कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० कंब रामायण
विशाल स्वर्ग, पाताल तथा धरती को जीतनेवाले करवालधारी चक्रवर्त्ती, कभी, ( अहो, क्रूर नारी !) कहकर आह भरते; 'हाय ! धर्म कितना कठोर है !,' कहते ; 'मेरे शरीर का अंत हो जाय' कहकर उठते, फिर लड़खड़ाकर पृथ्वी पर गिर पड़ते।
वीरो के पराक्रम को कुंठित करनेवाले भाले को धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती उमड़ते हुए क्रोध से कहते—'मै अपने तीक्ष्ण करवाल से नारियो को निहत करके संसार को स्त्री-रहित कर दूँगा और मै भी पतित होकर नीच जनों मे गिना जाऊँगा।'
वे चक्रवर्त्ती, जिनका सत्य आचरण संसार-भर में प्रसिद्ध था, हाथ पर हाथ मारते, ओंठ चबाते, मन में यह सोचकर दुःखी होते कि सत्य-वचन भी हानिकारक है। जैसे घी में आग की गरमी लगी हो, वैसे ही उनका मन पिघल उठता।
सत्यवादी चक्रवर्त्ती ने सोचा—यदि सत्य की रक्षा न करूँ और इस (कैकेयी) को दंडित करूँ तो वह बुरा होगा। यदि इसके माँगे वर दूँ, तो भी बुरा होगा। फिर, यह विचार करके उठे कि अपने हठ पर दृढ रहनेवाली इससे याचना करना ही अच्छा है।
आलान-स्तम्ब को भी तोड़ देनेवाले मद से भरे गज-जैसे राजा लोग अहमहमिका से आकर जिन (दशरथ) के चरणों को प्रणाम करते थे, वे (दशरथ), यह सोचकर कि जिस प्रकार अपराधों को दूर करने के लिए वेत्र-दंड को धारण करना उचित होता है, उसी प्रकार भावी हित को सोचकर क्षमा धारण करना भी उचित है—उस (कैकेयी) के चरणों पर गिर पडे।
फिर, उन्होने कैकेयी से कहा—तुम्हारा बेटा (भरत) यह राज्य (देने पर भी) नही लेगा। यदि वह स्वीकार भी करे, तो भी संसार के लोग वह कार्य पसन्द नही करेंगे। अतः, तुम्हें संसार में शाश्वत रहनेवाला यश नही प्राप्त होगा। अपयश पाने से तुमको क्या लाभ होगा ?
(भरत का राजा होना और राम का अरण्य-वास करना) देवता लोग भी स्वीकार नही करेंगे। संसार के लोग भी (राम को छोड़कर) जीवित रहना नही चाहेंगे। तब पातालवासियो के बारे मे क्या कहा जाय ? तुम किनको रखकर यह राज्य करोगी ? राम मेरे कहने से ही (राज्य लेने को) सहमत हुआ है। वह स्वयं ही तुम्हारे पुत्र को पृथ्वी दे देगा—इस प्रकार चक्रवर्त्ती ने कहा।
हे नारी ! उदार केकयराज की पुत्री। यदि तुम मेरी आँखें माँगो, तो देने को प्रस्तुत हूँ। मेरे प्राणो को चाहो, तो ये प्राण अभी तुम्हारे अधीन ही हैं। अगर तुम चाहती हो, तो पृथ्वी (का राज्य भी) ले लो। किंतु दूसरे वर की बात (अर्थात्, राम का वन-गमन) भूल जाओ।
मैने वचन दे दिया कि वर दिये हैं। मैं स्वयं उस वचन को नही बदलूँगा। तुम मुझे पीडा देनेवाली बात मत कहो। अग्नि के जैसी जलनेवाली आँखों से युक्त भूत भी, अगर कोई उससे कुछ याचना करे, तो माता के समान (दयावान्) होकर दे देता है। यदि तुम मुझे यह दे दो (अर्थात्, राम के वन-गमन की इच्छा न करो) तो क्या कुछ अनुचित होगा ?