कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६२ | कंब रामायण
वे ही स्त्रियाँ उत्तम होती हैं, जिनमें लज्जा, सरलता, संकोच आदि महत्त्व को बढ़ानेवाले गुण रहते हैं। किंतु, यश के कारणभूत इन गुणों को न रखनेवाली नारियों की गिनती स्त्री-जाति में नहीं होती। वे पुरुष-जाति में ही गिनी जाती हैं। रूप के कारण ही उनकी गणना स्त्रियों में होती है।
मैंने पृथ्वी पर राज्य करनेवाले, बल तथा विवेक में उत्तम बड़े राजाओं को जीता, देवलोक के निवासियों को भी पराजित किया। किन्तु, ऐसा होकर भी मैं अपने घर में रहने-वाली एक स्त्री से परास्त हो गया। इससे मेरी कैसी हानि हुई, क्या मेरी ऐसी दशा होनी चाहिए।
वे चक्रवर्ती, जिनके कंधे ऐसे थे, जैसे एक स्वर्णमय पर्वत दूसरे (स्वर्णमय) पर्वत से आ मिला हो, इस प्रकार अनेक विधि से विचार करते, विविध वचन कहकर आह भरते, दुःख के समुद्र में डूबते, एक से असमान दूसरी पीड़ा को पाते (परस्पर असमान अनेक-विध पीड़ाएँ पाते), मूर्च्छित होकर यों गिरते कि यह संशय उत्पन्न होता कि इनके प्राण हैं या निकल गये। वे यों भग्नहृदय हो रहे।
पहियोंवाले स्वर्णमय रथयुक्त चक्रवर्ती इस प्रकार शिथिल हो पड़े रहे। धरती पर यों लोटते रहे कि उनके सुन्दर कंधों पर धूल लग गई। ऐसे समय में करुणाहीन उस कैकेयी ने कहा—हे सुन्दर विजयमालाधारी राजन् ! यदि मैं अपने वर यथाविध नहीं प्राप्त करूँगी, तो अपने प्राण त्याग दूँगी।
जलकर भी तृप्त न होने तथा चारों ओर फैलकर प्राणों को जलानेवाली अग्नि के समान स्थित उस कैकेयी ने कहा—हे दृढ़ धनुषधारी ! पूर्वकाल में एक राजा^१ ने सत्य की रक्षा के लिए अपना ही मांस काटकर दिया था। उसके वंश में उत्पन्न होकर आप यदि वर देकर भी उनको पूर्ण करने के लिए दुःखी हों, तो इससे बढ़कर और क्या होगा ?
तब बलवान् चक्रवर्ती ने यह सोचकर कि कहीं यह पापिन अपने प्राण-त्याग न कर दे, कहा—मैंने वर दे दिये, दे दिये। मेरा बेटा अरण्य में शासन करेगा और मैं मरकर स्वर्ग में राज्य करूँगा। तुम चिरकाल तक अपने पुत्र के सहित अपयश-रूपी समुद्र का पार न पाकर उसीमें डूबती रहोगी, डूबती रहोगी।
अपना यह वचन पूरा करने के पूर्व ही, वे काटनेवाले तीक्ष्ण करवाल जैसी पीड़ा के अपने मन में प्रविष्ट हो जाने से अत्यन्त व्याकुल हुए। सँभल न सके और निष्क्रिय पड़े रहे। कैकेयी अपनी इच्छा पूर्ण होने से संतुष्ट होती हुई निद्रालीन हो गई।
रात्रि-रूपी स्त्री यह देखकर कि चंद्रकला के सदृश मनोहर मंदहासवाली यह सुन्दरी (कैकेयी) चिरकाल से अपने पति के साथ एकप्राण-सी रही, अब अपने पति को अत्यन्त दारुण दुःख में डूबते हुए देखकर भी किंचिन्मात्र दुःखी न होकर सो रही है, वह (रात्रि-रूपी स्त्री) मानों पुरुषों के सम्मुख खड़ी रहने को स्वयं लज्जित होती हुई, वहाँ से हट चली।
१. इसमें उल्लिखित राजा 'शिवि' है, जिसने बाज से एक कबूतर को बचाकर उस कबूतर के बदले अपने शरीर का मांस काटकर बाज को दिया था।