कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड १६१
विजयी चक्रवर्त्ती ने इस प्रकार के वचन कहकर (कैकेयी से) याचना की। फिर भी अपना उपमान न रखनेवाली अति कठोर कैकेयी का मन नहीं बदला। उसने कहा—हे चक्रवर्त्ती ! आपने पहले ये वर मुझे दे दिये। अब उन्हें पूरा न करके क्रोध करें तो मैं क्या करूँ ? अब संसार में सत्यवादी कौन रह जायगा ?
वे सत्यवादी चक्रवर्त्ती, जिन्होंने कभी असत्य वचन सुना भी नहीं, (कैकेयी की) वह बात सुनकर अत्यंत शिथिलमन हुए। किंतु, बड़ी सहन-शक्ति के साथ यह सोचते हुए कि यह स्त्री विष और अग्नि का रूप है, लज्जित होकर मूर्च्छित-से पड़े रहे। पुनः याचना के स्वर में कहने लगे—
तुम्हारा पुत्र (भरत) राज करेगा। तुम सुख से शासन करती रहो। सारी पृथ्वी तुम्हारे अधिकार में होगी। मैंने दे दिया। मैं अपने वचन वापस नहीं लूँगा। किंतु, मेरे पुत्र, मेरे नेत्र, मेरे प्राण, सब प्राणियों के लिए पुत्र के समान (हितकारी) मेरे राम को इस देश को छोड़कर (अरण्य में) जाने न दो। मेरी इस याचना को तुम स्वीकार करो।
मैं यह देखकर कि सत्य ही मेरी जड़ खोद रहा है, अत्यंत दुःखी हो रहा हूँ। मेरी जीभ सूख रही है। ऐसी दशा में यदि कमलपाणि राम मेरे सम्मुख से हट जायगा, तो मेरे प्राण नहीं बचेंगे। अतः, हे नारि ! मेरे प्राण तुम्हारी शरण में हैं।
इस प्रकार विनती करनेवाले चक्रवर्ती के मधुर वचनों को नहीं माननेवाली कैकेयी का क्रोध कुछ भी कम नहीं हुआ। उसका हृदय काठ के जैसा था। उसे लज्जा नहीं हुई। उसने अपने अपयश की परवाह नहीं की, और कहा—हे अनेक बाणों को रखनेवाले ! आपका यह कथन कि आपके पूर्व दिये वर को मैं स्वीकार न करके छोड़ दूँ, अधर्म ही तो है ? आप ही कहिए।
उस क्रूर नारी ने जब यों कहा, तब वे उत्तम कुल के क्षत्रिय (दशरथ), यह कहकर कि यदि मेरा ज्येष्ठ पुत्र किरीट धारण न करके कठोर कंकड़ों से भरे अरण्य में जायगा, तो उसके वियोग में निश्चय ही मेरे प्राण भी मुझ से वियुक्त हो जायेंगे—वज्राहत पर्वत के समान धरती पर गिर पड़े।
चक्रवर्त्ती पृथ्वी पर गिरे। गिरकर दारुण दुःख के समुद्र में डूबे। डूबकर (उन्होंने) उस समुद्र का कोई किनारा नहीं पाया। कोई किनारा न पाकर, क्रूर वचनवाली, अपनी वाणी से हृदय को तोड़नेवाली कैकेयी के क्षुद्र स्वभाव को देखकर अत्यंत शोक से (पृथ्वी पर) लोट गये।
'कांतिमय कंकण-धारिणी नारियों ने अपने प्राण-पतियों के मरने के पूर्व ही अपने प्राण त्याग दिये'—ऐसे यश की भागिनी बनने का अबतक प्रयत्न करती रही। किंतु, उनमें से किसी ने अपने पति की हत्या नहीं की थी। हे क्रूर स्वभाववाली ! क्या तुम अब अपने पति की हत्या करना चाहती हो ?
तुमने अपराध होने की चिन्ता नहीं की। सत्कुल-जात स्त्रियों के धर्म का विचार नहीं किया। (मेरे प्रति दया रखकर) मुँह से आह तक नहीं निकालती। तुम्हारे हृदय में करुणा नहीं है। अपने वचन-बाण से तुमने मेरे प्राण पी लिये। अब तुम पाप की चिन्ता किये बिना संसार के निवासियों के प्राण हरण करनेवाली हो।'