मानो मधुस्रावी पुष्प-मालाओं से युक्त राम के वैभव को देखने के लिए सब प्रकार के विहग उस सुन्दर नगर में आ पहुँचे हों।

उस नगर में युवतियों की जाँघों के जैसे कदली-वृक्ष लगाये गये। उन (युवतियों) की ग्रीवाओं के जैसे क्रमुक-वृक्ष लगाये गये। उनके दाँतों की जैसी मुक्ता-पंक्तियाँ सजाई गईं तथा उनके स्तनों के जैसे कनक-कलश श्रेणियों में रखे गये।


१. वेदों में प्रतिपादित 'सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्ष. सहस्रपात्' वाक्य के अनुसार ही यहाँ विष्णु को सहस्र शिरोवाला कहा गया है।