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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

अयोध्याकाण्ड १८१

पृथ्वी पर धूमकेतु के जैसे उत्पन्न, मेखलाधारिणी, रमणियो की कामव्याधि नहीं हो, तो (किसी को) कोई बड़ी विपदा उत्पन्न नहीं होगी। नरक की यातना भी उत्पन्न नहीं होगी।

तत्त्वज्ञ मुनिवर (वसिष्ठ), सब लोकों को अपने उदर में समानेवाले (विष्णु के अवतार राम) को इस प्रकार के नीतिबोधक मधुर वचन कहकर, उनके ज्ञान को बढ़ाकर, उन (राम) के साथ सहस्र शिरवाले¹ भगवान् (विष्णु) के मंदिर में गये।

वसिष्ठ (राम को साथ लेकर) सर्पशय्या पर शयन करनेवाले भगवान् (रंगनाथ) के सम्मुख जा पहुँचे। उनकी पूजा की और चतुर्वेदों के मंत्रों से अभिमंत्रित पुण्य-जल से राम को स्नान कराया। फिर, राजाओं के लिए उचित, विद्वानों के द्वारा प्रतिपादित, सब आचार संपन्न किये और श्वेत दर्भों के आसन पर (राम को) आसीन कराया।

जब रामचन्द्र इस प्रकार आसीन हुए, तब यज्ञोपवीत से अलंकृत वक्षवाले (वसिष्ठ) ने शीघ्र जाकर प्रतापी राजा को (राम के व्रत आदि संपन्न करने का) समाचार दिया। चक्रवर्ती ने नगर को अलंकृत करने की आज्ञा दी।

'वल्लुवर' (ढिंढोरा पीटकर राजाज्ञा की घोषणा देनेवाली एक जाति) लोगों ने नगर की वीथियों में घूमते हुए ढिंढोरा पीट-पीटकर घोषणा की कि रामचन्द्र कल ही राजमुकुट धारण करनेवाले हैं। अतः, इस सुन्दर नगर को अलंकृत कीजिए। इस घोषणा से देवता भी आनन्दित हो उठे।

'काव्यों में प्रतिपादित यशवाले राम, कल ही रत्नमय राजकिरीट धारण करने-वाले हैं'—यह सूचना लोगों के कानों को आनन्द देनेवाली थी। इतना ही नहीं, यह (वचन) सब लोगों के लिए देवों के आहारभूत हविर्भाग तथा अमृत के समान तृप्तिकारक था।

नगर के लोग कोलाहल कर उठे। आनन्द में नाचने-गाने लगे। उनके शरीर स्वेद से भर गये। वे फूल उठे। उनकी देह पुलक से भर गई। वे चक्रवर्ती की स्तुति करने लगे। जो भी यह शुभ समाचार देता था, उसे वे अपार द्रव्य देते थे।

प्रेम से भरे उस नगर के लोगों ने उस सुन्दर नगर का इस प्रकार अलंकरण किया, जैसे पुंजीभूत किरणोंवाले सूर्य को ही सँवार रहे हों या शेषनाग पर सोनेवाले विष्णु के विशाल वक्ष पर स्थित कौस्तुभ मणि को सान पर रखकर उसे चमका रहे हों।

श्वेत, काले, रक्तवर्ण तथा अन्य रंगवाली ध्वजाओं की पंक्तियाँ ऐसी लगती थीं, मानो मधुस्रावी पुष्प-मालाओं से युक्त राम के वैभव को देखने के लिए सब प्रकार के विहग उस सुन्दर नगर में आ पहुँचे हों।

उस नगर में युवतियों की जाँघों के जैसे कदली-वृक्ष लगाये गये। उन (युवतियों) की ग्रीवाओं के जैसे क्रमुक-वृक्ष लगाये गये। उनके दाँतों की जैसी मुक्ता-पंक्तियाँ सजाई गईं तथा उनके स्तनों के जैसे कनक-कलश श्रेणियों में रखे गये।


१. वेदों में प्रतिपादित 'सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्ष. सहस्रपात्' वाक्य के अनुसार ही यहाँ विष्णु को सहस्र शिरोवाला कहा गया है।

१८२कंब रामायण

गोपुरों के द्वारों में चंद्र को छूनेवाले अत्यन्त तथा नूतन तोरण बाँधे गये। उनसे ऐसी कांति बिखर रही थी, जैसे प्रभातकालीन बाल-सूर्य पहले से भी अधिक कांति से युक्त हो गया हो।

उत्तम माणिक्यमय स्तंभ श्वेत वस्त्रों से आवृत्त होकर ऐसे लगते थे, जैसे पार्वती देवी को अर्द्धाङ्ग में रखे हुए विभूति रमाये हुए शिव भगवान् हों। प्रवालमय स्तंभ (श्वेत-वस्त्रों से आवृत्त होकर) हिमावृत सूर्य के समान लगते थे।

उस नगर की वीथियाँ, मुक्ताओं से चंद्रिका के फैलने से, घनी रत्न-पंक्तियों से सूर्यातप के फैलने से, नील रत्नों के किरण-पुंजों से, अंधकार के फैलने से, ज्योतिष शास्त्रज्ञों के द्वारा प्रकटित दिन के समान लगती थीं। (भाव यह है कि मानो ज्योतिषियों ने दिन के विविध रूपों को एक साथ उन वीथियों में प्रकट किया था।)

नाचनेवाले घोड़ों से युक्त रथ-समुदाय, पृथ्वी को देखने के लिए स्वर्ग से उतरे हुए देव-विमानों के जैसे लगते थे। मुख-पट्टी से भूषित विशाल मत्तगज सूर्य के साथ संचरण करनेवाले उदयाचल (पर्वत)-से लगते थे।

वैभव-पूर्ण उस नगर की स्फटिक शिलामय ऊँची दीवारों में जड़ित पद्मराग रत्न-श्रेणियाँ अपने प्रकाश से अंधकार को मिटा रही थीं। अतः, चक्रवाक के जोड़े कभी वियुक्त न होकर शान्तचित्त रहते थे।

सौधों से भरी वीथियों में पुष्पों की वर्षा, जल की वर्षा, नवीन सुगंध-चूर्णों की वर्षा, उज्ज्वल मुक्ताओं की वर्षा, आभरणों के रगड़ खाने से उत्पन्न स्वर्ण-धूलि की वर्षा--ये सब वर्षाएँ मेघ की वर्षा केसमान हो रही थीं।

मेघ जैसे मदस्रावी गज, कवच से आवृत्त तथा वीर-वलयधारी योद्धाओं के समान जा रहे थे। किंकिणी-भूषित करिणियाँ, लटकती मेखलाओंवाली नितम्बवती रमणियों के समान जा रही थीं।

उत्तरोत्तर बढ़नेवाला ऐश्वर्य, सौन्दर्य तथा सुख की उस नगरी में कुछ कमी नहीं थी। राम के राज्याभिषेक को देखने के लिए उस नगर में आये हुए देवलोक, इस भाँति से कि अभी हम स्वर्ग में ही हैं, अयोध्या में नहीं पहुँचे हैं, सोच में पड़ जाते थे।

देवलोक के समान शोभायमान उस नगर का शृंगार होने का वह कोलाहल सुन-कर क्रूरकर्मा रावण के पापों के समान स्थित तथा अन्य दुर्लभ कठोरता से युक्त मनवाली मंथरा वहाँ प्रकट हुई।

उस मंथरा का मन तड़प उठा। उसमें क्रोध उमड़ पड़ा। उसमें पीडा उत्पन्न हुई। उसकी आँखों से अग्नि बरसने लगी। वह अव्यवस्थित रूप से कुछ बड़बड़ाती हुई, त्रिभुवन को कुछ दुःख देने के लिए आगे बढ़ी।

पूर्वकाल में राम ने मिट्टी के ढेलों को अपने हाथ के धनुष पर रखकर उस (मंथरा) के कूबड़ पर मारा था, इस घटना को उसने स्मरण किया। क्रोध से वह अपने ओठ चबाने लगी और बिंब-समान अधरवाली कैकेयी के प्रासाद में गई।

चारों समुद्रों के रत्नों से युक्त होकर कमलों से पूर्ण एक अनुपम क्षीर-सागर की

अयोध्याकाण्ड १८३

लहर पर कोई प्रवाल लता फैली हो—इसी प्रकार कैकेयी, अपनी आँखों के कोरों से करुणा की वर्षा करती हुई एक उज्ज्वल पर्यंक पर शयन कर रही थी। उसके निकट मंथरा शीघ्र जा पहुँची।

उसने उत्पात की सूचना देनेवाले किसी दुष्ट ग्रह के समान वहाँ पहुँचकर कैकेयी के उन स्वर्ण आभरण-भूषित छोटे पैरो को अपने हाथों से छुआ, जो पैर ठली से विकसित होनेवाले कमल पुष्पों की तपस्या के फल से उन (कमलो) के योग्य उपमान बनकर उत्पन्न हुए थे।

मंथरा ने (जब उसके पैर) छुए, तब कैकेयी जग पड़ी, फिर भी दिव्य पातिव्रत्य से युक्त उस देवी के दीर्घ नेत्रो से निद्रा पूर्ण रूप से हटी नहीं। तब मथरा घोर निंदा-जनक पाप की प्रेरणा पाकर ये गढ़ी हुई बातें कहने लगी—

दुःखदायक करवाल-सदृश और विषपूर्ण (राहुनामक) सर्प के अपने निकट आने तक जिस प्रकार शीतल तथा रजत वर्ण चन्द्रमा अपनी उज्ज्वल किरणे फेकता रहता है, उसी प्रकार तुम भी, जबतक तुम्हे बहुत बड़ी विपदा प्राप्त न हो, तबतक उस (विपदा) की चिन्ता नहीं करती हुई सुख से सोती रहती हो।

क्रूर विष-सदृश मथरा के वचन सुनकर भाले जैसे नयनवाली कैकेयी ने कहा—शत्रुओ को परास्त करनेवाले धनुषो को धारण करनेवाले मेरे पुत्र सुखी हैं। वे अपने कार्यों में कभी धर्म से विमुख नहीं होते। फिर मुझे कौन-सी विपदा हो सकती हैं?

यशस्वी पुत्र को प्राप्त करने से कोई भी (व्यक्ति) दुःखमुक्त होकर सुखी हो जाता है। पञ्चभूतो के मिश्रण से उत्पन्न पृथ्वी पर, वेद-स्वरूप होकर जो राम अवतीर्ण हुआ है, उसे (पुत्र के रूप में) प्राप्त करने से अब मुझे कोई विपदा प्राप्त नहीं होगी।

अत्यधिक प्रेम के समुद्र में डूबी हुई कैकेयी ने ज्योंही ये वचन कहे, त्योंही पाप-समान उस वक्र मंथरा ने कहा—तुम्हारा हित नष्ट हो गया। तुम्हारा वैभव भी मिट गया। कौशल्या अपनी बुद्धि के बल से (ऐश्वर्य-युक्त जीवन) जीती है।

उसके यह कहने पर, उत्तम आभरणधारिणी कैकेयी ने कहा—राजाधिराज मेरे पति हैं, अवर्णनीय यशवाला भरत मेरा पुत्र है, इससे बढ़कर इस पृथ्वी पर वह (कौशल्या) देवी और क्या पा सकेगी?

तब मथरा ने कहा—वीरो के द्वारा उपहसित होते हुए और पौरुष को कुंठित करते हुए जिस (राम) ने ताड़का नामक स्त्री को मारने के लिए अपना धनुष झुकाया था, वह कल राज-मुकुट धारण करनेवाला है; यही उसका (अर्थात्, कौशल्या का) आनन्द-मय जीवन है।

मंथरा का यह प्रतिवचन सुनते ही, कैकेयी का मन, जो गरिमामय कौशल्या के मन के समान ही था, विरोध भाव से नहीं, किन्तु आनन्द से भर गया। इसका कारण कदाचित् यही है कि राम के पिता उसके मन में निवास करते थे।

उस निष्कलंक (कैकेयी) देवी का प्रेम-रूपी समुद्र उमड़ उठा। उसका अक्षीण चन्द्र-जैसा मुख और भी प्रकाशमान हुआ। उसका आनन्द वेला को पारकर बढ़ गया।

१८४ | कंब रामायण

उसने तीन ज्योतियों (सूर्य, चन्द्र और अग्नि) के जैसे (अति उज्ज्वल) रत्नहार उसे भेंट किया।

वह निष्ठुर और क्रूर (मंथरा) चिल्लाई। धमकी देने लगी। उसने अपनी छोटी आँखों से आग उगलते हुए उसकी ओर देखा। कैकेयी की निंदा की। उष्ण निःश्वास भरा। रोई। अपने रूप को विकृत किया और (कैकेयी के द्वारा दिये गये) उस स्वर्णमय रत्नहार से धरती को गड्ढा बना दिया (अर्थात्, उस हार को धरती पर फेंक दिया।)

पीड़ा उत्पन्न करनेवाली उस कूबरी ने क्रोध से घूरकर कहा—तुम मदबुद्धि हो। भेद-भाव न होने से तुम अपने पुत्र-समेत बड़ा दुःख पाओगी। किन्तु, मैं दीर्घकाल तक तुम्हारी सौत (कौशल्या) की सेवा करना सहन नहीं कर सकूँगी।

अरुण अधरवाली सीता और नीलवर्ण राम सिंहासन पर आसीन रहे और तुम्हारा पुत्र धरती पर खड़ा रहे—जब ऐसी दशा उत्पन्न हुई है, तब इससे तुम कैसे आनन्दित होती हो? तुमने अपने मन में कैसी दृढ़ता पाई है?

कौशल्या अपना हित भूली नहीं। अतः, उसका पुत्र राज्य-संपत्ति पाकर उन्नति प्राप्त करेगा। भरत ऐश्वर्य से वंचित होगा; वह (भरत) न मरा, न जीवित ही रहा; वह किस प्रकार से अपना दुःख दूर कर सकेगा? तुम्हारा पुत्र बनकर जन्म लेने से उसका जीवन व्यर्थ हो गया।

यदि इस सारी पृथ्वी का शासन यह श्रेष्ठ (राम) ही अपने भाई (लक्ष्मण) के साथ अनन्त काल तक करता रहे, तो भरत और उसके भाई शत्रुघ्न को देश से दूर रहकर (अरण्य में) व्रतयुक्त तपस्या करने के लिए भेज देना ही उचित होगा।

मत्तगजों की सेना से युक्त, भूदेवी के प्यारे, सुन्दर तथा बजाये जानेवाले नगाड़ों से युक्त रहकर धरती का राज्य करनेवाले राजाओं की श्रेणी में भरत उत्पन्न नहीं हुआ है।

स्वर्णवीर-कंकणधारी चक्रवर्ती ने उस दिन क्यों अभागे भरत को शालवृक्षों से आवृत्त ऊँचे पर्वतों से युक्त दूरस्थ (कैकेय) देश में सत्वर भेज दिया, इसका कारण मुझे अब ज्ञात हो रहा है।

मंथरा आगे और भी कुछ वंचना-पूर्ण उक्तियाँ कहती हुई भरत के प्रति बोली—तुम्हारे प्रति भेदभाव रखकर (राम को) राज्य देनेवाले तुम्हारे पिता निष्ठुर हैं। (यह समाचार सुनकर हर्ष करनेवाली) तुम्हारी माता भी निष्ठुर है। हे मेरे तात! भरत, अब तुम क्या करनेवाले हो?

फिर उसने कैकेयी के प्रति कहा—तुम राजकुल में उत्पन्न हुई। राजवंश में ही बढ़ी और राजकुल की वधू बनीं। यों राजमहिषी बनी हुई तुम बड़ी विपदा-रूपी समुद्र में गिरनेवाली हो, मेरी बात भी तुम नहीं सुनती हो। क्या तुम्हें कुछ ज्ञान भी है?

विद्या, यौवन, अपार पराक्रम, धनुर्विद्या की चातुरी, सौंदर्य, वीरता इत्यादि अनेक गुण भरत में स्थित हैं; किन्तु आज वे सब घाम-भरी धरती पर गिरी मधु की बूँद जैसे हो गये हैं।

मंथरा ने मुंह कड़वा करके जो बातें कही, उनसे कैकेयी का क्रोध ऐसे बढ़ गया;

अयोध्याकाण्ड १८५

जैसे जलती आग में घी पड़ा हो। उसकी रेखाओ से युक्त आँखे अधिक लाल हो गईं। मंथरा को देखकर उसने कहा —

आतपयुक्त सूर्य प्रभृति महान् पुरुष, प्राण जाने पर भी न्याय-मार्ग को नही छोड़ते। हे क्षुद्र स्वभाववाली ! मेरे कैकयवंश तथा (वैवस्वत) मनु के वंश को कलंकित करनेवाली कैसी क्षुद्र वात तूने कही ?

तू मेरा हित करनेवाली नही हैं। मेरे सुत भरत का भी हित करनेवाली नही है। धर्म का विचार करने पर (ज्ञात होता है कि) तू अपना भी हित करनेवाली नही है। हे विवेकहीन ! पूर्वजन्म के पाप-संस्कार के कारण तू ने (अपने) मन को अच्छी लगने-वाली बाते कही हैं।

जन्म और मृत्यु के कारण जो वस्तु प्राप्त होती है या खोती है, वह एकमात्र यश ही है। अतः, शरीर चाहे गिर जाय, न्याय अपने विरुद्ध हो जाय, सन्मार्ग का रूप अपने प्रतिकूल हो जाय, तपस्या का रूप विरुद्ध हो जाय तथा निष्कलंक पराक्रम भी विरुद्ध हो जाय, तो भी अपने कुल-धर्म को छोड़ना उचित नही है ।

तू मेरे सामने से हट जा। क्षुद्र वचन कहनेवाली तेरी जीभ को मैने काट नही लिया, पर तेरे इस अपराध को सह लिया, मेरे अतिरिक्त और कोई इस बात को सुन ले, तो तू अन्याय तथा अधर्म करने के अपराध का पात्र बन जायगी। अतः, हे बुद्धिहीन ! चुप रह ।

जिस प्रकार विष का उपचार करने पर भी वह विष न मिटकर पीडा ही उत्पन्न करे, उसी प्रकार मंथरा (कैकेयी के) वह वचन सुनकर भी भयभीत होकर हटी नही । किन्तु, यह कहती हुई कि हे मेरे अवलंब, मैं तुम्हे हितकारी वचन कहे बिना नही हटूंगी, उसके चरणो पर गिरकर फिर कहने लगी—

तुमने कहा—ज्येष्ठ के रहते हुए कनिष्ठ को राज्याधिकार नही होता। इस न्याय के अनुसार चक्रवर्त्ती के रहते हुए समुद्रवर्ण (राम) का राज्य पर कोई अधिकार नही है। जब चक्रवर्त्ती राम को राजमुकुट देने के लिए सन्नद्ध हुए हैं, तब वह सम्पत्ति भरत के लिए क्यो अप्राप्य हो सकती है ?

वैराग्यपूर्ण, करुणायुक्त तथा अपूर्व तपस्या से सम्पन्न मुनि भी क्यो न हो, दुर्लभ सम्पत्ति प्राप्त करने पर उनका विचार भी बदल जाता है। अतः, भले ही अबतक तुम्हारा कुछ अहित (कौशल्या और राम ने) नही किया हो, तथापि (सम्पत्ति पाने पर) वे अपने मन मे निरन्तर तुम्हारे अहित का ही चितन करते रहेंगे।

दूसरो की उन्नति पर ईर्ष्या करनेवाली कौशल्या का पुत्र जब राज करेगा, तब सारी पृथ्वी उसका स्वत्व बन जायगी। तब तुम्हारे पुत्र का तथा तुम्हारा इस पृथ्वी मे उस (कौशल्या) के दिये गये पदाथों के अतिरिक्त और कुछ अधिकार नही रहेगा ।

याचक लोग निर्धनता और दुःख से प्रेरित होकर तुम्हारे निकट आकर द्रव्य माँगेंगे, तब क्या तुम (उन याचको को देने के लिए) स्वय उस कौशल्या के पास जाकर हाथ फैलाओगी ? या (कुछ देने का सामर्थ्य न होने से) लज्जित होकर रहोगी ? अथवा

१८६कंब रामायण

(कुछ न दे सकने की) पीडा से भर जाओगी ? नही तो, क्या उन याचको से 'मेरे पास नही है' कह दोगी ? तुम कैसा जीवन व्यतीत करोगी ?

तुम क्या करने की बात सोचकर हर्ष से मुग्ध हुई थी ? भविष्य मे कभी तुम्हारे पिता, माता, कोई बन्धु या तुम्हारे कुल का कोई व्यक्ति अभाव-ग्रस्त होकर अपने अभाव को दूर करने के विचार से तुम्हारे पास आवेगा, तो क्या वह तुम्हारी सौत के ऐश्वर्य को देखकर चुप रह जायगा ? विचार करके देखो।

तुम पर प्रेम रखनेवाले तुम्हारे गरिमामय पति के डर से ही उस बिंवाधरा सीता का पिता तथा राम का ससुर, तुम्हारे पिता (केकय राजा) पर आक्रमण किये बिना रहता है। अब तुम्हारे पिता का जीवन समाप्त हो जायगा। हे अबोध ! तुम्हारे समान निंदनीय जन्मवाला और कौन है ?

और सुनो, यदि तुम्हारे पिता के कठोर शत्रु जब तुम्हारे पिता से युद्ध करने के लिए आयेगे, तब यदि कोशल देश की सेना उनकी सहायता न करेगी, तो उन्हे (तुम्हारे पिता को) विजय नामक वस्तु किस प्रकार मिलेगी ? यह बताओ। अहो, तुमने अपने बधुजनो का भी विनाश करनेवाले दुःख-समुद्र में डूबने का निश्चय कर लिया है ?

अपने उत्तम पुत्र को राज्य पाने से रोककर तुमने उसे मिटा दिया। उज्ज्वल समुद्र-रूपी वस्त्र से भूषित पृथ्वी को चक्रवर्त्ती ने अपने एक पुत्र को दिया, जो उसके प्रिय भाई का स्वत्व होगा। अन्य कौन उसपर अधिकार रख सकेगा ?—इस प्रकार मन्थरा ने कहा।

क्रूर मथरा के इन वचनो को सुनकर देवो की माया के कारण उन (देवो) के द्वारा प्राप्त वर के प्रभाव के कारण तथा मुनियो के तपःप्रभाव के कारण कैकेयी का सरल तथा निष्कलंक मन भी बदल गया।

राक्षसी के द्वारा कृत पापो तथा देवो के किये पुण्यो से प्रेरित होकर कैकेयी ने अपनी करुणा को त्याग दिया स्वच्छ वचनवाली तथा हरिणी-तुल्य कैकेयी की वह निष्ठुरता ही तो आज भी इस ससार के लोगो के, राम के अपार यशोमृत का पान करने का कारण बनी है ?

इस प्रकार (प्रभावित) होकर कैकेयी ने, पापकर्मों से पूर्ण कूबरी को प्रेम से देखकर कहा—तुम मुझपर प्रेम रखनेवाली और मेरे पुत्र का हित करनेवाली हो। मेरा पुत्र अलंकृत राज-किरीट को किस प्रकार प्राप्त करे, अब यह बताओ।

आम के टिकोरे के जैसे सुन्दर नयनोवाली (कैकेयी) की बात सुनकर मथरा बोली—मेरी सखी चतुर है, मेरी साथिन चतुर है। फिर (कैकेयी के) चरणो को नमस्कार करके कहा—अब तुम्हारी अवनति नही होगी। यदि तुम मेरी बात मानकर उसके अनुसार काम करोगी, तो मै सप्त लोको के राज्य पर भी तुम्हारे अनुपम पुत्र का स्वत्व बना दूँगी।

उस मंथरा ने जिसका मन भी (उसके शरीर के जैसे ही) टेढ़ा था, कहा—हे उज्ज्वल रत्न-समान देवी! मैं भली भाँति विचार कर तुम्हे एक बात बताती हूँ। पूर्वकाल

अयोध्याकाण्ड १८७

मे जब घनी विजयमाला से भूषित शंबरासुर मारा गया था, उस युद्ध मे विजयी चक्रवर्त्ती ने तुम्हे दो वर दिये थे ; उनको तुम उनसे अब माँग लो ।

उन दो वरों में से, एक से राज्य को तुम अपना बना लो और दूसरे से, चौदह वर्ष के लिए राम को देश छोड़कर अरण्य में भेजने का उपाय करो । इससे सारी समृद्ध पृथ्वी तुम्हारे पुत्र के अनुकूल हो जायगी ।

इस प्रकार कहनेवाली मंथरा का कैकेयी ने हर्ष से गाढ़ालिंगन किया और नवरत्नों का एक हार तथा अपार द्रव्य उसे दिया । फिर कहा—मेरे अनुपम पुत्र को गरजते समुद्र से आवृत पृथ्वी का राज तुमने दिया । पृथ्वी के पति भरत की माता तुम्हीं हो ।

तुमने अच्छा उपाय बताया । भरत को गरिमामय मुकुट पहनाना और राम को घने अरण्य मे भेजना, ये दोनो कार्य यदि आज पूर्ण नहीं होंगे, तो चक्रवर्त्ती के सामने ही मैं अपने प्राण त्याग दूंगी । अब तुम जाओ ।—इस प्रकार कैकेयी ने मंथरा से कहा ।

कूबरी के जाने के पश्चात् कैकेयी उत्तम पुष्यो के पर्यंक से उतर गई । अपने वर्षाकालिक मेघ के जैसे केशपाश में गुँथी पुष्पमाला के ( उन पुष्पों के ) मधु पर आसक्त भ्रमर-कुल को व्याकुल करते हुए, इस प्रकार निकाल फेंका, मानो आकाश के बादलों में छिपे चन्द्रमा को ही पकड़कर फेंक रही हो ।

उसने अपनी प्रकाशमय मेखला को दूर फेंक दिया, जैसे अपने बढ़नेवाले यशरूपी लता को ही उखाड़ रही हो । मंजीर, कंकण आदि को भी दूर फेंक दिया । यो उसने अपने ललाट पर केशपाश के समीप में स्थित अपूर्व तिलक को पोछ डाला, जैसे चन्द्रमा के कलंक को पोछ रही हो ।

फिर, उत्तम रत्न-जटित आभरणों को एक-एक करके उठाकर फेंक दिया । कस्तूरी-गंध से युक्त अपने केशपाश को ऐसे खोल दिया कि वे लटककर धरती को छूने लगे ; अंजनयुक्त नीलोत्पल-जैसे नयनों के अंजन को पिघलाते हुए वह अश्रु बहाने लगी एवं पुष्पहीन लता के समान धरती पर लोट गई ।

केकय की पुत्री इस प्रकार ( धरती पर ) पड़ी रही, जैसे पीडा की अधिकता से कोई हरिणी पड़ी हो । नाचनेवाला कलापी थककर पड़ा हो, अथवा 'कमलवासिनी ( लक्ष्मी ) सीता, अयोध्या छोड़कर जानेवाली है', यह विचार करके उस लक्ष्मी की बड़ी बहन ज्येष्ठा देवी$^१$ आकर वहाँ पड़ी हो । ( १-८८ )


१. जिस प्रकार लक्ष्मी को मंगल देनेवाली देवी मानते है, उसी प्रकार ज्येष्ठा को अमंगल की देवी मानते हैं ज्येष्ठा लक्ष्मी की बडी बहन मानी गई है । -अनु०

अध्याय ३

अध्याय ३

कैकेयी-(दुष्कार्य) पटल

रात्रि का अर्धभाग व्यतीत हो गया। तब दीर्घ भुजाओवाले सिंह-सदृश चक्रवर्ती (दशरथ), उनकी जय-जयकार करनेवाले राजाओ से घिरे हुए चले और वीणा-नाद को परास्त करनेवाली मधुर बोली से युक्त कैकेयी के प्रासाद में पहुँचे।

राजा लोग (दशरथ को) प्रणाम करके सौध-द्वार पर रुक गये। दासियाँ दौड़-कर आईं और उन (दशरथ) का स्वागत करके उन्हें भीतर ले गईं। यों चलकर चक्रवर्ती पर्यंक से अलग पड़ी हुई, बरछे-जैसे विशाल नयनों तथा मृदुल कंधोंवाली सुन्दरी (कैकेयी) के निकट गये।

चक्रवर्ती ने वहाँ जाकर (कैकेयी की दशा) देखी यह सोचते हुए कि न जाने इसे कौन-सा दुःख प्राप्त हुआ है, व्याकुलचित्त हुए। फिर, जैसे हाथी, हरिणी को उठा रहा हो, वैसे ही अपनी विशाल भुजाओ मे उसको आलिंगन-बद्ध करके उठाने लगे।

सुगंधित पुष्पमालाधारी चक्रवर्ती के प्राण-तुल्य उस (कैकेयी) ने उसका आलिंगन करनेवाले (चक्रवर्ती के) विशाल हाथों को झटककर हटा दिया और विद्युत् के समान तड़पकर धरती पर गिर पड़ी। फिर, कुछ कहे बिना दीर्घ श्वास भरती हुई पड़ी रही।

पुष्पमाला-भूषित चक्रवर्ती ने पृथ्वी पर गिरकर निःश्वास भरती हुई उसको देखा और भयभीत हुए। फिर, उससे कहा—क्या हुआ है ? इन सप्त लोकों के रहनेवालो मे से जिसने तुम्हारा अपमान किया हो, वह अपने प्राण खो बैठेगा। सारा वृत्तांत मुझे कह सुनाओ। फिर देखो कि मै क्या करता हूँ। सब बातें मुझे बताओ।

भ्रमरों से गुंजरित पुष्पमालाधारी चक्रवर्ती के वचन सुनकर कैकेयी ने सजल मेघ-जैसे अपने विशाल नयनों से अपने स्तनों पर अश्रु गिराती हुई कहा—क्या आपको मुझ पर दया है ? यदि है तो अपने पूर्व में जो वर मुझे दिये थे, उन्हें अब पूर्ण कीजिए।

मधुवर्षी (पुष्पों से अलंकृत) केशोंवाली कैकेयी का मनोभाव नहीं जानते हुए चक्रवर्ती ने अति उज्ज्वल बिजली के समान हँसकर कहा—तुम्हारा मनोरथ पूरा करूँगा। किंचित् भी कमी नहीं करूँगा। तुम्हारे पुत्र उदार राम की शपथ खाकर कहता हूँ।

यह वचन कहते ही हंसिनी-तुल्य कैकेयी ने कहा—यदि आपको मेरी बड़ी पीड़ा दूर करने का विचार है, तो हे राजन् ! देवता आपकी शपथ के साक्षी हों। आपने उस दिन जो दो वर मुझे दिये थे, उन्हें अब पूरा कीजिए।

उस निष्ठुर हृदयवाली की वंचना को नहीं जानते हुए चक्रवर्ती ने कहा—लो, अपना वर लो। तुम्हे इतना व्याकुल तथा दुःखी होने की आवश्यकता नहीं है। अभी तुम्हारे वर देकर मैं अपना भार दूर कर लूँगा। कहो (तुम्हारी क्या इच्छा है)।

सब कठोर वस्तुओ से भी अधिक कठोर उस क्रूर (कैकेयी) ने कहा—आपके दिये दो वरों में से एक से मेरे पुत्र को इस समस्त राज्य का अधिपति बनाइए और दूसरे से रामचन्द्र को (चौदह वर्षों के लिए) अरण्यवास के लिए भेजिए—यह कहकर वह (दृढ़) पड़ी रही।

अयोध्याकाण्ड १८६

सर्पिणी के समान क्रूर उस कैकेयी की जिह्वा से उत्पन्न अत्यन्त पीडाजनक विष ने ज्यो ही चक्रवर्त्ती को छुआ, त्यो ही वे काँप उठे। उनकी सारी देह जलकर शिथिल हो गई। सर्प-दष्ट होकर निश्शक्त हुए मत्तगज के समान वे पृथ्वी पर गिर पडे।

पृथ्वी पर लोटते हुए चक्रवर्त्ती की उस गंभीर पीडा का वर्णन करने का सामर्थ्य किसमे है ? उनकी पीडा के अधिकाधिक बढ़ जाने से उनका मन बहुत ही शोक-उद्विग्न हुआ। उन्होने लुहार की भट्ठी की भाथी के जैसे उष्ण निःश्वास भरे।

उनकी जिह्वा सूख गई। प्राण निकलने लगे। मन शिथिल हो गया। नयनो से रक्त वह चला। मन की चिन्ता बढ़ गई। उनके शरीर की पाँचो इन्द्रियाँ अपना व्यापार भूलकर अत्यन्त चंचल हो गईं।

प्राण-पीडा से विह्वल चक्रवर्त्ती उठकर पृथ्वी पर खडे होते, रो पड़ते, गिरते, श्वास-हीन हो चित्र के जैसे निष्क्रिय पड़े रहते, पाप-कर्मवाली कैकेयी के सम्मुख जाकर उसे पकड़कर धरती पर पटक देने का विचार करते।

दृढ़ वरछा दारुण छत मे घुसेड़ा जाय, तो उससे उत्पन्न पीडा से जिस प्रकार कोई मत्तगज तड़प उठता है, वैसी ही दशा को प्राप्त हुए चक्रवर्त्ती (कैकेयी को मारने का विचार करते, फिर) यह सोचकर कि स्त्री है, (उसे मारने पर) अपयश होगा, इस विचार से लज्जित होते। वे मन की वेदना से आहे भरकर तड़प उठते। फिर, इस प्रकार शिथिल हो पडे रहते, जैसे उनकी आँखे छिन गई हो।

आलान-स्तंभ मे बँधे हुए मत्तगज के समान चक्रवर्त्ती को शोक-पीड़ित होकर रोते, कलपते देखकर देवता भी भय से काँप उठे। वह समय ऐसा लगता था, जैसे प्रलय-काल आ गया हो। किन्तु, बाण-समान नयनोवाली कैकेयी का मन यथापूर्व (कठोर ही बना) रहा।

'पति की व्यथा को देखकर भी वह (कैकेयी) कातर नही हुई। उसका मन पिघला नही, वह लज्जित भी नही हुई।'-ऐसा कहने में (कहनेवाले को ही) लज्जा होती है। महान् लोग प्राचीन काल से ही यह सोचकर कि छल-कपट ही नारी का वेष लिये रहते हैं, नारियो को कभी अपना अवलंब नही मानते।

इस दशा मे खड़ी हुई कैकेयी की ओर देखकर तैलसिक्त तीक्ष्ण धारवाला वरछा धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती ने कहा-क्या तुम भ्रम मे पड़ी हो ? या किसी वंचक ने तुम्हे दुर्बुद्धि सिखाई है ? तुम्हे मेरी सौगंध है, क्या हुआ ? कहो।

यह सुनकर कैकेयी ने कहा-रासवाले घोडे पर सवार होनेवाले (हे चक्रवर्त्ती)! मै भ्रम मे नहीं हूँ, किसी कपटी ने मुझे कुछ सिखलाया भी नहीं है। यदि आप पूर्व में दिये हुए अपने वरो को अब देगे, तो लूँगी। यदि नही देंगे, तो मै अपने प्राण त्याग दूँगी, जिससे आपको स्थायी अपयश उत्पन्न होगा।

अपने पुत्र (राम) के अतिरिक्त जिनके अन्य कोई प्राण नही हैं, वैसे चक्रवर्त्ती कैकेयी के यह कठोर वचन कहने के पूर्व ही इस प्रकार व्याकुल हुए, जैसे जले हुए घाव मे वरछा घुसेड़ दिया गया हो। स्तब्ध खडे रहे। फिर, मूर्च्छित हो गिर पड़े।

१६० कंब रामायण

विशाल स्वर्ग, पाताल तथा धरती को जीतनेवाले करवालधारी चक्रवर्त्ती, कभी, ( अहो, क्रूर नारी !) कहकर आह भरते; 'हाय ! धर्म कितना कठोर है !,' कहते ; 'मेरे शरीर का अंत हो जाय' कहकर उठते, फिर लड़खड़ाकर पृथ्वी पर गिर पड़ते।

वीरो के पराक्रम को कुंठित करनेवाले भाले को धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती उमड़ते हुए क्रोध से कहते—'मै अपने तीक्ष्ण करवाल से नारियो को निहत करके संसार को स्त्री-रहित कर दूँगा और मै भी पतित होकर नीच जनों मे गिना जाऊँगा।'

वे चक्रवर्त्ती, जिनका सत्य आचरण संसार-भर में प्रसिद्ध था, हाथ पर हाथ मारते, ओंठ चबाते, मन में यह सोचकर दुःखी होते कि सत्य-वचन भी हानिकारक है। जैसे घी में आग की गरमी लगी हो, वैसे ही उनका मन पिघल उठता।

सत्यवादी चक्रवर्त्ती ने सोचा—यदि सत्य की रक्षा न करूँ और इस (कैकेयी) को दंडित करूँ तो वह बुरा होगा। यदि इसके माँगे वर दूँ, तो भी बुरा होगा। फिर, यह विचार करके उठे कि अपने हठ पर दृढ रहनेवाली इससे याचना करना ही अच्छा है।

आलान-स्तम्ब को भी तोड़ देनेवाले मद से भरे गज-जैसे राजा लोग अहमहमिका से आकर जिन (दशरथ) के चरणों को प्रणाम करते थे, वे (दशरथ), यह सोचकर कि जिस प्रकार अपराधों को दूर करने के लिए वेत्र-दंड को धारण करना उचित होता है, उसी प्रकार भावी हित को सोचकर क्षमा धारण करना भी उचित है—उस (कैकेयी) के चरणों पर गिर पडे।

फिर, उन्होने कैकेयी से कहा—तुम्हारा बेटा (भरत) यह राज्य (देने पर भी) नही लेगा। यदि वह स्वीकार भी करे, तो भी संसार के लोग वह कार्य पसन्द नही करेंगे। अतः, तुम्हें संसार में शाश्वत रहनेवाला यश नही प्राप्त होगा। अपयश पाने से तुमको क्या लाभ होगा ?

(भरत का राजा होना और राम का अरण्य-वास करना) देवता लोग भी स्वीकार नही करेंगे। संसार के लोग भी (राम को छोड़कर) जीवित रहना नही चाहेंगे। तब पातालवासियो के बारे मे क्या कहा जाय ? तुम किनको रखकर यह राज्य करोगी ? राम मेरे कहने से ही (राज्य लेने को) सहमत हुआ है। वह स्वयं ही तुम्हारे पुत्र को पृथ्वी दे देगा—इस प्रकार चक्रवर्त्ती ने कहा।

हे नारी ! उदार केकयराज की पुत्री। यदि तुम मेरी आँखें माँगो, तो देने को प्रस्तुत हूँ। मेरे प्राणो को चाहो, तो ये प्राण अभी तुम्हारे अधीन ही हैं। अगर तुम चाहती हो, तो पृथ्वी (का राज्य भी) ले लो। किंतु दूसरे वर की बात (अर्थात्, राम का वन-गमन) भूल जाओ।

मैने वचन दे दिया कि वर दिये हैं। मैं स्वयं उस वचन को नही बदलूँगा। तुम मुझे पीडा देनेवाली बात मत कहो। अग्नि के जैसी जलनेवाली आँखों से युक्त भूत भी, अगर कोई उससे कुछ याचना करे, तो माता के समान (दयावान्) होकर दे देता है। यदि तुम मुझे यह दे दो (अर्थात्, राम के वन-गमन की इच्छा न करो) तो क्या कुछ अनुचित होगा ?

अयोध्याकाण्ड १६१

विजयी चक्रवर्त्ती ने इस प्रकार के वचन कहकर (कैकेयी से) याचना की। फिर भी अपना उपमान न रखनेवाली अति कठोर कैकेयी का मन नहीं बदला। उसने कहा—हे चक्रवर्त्ती ! आपने पहले ये वर मुझे दे दिये। अब उन्हें पूरा न करके क्रोध करें तो मैं क्या करूँ ? अब संसार में सत्यवादी कौन रह जायगा ?

वे सत्यवादी चक्रवर्त्ती, जिन्होंने कभी असत्य वचन सुना भी नहीं, (कैकेयी की) वह बात सुनकर अत्यंत शिथिलमन हुए। किंतु, बड़ी सहन-शक्ति के साथ यह सोचते हुए कि यह स्त्री विष और अग्नि का रूप है, लज्जित होकर मूर्च्छित-से पड़े रहे। पुनः याचना के स्वर में कहने लगे—

तुम्हारा पुत्र (भरत) राज करेगा। तुम सुख से शासन करती रहो। सारी पृथ्वी तुम्हारे अधिकार में होगी। मैंने दे दिया। मैं अपने वचन वापस नहीं लूँगा। किंतु, मेरे पुत्र, मेरे नेत्र, मेरे प्राण, सब प्राणियों के लिए पुत्र के समान (हितकारी) मेरे राम को इस देश को छोड़कर (अरण्य में) जाने न दो। मेरी इस याचना को तुम स्वीकार करो।

मैं यह देखकर कि सत्य ही मेरी जड़ खोद रहा है, अत्यंत दुःखी हो रहा हूँ। मेरी जीभ सूख रही है। ऐसी दशा में यदि कमलपाणि राम मेरे सम्मुख से हट जायगा, तो मेरे प्राण नहीं बचेंगे। अतः, हे नारि ! मेरे प्राण तुम्हारी शरण में हैं।

इस प्रकार विनती करनेवाले चक्रवर्ती के मधुर वचनों को नहीं माननेवाली कैकेयी का क्रोध कुछ भी कम नहीं हुआ। उसका हृदय काठ के जैसा था। उसे लज्जा नहीं हुई। उसने अपने अपयश की परवाह नहीं की, और कहा—हे अनेक बाणों को रखनेवाले ! आपका यह कथन कि आपके पूर्व दिये वर को मैं स्वीकार न करके छोड़ दूँ, अधर्म ही तो है ? आप ही कहिए।

उस क्रूर नारी ने जब यों कहा, तब वे उत्तम कुल के क्षत्रिय (दशरथ), यह कहकर कि यदि मेरा ज्येष्ठ पुत्र किरीट धारण न करके कठोर कंकड़ों से भरे अरण्य में जायगा, तो उसके वियोग में निश्चय ही मेरे प्राण भी मुझ से वियुक्त हो जायेंगे—वज्राहत पर्वत के समान धरती पर गिर पड़े।

चक्रवर्त्ती पृथ्वी पर गिरे। गिरकर दारुण दुःख के समुद्र में डूबे। डूबकर (उन्होंने) उस समुद्र का कोई किनारा नहीं पाया। कोई किनारा न पाकर, क्रूर वचनवाली, अपनी वाणी से हृदय को तोड़नेवाली कैकेयी के क्षुद्र स्वभाव को देखकर अत्यंत शोक से (पृथ्वी पर) लोट गये।

'कांतिमय कंकण-धारिणी नारियों ने अपने प्राण-पतियों के मरने के पूर्व ही अपने प्राण त्याग दिये'—ऐसे यश की भागिनी बनने का अबतक प्रयत्न करती रही। किंतु, उनमें से किसी ने अपने पति की हत्या नहीं की थी। हे क्रूर स्वभाववाली ! क्या तुम अब अपने पति की हत्या करना चाहती हो ?

तुमने अपराध होने की चिन्ता नहीं की। सत्कुल-जात स्त्रियों के धर्म का विचार नहीं किया। (मेरे प्रति दया रखकर) मुँह से आह तक नहीं निकालती। तुम्हारे हृदय में करुणा नहीं है। अपने वचन-बाण से तुमने मेरे प्राण पी लिये। अब तुम पाप की चिन्ता किये बिना संसार के निवासियों के प्राण हरण करनेवाली हो।'

१६२ | कंब रामायण

वे ही स्त्रियाँ उत्तम होती हैं, जिनमें लज्जा, सरलता, संकोच आदि महत्त्व को बढ़ानेवाले गुण रहते हैं। किंतु, यश के कारणभूत इन गुणों को न रखनेवाली नारियों की गिनती स्त्री-जाति में नहीं होती। वे पुरुष-जाति में ही गिनी जाती हैं। रूप के कारण ही उनकी गणना स्त्रियों में होती है।

मैंने पृथ्वी पर राज्य करनेवाले, बल तथा विवेक में उत्तम बड़े राजाओं को जीता, देवलोक के निवासियों को भी पराजित किया। किन्तु, ऐसा होकर भी मैं अपने घर में रहने-वाली एक स्त्री से परास्त हो गया। इससे मेरी कैसी हानि हुई, क्या मेरी ऐसी दशा होनी चाहिए।

वे चक्रवर्ती, जिनके कंधे ऐसे थे, जैसे एक स्वर्णमय पर्वत दूसरे (स्वर्णमय) पर्वत से आ मिला हो, इस प्रकार अनेक विधि से विचार करते, विविध वचन कहकर आह भरते, दुःख के समुद्र में डूबते, एक से असमान दूसरी पीड़ा को पाते (परस्पर असमान अनेक-विध पीड़ाएँ पाते), मूर्च्छित होकर यों गिरते कि यह संशय उत्पन्न होता कि इनके प्राण हैं या निकल गये। वे यों भग्नहृदय हो रहे।

पहियोंवाले स्वर्णमय रथयुक्त चक्रवर्ती इस प्रकार शिथिल हो पड़े रहे। धरती पर यों लोटते रहे कि उनके सुन्दर कंधों पर धूल लग गई। ऐसे समय में करुणाहीन उस कैकेयी ने कहा—हे सुन्दर विजयमालाधारी राजन् ! यदि मैं अपने वर यथाविध नहीं प्राप्त करूँगी, तो अपने प्राण त्याग दूँगी।

जलकर भी तृप्त न होने तथा चारों ओर फैलकर प्राणों को जलानेवाली अग्नि के समान स्थित उस कैकेयी ने कहा—हे दृढ़ धनुषधारी ! पूर्वकाल में एक राजा^१ ने सत्य की रक्षा के लिए अपना ही मांस काटकर दिया था। उसके वंश में उत्पन्न होकर आप यदि वर देकर भी उनको पूर्ण करने के लिए दुःखी हों, तो इससे बढ़कर और क्या होगा ?

तब बलवान् चक्रवर्ती ने यह सोचकर कि कहीं यह पापिन अपने प्राण-त्याग न कर दे, कहा—मैंने वर दे दिये, दे दिये। मेरा बेटा अरण्य में शासन करेगा और मैं मरकर स्वर्ग में राज्य करूँगा। तुम चिरकाल तक अपने पुत्र के सहित अपयश-रूपी समुद्र का पार न पाकर उसीमें डूबती रहोगी, डूबती रहोगी।

अपना यह वचन पूरा करने के पूर्व ही, वे काटनेवाले तीक्ष्ण करवाल जैसी पीड़ा के अपने मन में प्रविष्ट हो जाने से अत्यन्त व्याकुल हुए। सँभल न सके और निष्क्रिय पड़े रहे। कैकेयी अपनी इच्छा पूर्ण होने से संतुष्ट होती हुई निद्रालीन हो गई।

रात्रि-रूपी स्त्री यह देखकर कि चंद्रकला के सदृश मनोहर मंदहासवाली यह सुन्दरी (कैकेयी) चिरकाल से अपने पति के साथ एकप्राण-सी रही, अब अपने पति को अत्यन्त दारुण दुःख में डूबते हुए देखकर भी किंचिन्मात्र दुःखी न होकर सो रही है, वह (रात्रि-रूपी स्त्री) मानों पुरुषों के सम्मुख खड़ी रहने को स्वयं लज्जित होती हुई, वहाँ से हट चली।


१. इसमें उल्लिखित राजा 'शिवि' है, जिसने बाज से एक कबूतर को बचाकर उस कबूतर के बदले अपने शरीर का मांस काटकर बाज को दिया था।

अयोध्याकाण्ड १६३

रात्रि के अन्तिम याम में कुक्कुट बोलने लगे। वे ऐसे लगते थे कि भ्रमरों से गुंजरित पुष्पमालाओं को धारण करनेवाले चक्रवर्ती ने कैकेयी के कारण दुःखी होकर जो वचन कहे थे, उनको सुनकर मानो वे (कुक्कुट) अत्यन्त व्याकुल हो रहे हों और अपने पंख-रूपी हाथों से छाती पीटते हुए रुदन कर रहे हों।

जलाशयों तथा वृक्षों पर अपने मृदुल पंखों को फड़फड़ाकर कूदनेवाले और आकाश में उड़नेवाले पक्षी, सूक्ष्म कटिवाली सुन्दरियों के नूपुरों के समान ध्वनि करने लगे, मानो वे केकय-राजा की पुत्री होकर उत्पन्न उस विष (-समान कैकेयी) को कोस रहे हों; जिसने क्षुद्रता के साथ दारुण उत्पात उत्पन्न किया था।

हाथी, जो अबतक (हथियारों में) मधुर निद्रा ले रहे थे, अब मानों यह सोचकर कि प्रसिद्ध नामवाले प्रभु सुन्दर मेखलाधारी अपनी पत्नी-सहित अरण्य को जायेंगे, अपने मन में काँप उठे और यह कहते हुए कि हम भी इस पृथ्वी को छोड़ देंगे, झट उठकर चल दिये।

विकसित कमल जैसे अरुण नेत्रोंवाले राम के गज-शुंड जैसे हाथ में मंगल-सूत्र बाँधने के पूर्व जो शामियाना शीतल किरणोंवाले मोतियों से अलंकृत करके तथा सारी पृथ्वी को आवृत्त करके डाला गया था, वह अब खोला जा रहा हो—यों आकाश में चमकनेवाले नक्षत्र अदृश्य होने लगे।

नगाड़े यह सूचना देते हुए बज उठे कि भयंकर कोदंडधारी राम को प्रणाम करने का शुभ समय आ पहुँचा और रात्रिकाल, जब मन्मथ अपने इक्षु-धनुष का पराक्रम दिखाता था, व्यतीत हो गया, (नगाड़ों की) वह ध्वनि पर्वतों के शिखरों पर के मेघ-गर्जन के समान थी। उस ध्वनि को सुनकर (अयोध्या की) नारियाँ मयूरों के झुण्डों के समान विकसित वदनों के साथ निद्रा छोड़कर उठने लगीं।

विविध पुष्प-समुदाय खिल गये। उनकी सुगन्धि को लेकर मद-मारुत बह चला। कुछ युवतियाँ उस (मंदानिल) के स्पर्श से व्याकुल हुईं और उनके वस्त्र तथा मेखलाभाग ढीले हो खिसक गये। कुछ स्त्रियाँ, जो स्वप्नों में अपने-अपने प्रियतमों का गाढ़ा आलिंगन करके दुःखमुक्त हो उठी थीं, उन ऐन्द्रजालिक स्वप्नों में बाधा पड़ने से स्तब्ध रह गईं।

कुमुदपुष्प इस प्रकार संकुलित हो गये, जैसे उत्तम गुणवाली स्त्रियों ने, चिरकाल तक रहनेवाले अपयश को उत्पन्न करके अपनी अपूर्व कीर्त्ति को मिटानेवाली कठोरहृदया कैकेयी के पापकर्म को देखकर और उससे स्त्री जाति के गौरव के मिटने से दुःखी होकर, अपना मुँह बंद कर लिया हो।

जो स्त्रियाँ अत्यन्त अनुराग में भरी थीं, प्रज्ज्वलित अग्नि से भी अधिक तीव्र कामना से पूर्ण थी तथा मन्मथ के तीक्ष्ण शरों, नभ की चन्द्रिका एवं दीर्घ मदमारुत के उनके शरीर को काटने से जो अत्यन्त व्याकुल थीं, उन विरहिणी युवतियों के कानों को मधुर राग-पूर्ण गान ऐसे लगे, जैसे फनवाले सर्प (उन कानों में) प्रविष्ट हो रहे हों।

मेघ के समान (दानशील) भुजावाले पुरुष, अपनी शय्याओं से यह विचार करते हुए उठे कि चक्रधारी (राम) के राजतिलक के शुभ दिन के पूर्व की यह रात्रि एक युग से

१६४ | कंब रामायण

भी बड़ी लगती है तथा आज का समय ऐसा है, जब कमलनिवासिनी (लक्ष्मी), सप्त लोकों के निवासी एवं हमलोगो के पुण्यवान् नयन तथा हृदय जीवन का लाभ प्राप्त करेंगे।

जो रमणियाँ, तैल-सिक्त उज्ज्वल तथा तीक्ष्ण बरछे-जैसे अपने नयनों को बद करके मन मे राम के राजतिलक का ही ध्यान लिये, झूठी निद्रा ले रही थी, वे (स्त्रियाँ) आश्चर्य-जनक शरीर-काति से युक्त राम की सुन्दरता को देखने की अधिकाधिक बढ़नेवाली इच्छा से, पुष्पो की सेज को ऐसे छोड़कर उठ गईं कि (उन पुष्पो का रस लेनेवाले) भ्रमर गुंजार भरते हुए उड़ चले।

मनोहर पुष्प-मालाधारिणी जो सुन्दरियाँ मन की दृढता के साथ (अपने पतियो से) मान किये बैठी थी, वे अब प्रभात-वाद्यों को बजते हुए सुनकर घबरा उठी और अपने दुःख व्याकुल पतियो को प्राण-दान-सी करती हुई स्वर्णाभरणो के दबते हुए, लता-तुल्य कटि के भय-विक्षिपित होते हुए तथा दलयुक्त पुष्पमाला के अंकित होते हुए समागम का सुख न प्राप्त कर सकी।

सर्वत्र मयूर-पंख चमक उठे। भ्रमर शब्दायमान हो उठे। पुष्प-मालाएँ चमक उठी। भेरियाँ शब्दायमान हो उठी। स्थान-स्थान पर स्थित मुक्ता-पक्तियाँ चमकती हुई शब्दायमान हो उठी। आभरण शब्दायमान हो उठे। पक्षी शब्दायमान हो उठे। वीणा-वाद्य शब्दायमान हो उठे। मन से भी अधिक वेग से दौड़नेवाले अश्व, मेघो के समान शब्दायमान हो उठे।$^१$

दीपक उसी प्रकार मन्द पड़ गये, जिस प्रकार चतुर्दश भुवनो को अपने प्राणो-सहित दान देनेवाले, वीरो के वीर, अपने ज्येष्ठ पुत्र पर अधिक प्रेम रखने के कारण अत्यन्त विह्वल तथा पञ्चेंद्रियो के निष्क्रिय हो जाने से कंपित हो पड़े हुए चक्रवर्त्ती (दशरथ) की दिव्य-देह की काति मद पड़ गई थी।

अनेक वेणुवाद्य शब्द कर उठे। स्वस्ति-वाचन सुनाई पड़ने लगे। संगीत-ध्वनि गगन-भर मे व्याप्त हो गई। अनेक प्रकार के वाद्य बज उठे। (सुन्दरियों के) नूपुरों के साथ शख भी शब्द कर उठे तथा शृंगीवाद्य साम-गान कर उठे।

सूर्य, धूप के समान बढ़े हुए अन्धकार-रूपी शत्रु को भगाता हुआ और प्रासादो के भीतर के दीपो की काति को मन्द करता हुआ उदय पर्वत पर उदित हुआ। वह लाल होकर दिखाई पड़ रहा था, मानो पापिन कैकेयी के वैर से अपने कुल के श्रेष्ठ पुत्र चक्रवर्ती के प्राणो को व्याकुल होते देखकर वह (सूर्य) अत्यन्त क्रुद्ध हो गया हों।

पंकज-समूह इस प्रकार सत्वर प्रफुल्ल हो उठे, जैसे वे उन रमणियो के बदन हों, जो (रमणियाँ) उन रामचन्द्र के मुकुट-धारण की शोभा को देखने की इच्छा से भरी थी, जो (रामचन्द्र) त्रिमूर्त्ति बननेवाले त्रिदेवो के भी आदि कारण थे। स्वयं सारी सृष्टि बनकर रहते थे तथा इन्द्रादि देवो के प्रभु शिव के धनुष को तोड़नेवाले महावीर थे।

ऐसे समय, उस विशाल अयोध्या की प्रजा, इस विचार से कि आज चक्रवर्त्ती के कुमार सिंहासनास्रढ होगे, बड़े हर्ष के साथ ऐसे कोलाहल कर उठी, जैसे सातो समुद्र एक


१. मूल में चमकना और शब्दायमान होना इन दोनो अर्थों को देनेवाली एक ही क्रिया 'ओलित्तन' का बार-बार प्रयोग हुआ है, जिससे शब्दगत सुन्दरता बढ़ गई है। —अनु०

अयोध्याकाण्ड १६५

साथ गरज उठे हों। उस दृश्य का वर्णन करने का विचार तक करना मुझ जैसे लोगों के लिए असम्भव है, फिर भी किंचिन्मात्र हम उसका वर्णन करेंगे।

कुंजर-जैसे वीर युवकों के मन को मुग्ध करनेवाली युवतियाँ (अपने शरीर में) महावर लगाती, दूध-जैसे उज्ज्वल शंख-वलयों को चुन-चुनकर पहनती, करवाल तथा बाण-समान तीक्ष्ण नयनों में काजल लगाती, जैसे उनमें विष ही रख रही हों तथा नव पुष्पों को धारण करतीं।

वहाँ के युवक, जो अत्यन्त आनन्द से अश्रु बहानेवाले कमल-सदृश नयनोंवाले थे, दोष-हीन वदनवाले थे, जिनकी पुष्ट भुजाओं पर मीन समान तथा मद्य-पान से उत्पन्न वर्ण जैसे लाल रंग से भरे नयनोंवाली सुन्दरीयों के स्तनों पर के चंदन-लेप का चिह्न अभी नहीं मिटा था, रामचन्द्र के मुकुट-धारण की बात सोचकर उन (राम) के भाइयों के जैसे ही (अत्यन्त आनन्दित) हो उठे।

उस नगर में रहनेवाले सद्गुणों के आगार सब पुरुष दशरथ के जैसे थे। ब्राह्मण सब वसिष्ठ के जैसे थे। सच्चरित्र स्त्रियाँ कौशल्या की जैसी थीं तथा अन्य युवतियाँ सीता के समान थीं और वह (सीता) देवी लक्ष्मी के समान थीं।

सीता के पति के मुकुट-धारणोत्सव को देखने की उमड़ती हुई इच्छा से प्रेरित होकर राजाओं का समूह अमृत का पान करने के लिए आये हुए देवों के जैसे आकर वहाँ एकत्र हुआ, जिससे शब्दायमान समुद्र से आवृत्त पृथ्वी का सारा प्रदेश खाली हो गया।

उस सुन्दर नगर में सर्वत्र, शर्करा के-से माधुर्य एवं प्रवाल के जैसे रक्त अधरोंवाली, पीन स्तनोंवाली तथा विशाल जघन-तटवाली सुन्दरियों के झुण्ड थे और उनके साथ पुरुषों के झुण्ड भी थे। सब एक दूसरे को ढकेलते हुए कह रहे थे कि चलो-चलो, किन्तु आगे जाने के लिए स्थान न होने से वे अपने-अपने स्थानों पर ही स्थिर खड़े रहने के अतिरिक्त न तो आगे बढ़ सकते थे, न उस विचार को (अर्थात्, आगे बढ़ने के विचार को) छोड़ ही सकते थे।

उस जन-समुदाय को देखकर कुछ कहते थे कि राजा लोग ही अधिक हैं, कुछ कहते थे कि सैनिक वीर ही अधिक हैं, कुछ कहते थे कि पुरुष अधिक हैं, कुछ कहते थे कि स्त्रियाँ अधिक हैं, कुछ कहते थे कि आगत प्रजा ही अधिक है, कुछ कहते थे कि अभी आनेवाली प्रजा अधिक है, जो जैसा समझता था, वह वही कहता था। किन्तु, कोई भी सम्पूर्ण रूप से (उस भीड़ को) नहीं देख पाता था।

नीलोत्पल का लावण्य और भाले की क्रूरता, दोनों को एक साथ मिलाकर तथा उस पर मृदुल अंजन नामक विष को लगाकर जैसे धवल चन्द्रमा पर रखा गया हो वैसे विशाल नयनों से युक्त सुन्दर तथा लचकती हुई सूक्ष्म कटिवाली युवतियाँ नाचनेवाले मयूरों के झुण्ड के समान एकत्र हो आईं।

सुगन्धित तुलसी-माला से भूषित (राम) के भू-देवी के साथ शुभ विवाह को (अर्थात् राज-तिलक को) देखने के लिए जो नहीं आये, वे थे लंका के निवासी राक्षस, सप्त द्वीपों के कुल पर्वत तथा अष्ट दिशाओं में स्थित मदस्रावी गज।

१६६ कम्ब रामायण

विशाल राज्यों के शासक इन्द्र की समता करनेवाले नरेश ऐसे मुक्तामय धवल छत्रों को लिये हुए जैसे करोड़ों चन्द्र आकाश में भर गये हों तथा ऐसे श्वेत चामरों को लिये हुए जैसे अन्तरिक्ष में अनेक हंस उड़ रहे हों, अभिषेक के मण्डप में आ पहुँचे ।

तपस्या के द्वारा पुण्य-फलों को प्राप्त करनेवाले उत्तम वेदज्ञ ब्राह्मण ऐसे आनन्द के साथ कि अपने पुत्र के विवाह को ही देखनेवाले हों, राज्य-लक्ष्मी के साथ रामचन्द्र का विवाह देखने के लिए आ पहुँचे ।

देवता गगन-तल को भरने लगे समुद्र-रूपी वस्त्र से युक्त भूमि पर रहनेवाले लोग सब दिशाओं को भरने लगे, मंगल-सूचक शंखों की ध्वनि तथा विशाल भेरियों की ध्वनि श्रोताओं के कानों में भरने लगी अपरिमेय स्वर्ण के साथ ( दान करते हुए ) बहाई हुई जल की धारा, वीचियों से पूर्ण सातों समुद्रों को भरने लगी ।

दीप की कांति को मन्द करनेवाली देह की कांति से युक्त राजाओं के विद्युत्-जैसे चमकनेवाले असंख्य किरीटों की रह-रहकर चमकनेवाली जगमगाहट, गगनगामी सूर्य को भी आवृत्त कर फैल गई , समुद्र से उत्पन्न मुक्ता जैसे दाँतोंवाली मदहास-युक्त युवतियों के आभरणों की कांति, स्वर्ण को भी आवृत्त करके देवताओं की आँखों को भी चौंधियाने लगी ।

उस समय, प्रभु ( राम ) के राज्याभिषेक के लिए आवश्यक समस्त सामग्री को लेकर वेदज्ञ ब्राह्मण चारों वेदों का वाचन करते हुए आये । उस पुरातन नगर के द्वार पर एकत्र हुई भीड़ उनके लिए मार्ग छोड़कर हट गई , इस प्रकार ( ब्राह्मणों को अपने साथ लेकर ) महान् तपस्वी वसिष्ठ आ पहुँचे ।

वसिष्ठ मुनि ने गंगा से कन्याकुमारी-पर्यन्त सब तीर्थों के पवित्र जल तथा चारों दिशाओं के जल को मँगवाया । होम के लिए आवश्यक वस्तुओं का प्रबन्ध किया और वीर सिंहासन भी प्रस्तुत करके रखा तथा सब आचार सम्पन्न किये ।

ज्योतिषज्ञों ने कहा कि मुहूर्त निकट आ गया है । कर्म-बन्धन को तोड़नेवाले तप का आचरण करनेवाले महर्षि (वसिष्ठ) ने सुमन्त्र को आदेश दिया कि शीघ्र जाकर रत्न किरीट-धारी चक्रवर्ती को ले आयो । वह आज्ञा शिरोधार्य करके सुमन्त्र बड़े प्रेम के साथ गया ।

गगनोन्नत राज-प्रासाद में चक्रवर्ती को न पाकर सुमन्त्र ने वहाँ के परिजनों से पूछा । उन लोगों से यह जानकर कि चक्रवर्ती कैकेयी के साथ हैं, वहाँ पहुँचकर सुमन्त्र ने दासियों के द्वारा अपने आगमन का समाचार भीतर भेजा । तब स्त्रियों में यमतुल्य कैकेयी ने सुमन्त्र को यह आज्ञा दी कि वह जाकर राम को यहाँ ले आये ।

कैकेयी का आदेश पाकर सुमन्त्र बड़ी उमंग के साथ स्वर्णमय सौधों से युक्त वीथियों को शीघ्र पार कर गया और अपने मन में अपना ही ध्यान करते रहनेवाले ( अर्थात्, नारायण के अवतारभूत तथा भगवान् के ध्यान में निरत रहनेवाले ) पर्वत तुल्य कंधोंवाले राम को नमस्कार करके मुँह पर हाथ रखकर^१ यों निवेदन किया ।


^१ बड़े लोगों के साथ बात करते समय मुँह के सामने हाथ रखकर बोलना विनम्रता का चिह्न होता है ।—अनु०

अयोध्याकाण्ड १६७

राजा, ऋषि तथा भूतल के लोग तुम्हारे पिता के समान ही बड़े प्रेम के साथ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। तुम्हारी छोटी माता (कैकेयी) ने आदेश दिया है कि मैं तुमको वहाँ ले आऊँ । अतः, स्वर्णमय उन्नत मुकुट को धारण करने के लिए शीघ्र चलो।

प्रभु (राम) वह वचन सुनकर, सहस्र शिरोंवाले (नारायण) को नमस्कार करके समुद्र-जैसे राज-समुदाय से घिरे हुए, पुष्पांलंकृत रथ पर सवार होकर चले। उस समय देवता लोग दिव्य संगीत का गान करते हुए आनन्द से उन्हें आशीर्वाद दे रहे थे एव सुन्दरियाँ बड़े कोलाहल के साथ उन्हें देख रही थीं।

'वीर (राम), मनोहर रत्न-मुकुट धारण करने के लिए जा रहे हैं,' इस उमंग से प्रेरित होकर वे सुन्दरियाँ एक से एक आगे बढ़कर मार्ग के दोनों पाश्र्वों में बड़ा कोलाहल करती हुई आ खड़ी हुईं। वे इस प्रकार हो गईं, मानो उन सबका एक ही प्राण हो और वह प्राण बाहर होकर एक अनुपम रथ पर आरूढ होकर जा रहा हो।

वे उदार (रामचन्द्र) कठोर वचनवाली (कैकेयी) की आज्ञा से उज्ज्वल किरीट को छोड़कर, पवित्र पृथ्वी-रूपी पत्नी से वियुक्त होकर, अरण्य के लिए प्रयाण करने के पूर्व ही, संगीत की मधुर कंठध्वनि करनेवाली उन रमणियों की भुजा-रूपी बाँसो तथा नेत्र-रूपी वरछो के घने अरण्य में प्रविष्ट हो गये।

वे स्त्रियाँ, सुगन्ध-चूर्ण, पुष्प, चन्दन, स्वर्ण आदि बिखेरने के लिए वहाँ आकर अपनी सुन्दर मेखलाओ को, कँगनो को तथा लज्जा को बिखेर रही थी। वे मन्मथ के वाणो से आहत होकर, क्षतो से पूर्ण अपने परस्पर मटे हुए मृदु स्तनो को, काम-पीडा के कारण नयनो से बरसनेवाले अच्छे अश्रुजल से धो रही थी।

'यह सुन्दर नयनोवाला (राम) क्या पृथ्वी की रक्षा करने के योग्य है ? हम, अबलाओ के प्रति किंचित् भी प्रेम से यह हीन है', याँ सोचकर वे व्याकुलता से काँप उठती और यह कहती कि अरुण नयनो तथा श्यामल देह से युक्त यह राम सब स्थानो में दिखाई दे रहा है, किन्तु न जाने कितने राम हैं।

स्त्रियाँ इस प्रकार (प्रेममग्न) होकर, झुण्ड बाँधकर कोलाहल करती हुई आईं। मुनियो तथा उस प्राचीन नगर के वृद्धो एवं बालको ने राम के रूप को देखा, किन्तु (उनके प्रति) अपने प्रेम की सीमा को नही देखा। अब हम उनके मन के भावों एव उनके वचनों का वर्णन करेंगे।

उन लोगों में से कोई कहता, यह समार तर गया। कोई कहता, युगात काल को यही से तुम देख लो (अर्थात्, वे राम को यह आशीर्वाद देते हैं कि युगात काल तक तुम जीवित रहो), कोई कहता, हमारी आयु भी तुम ले लो, कोई कहता, पंचेन्द्रियो पर दमन करके हमने जो कठोर तपस्या की है, उसका फल तुम्हारा ही हो और कोई कहत, हे हरित तुलसी की माला धारण करनेवाले। तुमको समस्त पुण्यफल प्राप्त हो।

कोई कहत, इस (राम) के अत्यन्त करुणा से पूर्ण उज्ज्वल नयनों की समता करते हैं कमल और इसकी देह-छवि को प्राप्त किया है मेघो ने। न जाने, उन्होने कैसा पुण्य किया है। और, कुछ कहते, चक्रवर्ती दशरथ ने अपूर्व तपस्या करके इस महानुभाव को

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कंब रामायण

पुत्र के रूप मे प्राप्त करके इस ससार को दिया है, उनका हम क्या प्रत्युपकार कर सकते हैं ?

कोई कहते, इस महानुभाव की कृपा, गजेन्द्र की पुकार को सुनकर मकर के प्राणों का अन्त करनेवाले चक्रधारी नारायण की कृपा-जैसी है । कोई प्रभु के निकट आकर, उनके दर्शन कर, कुछ कारण के बिना ही अपने मनोहर नेत्रो से अश्रु बहाने लगते ।

कोई कहते—प्रभु की गंभीरता और बुद्धि महान् श्याम घन के समान है ; उनका जैसा शील और किसमे हो सकता है ? चिरकाल तक गणना करने योग्य सबसे बड़ी संख्याओ के भी परे जो रहता है, उस अनादि तथा अनंत, अविनाशी मूर्त्ति ( नारायण ) का यह अवतार है । यह देवो में अतर्गत नही है ।

कोई कहते—समुद्र खोदनेवालों की ( अर्थात् सगर-पुत्रो की ), धरती पर गगा नदी को लानेवालो की ( अर्थात् भगीरथ की ), देवो की सहायता करने के लिए असुरो के साथ युद्ध करके उन्हें परास्त करनेवालो की ( अर्थात् इक्ष्वाकु, ककुत्स्थ आदि दशरथ-पर्यंत अनेक सूर्यवंशी राजाओ की ) जो अति प्रवृद्ध कीर्त्ति स्थिर है, वह इस प्रभु ( राम ) की विजयमाला-भूषित भुजाओ की कीर्त्ति के कारण ही अमर बनी है ।

हे वीर राम ! लो, यह चदन है, ये उत्तम रत्न-हार हैं। यहाँ तिलक एव सर्व आभरणो से भूषित मत्तगजो की श्रेणियाँ हैं। ये अश्व-पक्तियाँ हैं। ये पीत-स्वर्ण की निधियाँ हैं, निर्धन लोगो को इनका दान दो—यो कहकर कोई उन वस्तुओ की पक्तियाँ लगाते थे।

विद्युत्-समान रथ पर सवार होकर जब रामचन्द्र आ रहे थे, ऐसे द्रवितचित्त हो खडे थे, जैसे कोई गाय अपने बछड़े को अकेले छलाँग मारकर आते हुए देखकर प्रेम से द्रवितमन होती है ।

कुछ सद्गुण-सम्पन्न यह कहते कि श्वेतच्छत्र की छाया किये, बड़ी सेना रखे, विविध शस्त्र धारण किये जो राजा भूमि का शासन करते हैं, उनका अब ( राम जैसे व्यक्ति के उत्पन्न होने के पश्चात् ) पुत्रो को जनना व्यर्थ है, और चित्र-लिखित मूर्त्ति-जैसे स्तब्ध खडे रहते ।

विद्युत्-से शोभायमान श्याम घन जैसे वक्ष पर यज्ञोपवीत से शोभायमान राम, क्या रथ पर शीघ्रता से मार्ग पार करता हुआ जायगा ? ( राम के ) रथ की गति को मंद करने के लिए अनेक स्वर्णराशियो और विविध रत्नो से मार्ग को भर दीजिए—यो कहते हुए कुछ लोग मार्ग पर ( स्वर्ण, रत्न आदि ) बिखेर रहे थे ।

कुछ लोग कहते—यह अपनी माता की गोद मे नही पला, किन्तु पूर्वजन्म के पुण्य से इसका पालन करनेवाली है कैकेयी, अतएव वह ( कैकेयी ) समस्त पृथ्वी का शासन इसे देकर आनदित हो रही है । ऐसा करनेवाली उम ( कैकेयी ) का आनन्द किस प्रकार का है ! हम क्या कहे ?

कुछ कहते—अब पाप और दुःख समूल मिट जायेंग। कुछ कहते—भूमडल पर अब एक व्यक्ति का स्वत्व नही रहा, वह सब लोगो का हो गया। कुछ कहते—यह देवताओ के शत्रु राक्षसो को मिटा देगा और कुछ कहते—इसकी आज्ञा का पालन करने-वाले राजाओं का भाग्य कितना महान् है !

अयोध्याकाण्ड १६६

जब नगरनिवासी इस दशा में थे, तब विजयी प्रभु (राम) अनुपम रथ पर आरूढ होकर, दीर्घ ध्वजाओं से शोभित प्रासादों की पंक्तियों से युक्त वीथियो को पार कर गये और महान् यश से भूषित चक्रवर्त्ती के प्रासाद में जा पहुँचे।

पुष्प-भूषित कुंतलोंवाली सुन्दरियो के द्वारा चामर डुलाये जाते हुए, नूतन हर्ष से उल्लसित मन से, राम वहाँ आये, किन्तु वहाँ अपने अगाध स्नेह को प्रकट करते हुए, उन्नत किरीट धारण किये हुए, सुन्दर कमल-पीठ पर आनन्द के साथ आसीन हुए दशरथ को नही देखा।

वे राम, जो वेदो तथा अन्य शास्त्रो के जाननेवालो के मन मे प्रकाशित (भगवान् के) रूप के साथ एकरूप थे, उस स्वर्णमय सभा-मंडप मे नही गये, जहाँ ऋषियो और नरेशो के संघ बडे आनन्द के साथ यथार्थ प्रशस्तियो का गान कर रहे थे, किन्तु अपनी छोटी माता (कैकेयी) के आवास मे गये।

राम को यों जाते हुए देखकर राजाओं तथा ऋषियो ने सोचा—राम ने उचित ही सोचा है। वह पहले अपने पिता के चरणों को नमस्कार करके, फिर सब दिशाओ में उज्ज्वल भासमान किरणोंवाले सूर्य से प्राप्त अत्युत्तम मुकुट को यथाविधि धारण करनेवाला है। यह बिलकुल ठीक ही है।

जब ऐसा हो रहा था, तब रामचन्द्र मन मे किंचित् शिथिल होकर फिर स्वस्थ हुए और पवित्र दशरथ के रहने के स्थान को ढूँढते हुए आ पहुँचे। यह देखकर, अनुपम क्रूरता से युक्त कैकेयो, यह सोचती हुई कि मेरा पति अपने मुँह से (वरदान की बात) नही कहेगा, अतः मै स्वय इससे कहूँगी—उसको (कैकेयी को) अपनी माता मानकर उसके निकट आये हुए राम के सम्मुख यम के समान वह प्रकट हुई।

गोधूलि-वेला में अपनी माँ को देखनेवाले वत्स के सदृश राम ने अपने सम्मुख आई हुई माता को, धरती पर सिर रख नमस्कार किया। सिंदूर तथा प्रवाल-समान सुगंधयुक्त अपने मुँह को एक अरुण कर से आवृत करके और दूसरे कर से अपने वस्त्रो को सँभाले हुए बड़ी विनम्रता के साथ खडे रहे।

इस प्रकार खड़े हुए राम को देखकर, लौह-हृदय से युक्त होकर, 'प्राणियो का संहार करनेवाला यम'—केवल इस नाम से रहित होकर, कठोर कृत्य करनेवाली उस (कैकेयी) ने कहा—हे तात! तुम्हारे पिता तुमसे एक बात कहना चाहते हैं। यदि उनके अभिप्राय को कहना मुझे उचित हो, तो मै उसे कहूँगी।

आज्ञा देनेवाले मेरे पिता हैं। कहनेवाली आप स्वयं हैं। यह संभव हो तो—(अर्थात्, यदि आप स्वयं उस बात को मुझसे कहें तो) मेरा उद्धार हुआ। मेरे सदृश जन्म लेनेवाला ओर कौन है ? मेरे भाग्य से ऐसा अच्छा फल मुझे मिला है, इससे बढ़कर और क्या अच्छा फल हो सकता है ? आप मेरे माता और पिता दोनो हैं। आपका वचन मेरे लिए शिरोधार्य है। (अतः) आप आज्ञा दें।

तब कैकेयी ने राम से कहा—चक्रवर्त्ती ने यह आज्ञा दी है कि समुद्र से आवृत्त पृथ्वी का शासन भरत करे और तुम जटाधारी होकर तपस्वी के वेष में घने अरण्य में जाकर

२००कंब रामायण

रहो। वहाँ पवित्र नदियों में स्नान करते हुए चौदह वर्ष व्यतीत करो और उसके पश्चात् लौट आओ।

किसी के लिए अवर्णनीय गुणोंवाले रामचन्द्र के सुन्दर मुख-मंडल की उस समय जो शोभा थी, उसका कथन करना हम जैसे लोगों के लिए सुलभ नहीं है। उस मुख-शोभा ने, जो सदा कमल की सुषमा की जैसी रहती थी, कैकेयी के यह वचन सुनकर सद्योविकसित अरुण कमल को भी परास्त कर दिया (अर्थात्, कमल की शोभा से भी अधिक राम के वदन की शोभा बढ़ गई।)

रामचन्द्र पहले विशुद्ध ज्ञानवाले चक्रवर्ती की आज्ञा का उल्लंघन होने से डरकर ही इस अंधकारमय संसार के राज्य के दुःख को स्वीकार करने के लिए सन्नद्ध हुए थे। अब वे उस भार से मुक्त होकर ऐसे लगे, जैसे कोई वृषभ, जो चक्रवाले शकट में स्वामी के द्वारा जोता गया हो, पर किसी करुणामय व्यक्ति के द्वारा बंधन से छुड़ा दिया गया हो।

यदि यह चक्रवर्ती की आज्ञा न भी हो, फिर भी क्या आपकी आज्ञा मेरे लिए पालनीय नहीं है ? मेरे भाई ने ऐश्वर्य पाया, तो मैंने भी तो उसे पा लिया। अतः, इससे बढ़कर मेरा हित और क्या हो सकता है ? इस आज्ञा को मैंने शिरोधार्य किया। मैं अभी बिजली की जैसी धूप से युक्त अरण्य में जाऊँगा। आपसे विदा भी ले रहा हूँ। (१-११०)

अध्याय ४

नगर-निष्क्रमण पटल

पर्वत से भी ऊँचे कंधोंवाले राम ने ऐसे वचन कहकर कैकेयी के चरणों को पुनः नमस्कार किया। पिता दशरथ जिस स्थान में रहते थे, उस दिशा की ओर मुख करके नमस्कार किया और स्वर्ण-कमल पर आसीन लक्ष्मी तथा भू-देवी के रोते हुए, वे कौशल्या के आवास में पहुँचे।

कौशल्या देवी जब यह सोचती हुई बैठी थीं कि मेघों के आवासभूत पर्वत-जैसा मेरा राम, किरीट धारण करके आयेगा, तब राम ढुलनेवाले चामर और श्वेतच्छत्र के बिना ही, विधि के अपने आगे-आगे जाते हुए और धर्मदेव के अपने पीछे-पीछे आते हुए, अकेले ही, कौशल्या के सम्मुख जा पहुँचे।

'इसने किरीट नहीं पहना है, इसके केश तीर्थों के पवित्र जल से भींगे नहीं हैं, इसका कारण क्या हो सकता है ?'—इस प्रकार आशंकित होनेवाली उस (कौशल्या) के चरणों को स्वर्णमय वीर-वलयधारी राम ने प्रणाम किया। उस देवी ने चिंतित मन के साथ उन्हें आशीर्वाद देकर पूछा—'सोंचा हुआ काय क्या हुआ ? क्या राजतिलक में कोई विघ्न उत्पन्न हुआ ?