भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 205

अयोध्याकाण्ड १६५

साथ गरज उठे हों। उस दृश्य का वर्णन करने का विचार तक करना मुझ जैसे लोगों के लिए असम्भव है, फिर भी किंचिन्मात्र हम उसका वर्णन करेंगे।

कुंजर-जैसे वीर युवकों के मन को मुग्ध करनेवाली युवतियाँ (अपने शरीर में) महावर लगाती, दूध-जैसे उज्ज्वल शंख-वलयों को चुन-चुनकर पहनती, करवाल तथा बाण-समान तीक्ष्ण नयनों में काजल लगाती, जैसे उनमें विष ही रख रही हों तथा नव पुष्पों को धारण करतीं।

वहाँ के युवक, जो अत्यन्त आनन्द से अश्रु बहानेवाले कमल-सदृश नयनोंवाले थे, दोष-हीन वदनवाले थे, जिनकी पुष्ट भुजाओं पर मीन समान तथा मद्य-पान से उत्पन्न वर्ण जैसे लाल रंग से भरे नयनोंवाली सुन्दरीयों के स्तनों पर के चंदन-लेप का चिह्न अभी नहीं मिटा था, रामचन्द्र के मुकुट-धारण की बात सोचकर उन (राम) के भाइयों के जैसे ही (अत्यन्त आनन्दित) हो उठे।

उस नगर में रहनेवाले सद्गुणों के आगार सब पुरुष दशरथ के जैसे थे। ब्राह्मण सब वसिष्ठ के जैसे थे। सच्चरित्र स्त्रियाँ कौशल्या की जैसी थीं तथा अन्य युवतियाँ सीता के समान थीं और वह (सीता) देवी लक्ष्मी के समान थीं।

सीता के पति के मुकुट-धारणोत्सव को देखने की उमड़ती हुई इच्छा से प्रेरित होकर राजाओं का समूह अमृत का पान करने के लिए आये हुए देवों के जैसे आकर वहाँ एकत्र हुआ, जिससे शब्दायमान समुद्र से आवृत्त पृथ्वी का सारा प्रदेश खाली हो गया।

उस सुन्दर नगर में सर्वत्र, शर्करा के-से माधुर्य एवं प्रवाल के जैसे रक्त अधरोंवाली, पीन स्तनोंवाली तथा विशाल जघन-तटवाली सुन्दरियों के झुण्ड थे और उनके साथ पुरुषों के झुण्ड भी थे। सब एक दूसरे को ढकेलते हुए कह रहे थे कि चलो-चलो, किन्तु आगे जाने के लिए स्थान न होने से वे अपने-अपने स्थानों पर ही स्थिर खड़े रहने के अतिरिक्त न तो आगे बढ़ सकते थे, न उस विचार को (अर्थात्, आगे बढ़ने के विचार को) छोड़ ही सकते थे।

उस जन-समुदाय को देखकर कुछ कहते थे कि राजा लोग ही अधिक हैं, कुछ कहते थे कि सैनिक वीर ही अधिक हैं, कुछ कहते थे कि पुरुष अधिक हैं, कुछ कहते थे कि स्त्रियाँ अधिक हैं, कुछ कहते थे कि आगत प्रजा ही अधिक है, कुछ कहते थे कि अभी आनेवाली प्रजा अधिक है, जो जैसा समझता था, वह वही कहता था। किन्तु, कोई भी सम्पूर्ण रूप से (उस भीड़ को) नहीं देख पाता था।

नीलोत्पल का लावण्य और भाले की क्रूरता, दोनों को एक साथ मिलाकर तथा उस पर मृदुल अंजन नामक विष को लगाकर जैसे धवल चन्द्रमा पर रखा गया हो वैसे विशाल नयनों से युक्त सुन्दर तथा लचकती हुई सूक्ष्म कटिवाली युवतियाँ नाचनेवाले मयूरों के झुण्ड के समान एकत्र हो आईं।

सुगन्धित तुलसी-माला से भूषित (राम) के भू-देवी के साथ शुभ विवाह को (अर्थात् राज-तिलक को) देखने के लिए जो नहीं आये, वे थे लंका के निवासी राक्षस, सप्त द्वीपों के कुल पर्वत तथा अष्ट दिशाओं में स्थित मदस्रावी गज।