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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

अयोध्याकाण्ड १६३

रात्रि के अन्तिम याम में कुक्कुट बोलने लगे। वे ऐसे लगते थे कि भ्रमरों से गुंजरित पुष्पमालाओं को धारण करनेवाले चक्रवर्ती ने कैकेयी के कारण दुःखी होकर जो वचन कहे थे, उनको सुनकर मानो वे (कुक्कुट) अत्यन्त व्याकुल हो रहे हों और अपने पंख-रूपी हाथों से छाती पीटते हुए रुदन कर रहे हों।

जलाशयों तथा वृक्षों पर अपने मृदुल पंखों को फड़फड़ाकर कूदनेवाले और आकाश में उड़नेवाले पक्षी, सूक्ष्म कटिवाली सुन्दरियों के नूपुरों के समान ध्वनि करने लगे, मानो वे केकय-राजा की पुत्री होकर उत्पन्न उस विष (-समान कैकेयी) को कोस रहे हों; जिसने क्षुद्रता के साथ दारुण उत्पात उत्पन्न किया था।

हाथी, जो अबतक (हथियारों में) मधुर निद्रा ले रहे थे, अब मानों यह सोचकर कि प्रसिद्ध नामवाले प्रभु सुन्दर मेखलाधारी अपनी पत्नी-सहित अरण्य को जायेंगे, अपने मन में काँप उठे और यह कहते हुए कि हम भी इस पृथ्वी को छोड़ देंगे, झट उठकर चल दिये।

विकसित कमल जैसे अरुण नेत्रोंवाले राम के गज-शुंड जैसे हाथ में मंगल-सूत्र बाँधने के पूर्व जो शामियाना शीतल किरणोंवाले मोतियों से अलंकृत करके तथा सारी पृथ्वी को आवृत्त करके डाला गया था, वह अब खोला जा रहा हो—यों आकाश में चमकनेवाले नक्षत्र अदृश्य होने लगे।

नगाड़े यह सूचना देते हुए बज उठे कि भयंकर कोदंडधारी राम को प्रणाम करने का शुभ समय आ पहुँचा और रात्रिकाल, जब मन्मथ अपने इक्षु-धनुष का पराक्रम दिखाता था, व्यतीत हो गया, (नगाड़ों की) वह ध्वनि पर्वतों के शिखरों पर के मेघ-गर्जन के समान थी। उस ध्वनि को सुनकर (अयोध्या की) नारियाँ मयूरों के झुण्डों के समान विकसित वदनों के साथ निद्रा छोड़कर उठने लगीं।

विविध पुष्प-समुदाय खिल गये। उनकी सुगन्धि को लेकर मद-मारुत बह चला। कुछ युवतियाँ उस (मंदानिल) के स्पर्श से व्याकुल हुईं और उनके वस्त्र तथा मेखलाभाग ढीले हो खिसक गये। कुछ स्त्रियाँ, जो स्वप्नों में अपने-अपने प्रियतमों का गाढ़ा आलिंगन करके दुःखमुक्त हो उठी थीं, उन ऐन्द्रजालिक स्वप्नों में बाधा पड़ने से स्तब्ध रह गईं।

कुमुदपुष्प इस प्रकार संकुलित हो गये, जैसे उत्तम गुणवाली स्त्रियों ने, चिरकाल तक रहनेवाले अपयश को उत्पन्न करके अपनी अपूर्व कीर्त्ति को मिटानेवाली कठोरहृदया कैकेयी के पापकर्म को देखकर और उससे स्त्री जाति के गौरव के मिटने से दुःखी होकर, अपना मुँह बंद कर लिया हो।

जो स्त्रियाँ अत्यन्त अनुराग में भरी थीं, प्रज्ज्वलित अग्नि से भी अधिक तीव्र कामना से पूर्ण थी तथा मन्मथ के तीक्ष्ण शरों, नभ की चन्द्रिका एवं दीर्घ मदमारुत के उनके शरीर को काटने से जो अत्यन्त व्याकुल थीं, उन विरहिणी युवतियों के कानों को मधुर राग-पूर्ण गान ऐसे लगे, जैसे फनवाले सर्प (उन कानों में) प्रविष्ट हो रहे हों।

मेघ के समान (दानशील) भुजावाले पुरुष, अपनी शय्याओं से यह विचार करते हुए उठे कि चक्रधारी (राम) के राजतिलक के शुभ दिन के पूर्व की यह रात्रि एक युग से