कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६४ | कंब रामायण
भी बड़ी लगती है तथा आज का समय ऐसा है, जब कमलनिवासिनी (लक्ष्मी), सप्त लोकों के निवासी एवं हमलोगो के पुण्यवान् नयन तथा हृदय जीवन का लाभ प्राप्त करेंगे।
जो रमणियाँ, तैल-सिक्त उज्ज्वल तथा तीक्ष्ण बरछे-जैसे अपने नयनों को बद करके मन मे राम के राजतिलक का ही ध्यान लिये, झूठी निद्रा ले रही थी, वे (स्त्रियाँ) आश्चर्य-जनक शरीर-काति से युक्त राम की सुन्दरता को देखने की अधिकाधिक बढ़नेवाली इच्छा से, पुष्पो की सेज को ऐसे छोड़कर उठ गईं कि (उन पुष्पो का रस लेनेवाले) भ्रमर गुंजार भरते हुए उड़ चले।
मनोहर पुष्प-मालाधारिणी जो सुन्दरियाँ मन की दृढता के साथ (अपने पतियो से) मान किये बैठी थी, वे अब प्रभात-वाद्यों को बजते हुए सुनकर घबरा उठी और अपने दुःख व्याकुल पतियो को प्राण-दान-सी करती हुई स्वर्णाभरणो के दबते हुए, लता-तुल्य कटि के भय-विक्षिपित होते हुए तथा दलयुक्त पुष्पमाला के अंकित होते हुए समागम का सुख न प्राप्त कर सकी।
सर्वत्र मयूर-पंख चमक उठे। भ्रमर शब्दायमान हो उठे। पुष्प-मालाएँ चमक उठी। भेरियाँ शब्दायमान हो उठी। स्थान-स्थान पर स्थित मुक्ता-पक्तियाँ चमकती हुई शब्दायमान हो उठी। आभरण शब्दायमान हो उठे। पक्षी शब्दायमान हो उठे। वीणा-वाद्य शब्दायमान हो उठे। मन से भी अधिक वेग से दौड़नेवाले अश्व, मेघो के समान शब्दायमान हो उठे।$^१$
दीपक उसी प्रकार मन्द पड़ गये, जिस प्रकार चतुर्दश भुवनो को अपने प्राणो-सहित दान देनेवाले, वीरो के वीर, अपने ज्येष्ठ पुत्र पर अधिक प्रेम रखने के कारण अत्यन्त विह्वल तथा पञ्चेंद्रियो के निष्क्रिय हो जाने से कंपित हो पड़े हुए चक्रवर्त्ती (दशरथ) की दिव्य-देह की काति मद पड़ गई थी।
अनेक वेणुवाद्य शब्द कर उठे। स्वस्ति-वाचन सुनाई पड़ने लगे। संगीत-ध्वनि गगन-भर मे व्याप्त हो गई। अनेक प्रकार के वाद्य बज उठे। (सुन्दरियों के) नूपुरों के साथ शख भी शब्द कर उठे तथा शृंगीवाद्य साम-गान कर उठे।
सूर्य, धूप के समान बढ़े हुए अन्धकार-रूपी शत्रु को भगाता हुआ और प्रासादो के भीतर के दीपो की काति को मन्द करता हुआ उदय पर्वत पर उदित हुआ। वह लाल होकर दिखाई पड़ रहा था, मानो पापिन कैकेयी के वैर से अपने कुल के श्रेष्ठ पुत्र चक्रवर्ती के प्राणो को व्याकुल होते देखकर वह (सूर्य) अत्यन्त क्रुद्ध हो गया हों।
पंकज-समूह इस प्रकार सत्वर प्रफुल्ल हो उठे, जैसे वे उन रमणियो के बदन हों, जो (रमणियाँ) उन रामचन्द्र के मुकुट-धारण की शोभा को देखने की इच्छा से भरी थी, जो (रामचन्द्र) त्रिमूर्त्ति बननेवाले त्रिदेवो के भी आदि कारण थे। स्वयं सारी सृष्टि बनकर रहते थे तथा इन्द्रादि देवो के प्रभु शिव के धनुष को तोड़नेवाले महावीर थे।
ऐसे समय, उस विशाल अयोध्या की प्रजा, इस विचार से कि आज चक्रवर्त्ती के कुमार सिंहासनास्रढ होगे, बड़े हर्ष के साथ ऐसे कोलाहल कर उठी, जैसे सातो समुद्र एक
१. मूल में चमकना और शब्दायमान होना इन दोनो अर्थों को देनेवाली एक ही क्रिया 'ओलित्तन' का बार-बार प्रयोग हुआ है, जिससे शब्दगत सुन्दरता बढ़ गई है। —अनु०