कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
१६० कंब रामायण
विशाल स्वर्ग, पाताल तथा धरती को जीतनेवाले करवालधारी चक्रवर्त्ती, कभी, ( अहो, क्रूर नारी !) कहकर आह भरते; 'हाय ! धर्म कितना कठोर है !,' कहते ; 'मेरे शरीर का अंत हो जाय' कहकर उठते, फिर लड़खड़ाकर पृथ्वी पर गिर पड़ते।
वीरो के पराक्रम को कुंठित करनेवाले भाले को धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती उमड़ते हुए क्रोध से कहते—'मै अपने तीक्ष्ण करवाल से नारियो को निहत करके संसार को स्त्री-रहित कर दूँगा और मै भी पतित होकर नीच जनों मे गिना जाऊँगा।'
वे चक्रवर्त्ती, जिनका सत्य आचरण संसार-भर में प्रसिद्ध था, हाथ पर हाथ मारते, ओंठ चबाते, मन में यह सोचकर दुःखी होते कि सत्य-वचन भी हानिकारक है। जैसे घी में आग की गरमी लगी हो, वैसे ही उनका मन पिघल उठता।
सत्यवादी चक्रवर्त्ती ने सोचा—यदि सत्य की रक्षा न करूँ और इस (कैकेयी) को दंडित करूँ तो वह बुरा होगा। यदि इसके माँगे वर दूँ, तो भी बुरा होगा। फिर, यह विचार करके उठे कि अपने हठ पर दृढ रहनेवाली इससे याचना करना ही अच्छा है।
आलान-स्तम्ब को भी तोड़ देनेवाले मद से भरे गज-जैसे राजा लोग अहमहमिका से आकर जिन (दशरथ) के चरणों को प्रणाम करते थे, वे (दशरथ), यह सोचकर कि जिस प्रकार अपराधों को दूर करने के लिए वेत्र-दंड को धारण करना उचित होता है, उसी प्रकार भावी हित को सोचकर क्षमा धारण करना भी उचित है—उस (कैकेयी) के चरणों पर गिर पडे।
फिर, उन्होने कैकेयी से कहा—तुम्हारा बेटा (भरत) यह राज्य (देने पर भी) नही लेगा। यदि वह स्वीकार भी करे, तो भी संसार के लोग वह कार्य पसन्द नही करेंगे। अतः, तुम्हें संसार में शाश्वत रहनेवाला यश नही प्राप्त होगा। अपयश पाने से तुमको क्या लाभ होगा ?
(भरत का राजा होना और राम का अरण्य-वास करना) देवता लोग भी स्वीकार नही करेंगे। संसार के लोग भी (राम को छोड़कर) जीवित रहना नही चाहेंगे। तब पातालवासियो के बारे मे क्या कहा जाय ? तुम किनको रखकर यह राज्य करोगी ? राम मेरे कहने से ही (राज्य लेने को) सहमत हुआ है। वह स्वयं ही तुम्हारे पुत्र को पृथ्वी दे देगा—इस प्रकार चक्रवर्त्ती ने कहा।
हे नारी ! उदार केकयराज की पुत्री। यदि तुम मेरी आँखें माँगो, तो देने को प्रस्तुत हूँ। मेरे प्राणो को चाहो, तो ये प्राण अभी तुम्हारे अधीन ही हैं। अगर तुम चाहती हो, तो पृथ्वी (का राज्य भी) ले लो। किंतु दूसरे वर की बात (अर्थात्, राम का वन-गमन) भूल जाओ।
मैने वचन दे दिया कि वर दिये हैं। मैं स्वयं उस वचन को नही बदलूँगा। तुम मुझे पीडा देनेवाली बात मत कहो। अग्नि के जैसी जलनेवाली आँखों से युक्त भूत भी, अगर कोई उससे कुछ याचना करे, तो माता के समान (दयावान्) होकर दे देता है। यदि तुम मुझे यह दे दो (अर्थात्, राम के वन-गमन की इच्छा न करो) तो क्या कुछ अनुचित होगा ?
अयोध्याकाण्ड १६१
विजयी चक्रवर्त्ती ने इस प्रकार के वचन कहकर (कैकेयी से) याचना की। फिर भी अपना उपमान न रखनेवाली अति कठोर कैकेयी का मन नहीं बदला। उसने कहा—हे चक्रवर्त्ती ! आपने पहले ये वर मुझे दे दिये। अब उन्हें पूरा न करके क्रोध करें तो मैं क्या करूँ ? अब संसार में सत्यवादी कौन रह जायगा ?
वे सत्यवादी चक्रवर्त्ती, जिन्होंने कभी असत्य वचन सुना भी नहीं, (कैकेयी की) वह बात सुनकर अत्यंत शिथिलमन हुए। किंतु, बड़ी सहन-शक्ति के साथ यह सोचते हुए कि यह स्त्री विष और अग्नि का रूप है, लज्जित होकर मूर्च्छित-से पड़े रहे। पुनः याचना के स्वर में कहने लगे—
तुम्हारा पुत्र (भरत) राज करेगा। तुम सुख से शासन करती रहो। सारी पृथ्वी तुम्हारे अधिकार में होगी। मैंने दे दिया। मैं अपने वचन वापस नहीं लूँगा। किंतु, मेरे पुत्र, मेरे नेत्र, मेरे प्राण, सब प्राणियों के लिए पुत्र के समान (हितकारी) मेरे राम को इस देश को छोड़कर (अरण्य में) जाने न दो। मेरी इस याचना को तुम स्वीकार करो।
मैं यह देखकर कि सत्य ही मेरी जड़ खोद रहा है, अत्यंत दुःखी हो रहा हूँ। मेरी जीभ सूख रही है। ऐसी दशा में यदि कमलपाणि राम मेरे सम्मुख से हट जायगा, तो मेरे प्राण नहीं बचेंगे। अतः, हे नारि ! मेरे प्राण तुम्हारी शरण में हैं।
इस प्रकार विनती करनेवाले चक्रवर्ती के मधुर वचनों को नहीं माननेवाली कैकेयी का क्रोध कुछ भी कम नहीं हुआ। उसका हृदय काठ के जैसा था। उसे लज्जा नहीं हुई। उसने अपने अपयश की परवाह नहीं की, और कहा—हे अनेक बाणों को रखनेवाले ! आपका यह कथन कि आपके पूर्व दिये वर को मैं स्वीकार न करके छोड़ दूँ, अधर्म ही तो है ? आप ही कहिए।
उस क्रूर नारी ने जब यों कहा, तब वे उत्तम कुल के क्षत्रिय (दशरथ), यह कहकर कि यदि मेरा ज्येष्ठ पुत्र किरीट धारण न करके कठोर कंकड़ों से भरे अरण्य में जायगा, तो उसके वियोग में निश्चय ही मेरे प्राण भी मुझ से वियुक्त हो जायेंगे—वज्राहत पर्वत के समान धरती पर गिर पड़े।
चक्रवर्त्ती पृथ्वी पर गिरे। गिरकर दारुण दुःख के समुद्र में डूबे। डूबकर (उन्होंने) उस समुद्र का कोई किनारा नहीं पाया। कोई किनारा न पाकर, क्रूर वचनवाली, अपनी वाणी से हृदय को तोड़नेवाली कैकेयी के क्षुद्र स्वभाव को देखकर अत्यंत शोक से (पृथ्वी पर) लोट गये।
'कांतिमय कंकण-धारिणी नारियों ने अपने प्राण-पतियों के मरने के पूर्व ही अपने प्राण त्याग दिये'—ऐसे यश की भागिनी बनने का अबतक प्रयत्न करती रही। किंतु, उनमें से किसी ने अपने पति की हत्या नहीं की थी। हे क्रूर स्वभाववाली ! क्या तुम अब अपने पति की हत्या करना चाहती हो ?
तुमने अपराध होने की चिन्ता नहीं की। सत्कुल-जात स्त्रियों के धर्म का विचार नहीं किया। (मेरे प्रति दया रखकर) मुँह से आह तक नहीं निकालती। तुम्हारे हृदय में करुणा नहीं है। अपने वचन-बाण से तुमने मेरे प्राण पी लिये। अब तुम पाप की चिन्ता किये बिना संसार के निवासियों के प्राण हरण करनेवाली हो।'
१६२ | कंब रामायण
वे ही स्त्रियाँ उत्तम होती हैं, जिनमें लज्जा, सरलता, संकोच आदि महत्त्व को बढ़ानेवाले गुण रहते हैं। किंतु, यश के कारणभूत इन गुणों को न रखनेवाली नारियों की गिनती स्त्री-जाति में नहीं होती। वे पुरुष-जाति में ही गिनी जाती हैं। रूप के कारण ही उनकी गणना स्त्रियों में होती है।
मैंने पृथ्वी पर राज्य करनेवाले, बल तथा विवेक में उत्तम बड़े राजाओं को जीता, देवलोक के निवासियों को भी पराजित किया। किन्तु, ऐसा होकर भी मैं अपने घर में रहने-वाली एक स्त्री से परास्त हो गया। इससे मेरी कैसी हानि हुई, क्या मेरी ऐसी दशा होनी चाहिए।
वे चक्रवर्ती, जिनके कंधे ऐसे थे, जैसे एक स्वर्णमय पर्वत दूसरे (स्वर्णमय) पर्वत से आ मिला हो, इस प्रकार अनेक विधि से विचार करते, विविध वचन कहकर आह भरते, दुःख के समुद्र में डूबते, एक से असमान दूसरी पीड़ा को पाते (परस्पर असमान अनेक-विध पीड़ाएँ पाते), मूर्च्छित होकर यों गिरते कि यह संशय उत्पन्न होता कि इनके प्राण हैं या निकल गये। वे यों भग्नहृदय हो रहे।
पहियोंवाले स्वर्णमय रथयुक्त चक्रवर्ती इस प्रकार शिथिल हो पड़े रहे। धरती पर यों लोटते रहे कि उनके सुन्दर कंधों पर धूल लग गई। ऐसे समय में करुणाहीन उस कैकेयी ने कहा—हे सुन्दर विजयमालाधारी राजन् ! यदि मैं अपने वर यथाविध नहीं प्राप्त करूँगी, तो अपने प्राण त्याग दूँगी।
जलकर भी तृप्त न होने तथा चारों ओर फैलकर प्राणों को जलानेवाली अग्नि के समान स्थित उस कैकेयी ने कहा—हे दृढ़ धनुषधारी ! पूर्वकाल में एक राजा^१ ने सत्य की रक्षा के लिए अपना ही मांस काटकर दिया था। उसके वंश में उत्पन्न होकर आप यदि वर देकर भी उनको पूर्ण करने के लिए दुःखी हों, तो इससे बढ़कर और क्या होगा ?
तब बलवान् चक्रवर्ती ने यह सोचकर कि कहीं यह पापिन अपने प्राण-त्याग न कर दे, कहा—मैंने वर दे दिये, दे दिये। मेरा बेटा अरण्य में शासन करेगा और मैं मरकर स्वर्ग में राज्य करूँगा। तुम चिरकाल तक अपने पुत्र के सहित अपयश-रूपी समुद्र का पार न पाकर उसीमें डूबती रहोगी, डूबती रहोगी।
अपना यह वचन पूरा करने के पूर्व ही, वे काटनेवाले तीक्ष्ण करवाल जैसी पीड़ा के अपने मन में प्रविष्ट हो जाने से अत्यन्त व्याकुल हुए। सँभल न सके और निष्क्रिय पड़े रहे। कैकेयी अपनी इच्छा पूर्ण होने से संतुष्ट होती हुई निद्रालीन हो गई।
रात्रि-रूपी स्त्री यह देखकर कि चंद्रकला के सदृश मनोहर मंदहासवाली यह सुन्दरी (कैकेयी) चिरकाल से अपने पति के साथ एकप्राण-सी रही, अब अपने पति को अत्यन्त दारुण दुःख में डूबते हुए देखकर भी किंचिन्मात्र दुःखी न होकर सो रही है, वह (रात्रि-रूपी स्त्री) मानों पुरुषों के सम्मुख खड़ी रहने को स्वयं लज्जित होती हुई, वहाँ से हट चली।
१. इसमें उल्लिखित राजा 'शिवि' है, जिसने बाज से एक कबूतर को बचाकर उस कबूतर के बदले अपने शरीर का मांस काटकर बाज को दिया था।
अयोध्याकाण्ड १६३
रात्रि के अन्तिम याम में कुक्कुट बोलने लगे। वे ऐसे लगते थे कि भ्रमरों से गुंजरित पुष्पमालाओं को धारण करनेवाले चक्रवर्ती ने कैकेयी के कारण दुःखी होकर जो वचन कहे थे, उनको सुनकर मानो वे (कुक्कुट) अत्यन्त व्याकुल हो रहे हों और अपने पंख-रूपी हाथों से छाती पीटते हुए रुदन कर रहे हों।
जलाशयों तथा वृक्षों पर अपने मृदुल पंखों को फड़फड़ाकर कूदनेवाले और आकाश में उड़नेवाले पक्षी, सूक्ष्म कटिवाली सुन्दरियों के नूपुरों के समान ध्वनि करने लगे, मानो वे केकय-राजा की पुत्री होकर उत्पन्न उस विष (-समान कैकेयी) को कोस रहे हों; जिसने क्षुद्रता के साथ दारुण उत्पात उत्पन्न किया था।
हाथी, जो अबतक (हथियारों में) मधुर निद्रा ले रहे थे, अब मानों यह सोचकर कि प्रसिद्ध नामवाले प्रभु सुन्दर मेखलाधारी अपनी पत्नी-सहित अरण्य को जायेंगे, अपने मन में काँप उठे और यह कहते हुए कि हम भी इस पृथ्वी को छोड़ देंगे, झट उठकर चल दिये।
विकसित कमल जैसे अरुण नेत्रोंवाले राम के गज-शुंड जैसे हाथ में मंगल-सूत्र बाँधने के पूर्व जो शामियाना शीतल किरणोंवाले मोतियों से अलंकृत करके तथा सारी पृथ्वी को आवृत्त करके डाला गया था, वह अब खोला जा रहा हो—यों आकाश में चमकनेवाले नक्षत्र अदृश्य होने लगे।
नगाड़े यह सूचना देते हुए बज उठे कि भयंकर कोदंडधारी राम को प्रणाम करने का शुभ समय आ पहुँचा और रात्रिकाल, जब मन्मथ अपने इक्षु-धनुष का पराक्रम दिखाता था, व्यतीत हो गया, (नगाड़ों की) वह ध्वनि पर्वतों के शिखरों पर के मेघ-गर्जन के समान थी। उस ध्वनि को सुनकर (अयोध्या की) नारियाँ मयूरों के झुण्डों के समान विकसित वदनों के साथ निद्रा छोड़कर उठने लगीं।
विविध पुष्प-समुदाय खिल गये। उनकी सुगन्धि को लेकर मद-मारुत बह चला। कुछ युवतियाँ उस (मंदानिल) के स्पर्श से व्याकुल हुईं और उनके वस्त्र तथा मेखलाभाग ढीले हो खिसक गये। कुछ स्त्रियाँ, जो स्वप्नों में अपने-अपने प्रियतमों का गाढ़ा आलिंगन करके दुःखमुक्त हो उठी थीं, उन ऐन्द्रजालिक स्वप्नों में बाधा पड़ने से स्तब्ध रह गईं।
कुमुदपुष्प इस प्रकार संकुलित हो गये, जैसे उत्तम गुणवाली स्त्रियों ने, चिरकाल तक रहनेवाले अपयश को उत्पन्न करके अपनी अपूर्व कीर्त्ति को मिटानेवाली कठोरहृदया कैकेयी के पापकर्म को देखकर और उससे स्त्री जाति के गौरव के मिटने से दुःखी होकर, अपना मुँह बंद कर लिया हो।
जो स्त्रियाँ अत्यन्त अनुराग में भरी थीं, प्रज्ज्वलित अग्नि से भी अधिक तीव्र कामना से पूर्ण थी तथा मन्मथ के तीक्ष्ण शरों, नभ की चन्द्रिका एवं दीर्घ मदमारुत के उनके शरीर को काटने से जो अत्यन्त व्याकुल थीं, उन विरहिणी युवतियों के कानों को मधुर राग-पूर्ण गान ऐसे लगे, जैसे फनवाले सर्प (उन कानों में) प्रविष्ट हो रहे हों।
मेघ के समान (दानशील) भुजावाले पुरुष, अपनी शय्याओं से यह विचार करते हुए उठे कि चक्रधारी (राम) के राजतिलक के शुभ दिन के पूर्व की यह रात्रि एक युग से
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भी बड़ी लगती है तथा आज का समय ऐसा है, जब कमलनिवासिनी (लक्ष्मी), सप्त लोकों के निवासी एवं हमलोगो के पुण्यवान् नयन तथा हृदय जीवन का लाभ प्राप्त करेंगे।
जो रमणियाँ, तैल-सिक्त उज्ज्वल तथा तीक्ष्ण बरछे-जैसे अपने नयनों को बद करके मन मे राम के राजतिलक का ही ध्यान लिये, झूठी निद्रा ले रही थी, वे (स्त्रियाँ) आश्चर्य-जनक शरीर-काति से युक्त राम की सुन्दरता को देखने की अधिकाधिक बढ़नेवाली इच्छा से, पुष्पो की सेज को ऐसे छोड़कर उठ गईं कि (उन पुष्पो का रस लेनेवाले) भ्रमर गुंजार भरते हुए उड़ चले।
मनोहर पुष्प-मालाधारिणी जो सुन्दरियाँ मन की दृढता के साथ (अपने पतियो से) मान किये बैठी थी, वे अब प्रभात-वाद्यों को बजते हुए सुनकर घबरा उठी और अपने दुःख व्याकुल पतियो को प्राण-दान-सी करती हुई स्वर्णाभरणो के दबते हुए, लता-तुल्य कटि के भय-विक्षिपित होते हुए तथा दलयुक्त पुष्पमाला के अंकित होते हुए समागम का सुख न प्राप्त कर सकी।
सर्वत्र मयूर-पंख चमक उठे। भ्रमर शब्दायमान हो उठे। पुष्प-मालाएँ चमक उठी। भेरियाँ शब्दायमान हो उठी। स्थान-स्थान पर स्थित मुक्ता-पक्तियाँ चमकती हुई शब्दायमान हो उठी। आभरण शब्दायमान हो उठे। पक्षी शब्दायमान हो उठे। वीणा-वाद्य शब्दायमान हो उठे। मन से भी अधिक वेग से दौड़नेवाले अश्व, मेघो के समान शब्दायमान हो उठे।$^१$
दीपक उसी प्रकार मन्द पड़ गये, जिस प्रकार चतुर्दश भुवनो को अपने प्राणो-सहित दान देनेवाले, वीरो के वीर, अपने ज्येष्ठ पुत्र पर अधिक प्रेम रखने के कारण अत्यन्त विह्वल तथा पञ्चेंद्रियो के निष्क्रिय हो जाने से कंपित हो पड़े हुए चक्रवर्त्ती (दशरथ) की दिव्य-देह की काति मद पड़ गई थी।
अनेक वेणुवाद्य शब्द कर उठे। स्वस्ति-वाचन सुनाई पड़ने लगे। संगीत-ध्वनि गगन-भर मे व्याप्त हो गई। अनेक प्रकार के वाद्य बज उठे। (सुन्दरियों के) नूपुरों के साथ शख भी शब्द कर उठे तथा शृंगीवाद्य साम-गान कर उठे।
सूर्य, धूप के समान बढ़े हुए अन्धकार-रूपी शत्रु को भगाता हुआ और प्रासादो के भीतर के दीपो की काति को मन्द करता हुआ उदय पर्वत पर उदित हुआ। वह लाल होकर दिखाई पड़ रहा था, मानो पापिन कैकेयी के वैर से अपने कुल के श्रेष्ठ पुत्र चक्रवर्ती के प्राणो को व्याकुल होते देखकर वह (सूर्य) अत्यन्त क्रुद्ध हो गया हों।
पंकज-समूह इस प्रकार सत्वर प्रफुल्ल हो उठे, जैसे वे उन रमणियो के बदन हों, जो (रमणियाँ) उन रामचन्द्र के मुकुट-धारण की शोभा को देखने की इच्छा से भरी थी, जो (रामचन्द्र) त्रिमूर्त्ति बननेवाले त्रिदेवो के भी आदि कारण थे। स्वयं सारी सृष्टि बनकर रहते थे तथा इन्द्रादि देवो के प्रभु शिव के धनुष को तोड़नेवाले महावीर थे।
ऐसे समय, उस विशाल अयोध्या की प्रजा, इस विचार से कि आज चक्रवर्त्ती के कुमार सिंहासनास्रढ होगे, बड़े हर्ष के साथ ऐसे कोलाहल कर उठी, जैसे सातो समुद्र एक
१. मूल में चमकना और शब्दायमान होना इन दोनो अर्थों को देनेवाली एक ही क्रिया 'ओलित्तन' का बार-बार प्रयोग हुआ है, जिससे शब्दगत सुन्दरता बढ़ गई है। —अनु०
अयोध्याकाण्ड १६५
साथ गरज उठे हों। उस दृश्य का वर्णन करने का विचार तक करना मुझ जैसे लोगों के लिए असम्भव है, फिर भी किंचिन्मात्र हम उसका वर्णन करेंगे।
कुंजर-जैसे वीर युवकों के मन को मुग्ध करनेवाली युवतियाँ (अपने शरीर में) महावर लगाती, दूध-जैसे उज्ज्वल शंख-वलयों को चुन-चुनकर पहनती, करवाल तथा बाण-समान तीक्ष्ण नयनों में काजल लगाती, जैसे उनमें विष ही रख रही हों तथा नव पुष्पों को धारण करतीं।
वहाँ के युवक, जो अत्यन्त आनन्द से अश्रु बहानेवाले कमल-सदृश नयनोंवाले थे, दोष-हीन वदनवाले थे, जिनकी पुष्ट भुजाओं पर मीन समान तथा मद्य-पान से उत्पन्न वर्ण जैसे लाल रंग से भरे नयनोंवाली सुन्दरीयों के स्तनों पर के चंदन-लेप का चिह्न अभी नहीं मिटा था, रामचन्द्र के मुकुट-धारण की बात सोचकर उन (राम) के भाइयों के जैसे ही (अत्यन्त आनन्दित) हो उठे।
उस नगर में रहनेवाले सद्गुणों के आगार सब पुरुष दशरथ के जैसे थे। ब्राह्मण सब वसिष्ठ के जैसे थे। सच्चरित्र स्त्रियाँ कौशल्या की जैसी थीं तथा अन्य युवतियाँ सीता के समान थीं और वह (सीता) देवी लक्ष्मी के समान थीं।
सीता के पति के मुकुट-धारणोत्सव को देखने की उमड़ती हुई इच्छा से प्रेरित होकर राजाओं का समूह अमृत का पान करने के लिए आये हुए देवों के जैसे आकर वहाँ एकत्र हुआ, जिससे शब्दायमान समुद्र से आवृत्त पृथ्वी का सारा प्रदेश खाली हो गया।
उस सुन्दर नगर में सर्वत्र, शर्करा के-से माधुर्य एवं प्रवाल के जैसे रक्त अधरोंवाली, पीन स्तनोंवाली तथा विशाल जघन-तटवाली सुन्दरियों के झुण्ड थे और उनके साथ पुरुषों के झुण्ड भी थे। सब एक दूसरे को ढकेलते हुए कह रहे थे कि चलो-चलो, किन्तु आगे जाने के लिए स्थान न होने से वे अपने-अपने स्थानों पर ही स्थिर खड़े रहने के अतिरिक्त न तो आगे बढ़ सकते थे, न उस विचार को (अर्थात्, आगे बढ़ने के विचार को) छोड़ ही सकते थे।
उस जन-समुदाय को देखकर कुछ कहते थे कि राजा लोग ही अधिक हैं, कुछ कहते थे कि सैनिक वीर ही अधिक हैं, कुछ कहते थे कि पुरुष अधिक हैं, कुछ कहते थे कि स्त्रियाँ अधिक हैं, कुछ कहते थे कि आगत प्रजा ही अधिक है, कुछ कहते थे कि अभी आनेवाली प्रजा अधिक है, जो जैसा समझता था, वह वही कहता था। किन्तु, कोई भी सम्पूर्ण रूप से (उस भीड़ को) नहीं देख पाता था।
नीलोत्पल का लावण्य और भाले की क्रूरता, दोनों को एक साथ मिलाकर तथा उस पर मृदुल अंजन नामक विष को लगाकर जैसे धवल चन्द्रमा पर रखा गया हो वैसे विशाल नयनों से युक्त सुन्दर तथा लचकती हुई सूक्ष्म कटिवाली युवतियाँ नाचनेवाले मयूरों के झुण्ड के समान एकत्र हो आईं।
सुगन्धित तुलसी-माला से भूषित (राम) के भू-देवी के साथ शुभ विवाह को (अर्थात् राज-तिलक को) देखने के लिए जो नहीं आये, वे थे लंका के निवासी राक्षस, सप्त द्वीपों के कुल पर्वत तथा अष्ट दिशाओं में स्थित मदस्रावी गज।
१६६ कम्ब रामायण
विशाल राज्यों के शासक इन्द्र की समता करनेवाले नरेश ऐसे मुक्तामय धवल छत्रों को लिये हुए जैसे करोड़ों चन्द्र आकाश में भर गये हों तथा ऐसे श्वेत चामरों को लिये हुए जैसे अन्तरिक्ष में अनेक हंस उड़ रहे हों, अभिषेक के मण्डप में आ पहुँचे ।
तपस्या के द्वारा पुण्य-फलों को प्राप्त करनेवाले उत्तम वेदज्ञ ब्राह्मण ऐसे आनन्द के साथ कि अपने पुत्र के विवाह को ही देखनेवाले हों, राज्य-लक्ष्मी के साथ रामचन्द्र का विवाह देखने के लिए आ पहुँचे ।
देवता गगन-तल को भरने लगे समुद्र-रूपी वस्त्र से युक्त भूमि पर रहनेवाले लोग सब दिशाओं को भरने लगे, मंगल-सूचक शंखों की ध्वनि तथा विशाल भेरियों की ध्वनि श्रोताओं के कानों में भरने लगी अपरिमेय स्वर्ण के साथ ( दान करते हुए ) बहाई हुई जल की धारा, वीचियों से पूर्ण सातों समुद्रों को भरने लगी ।
दीप की कांति को मन्द करनेवाली देह की कांति से युक्त राजाओं के विद्युत्-जैसे चमकनेवाले असंख्य किरीटों की रह-रहकर चमकनेवाली जगमगाहट, गगनगामी सूर्य को भी आवृत्त कर फैल गई , समुद्र से उत्पन्न मुक्ता जैसे दाँतोंवाली मदहास-युक्त युवतियों के आभरणों की कांति, स्वर्ण को भी आवृत्त करके देवताओं की आँखों को भी चौंधियाने लगी ।
उस समय, प्रभु ( राम ) के राज्याभिषेक के लिए आवश्यक समस्त सामग्री को लेकर वेदज्ञ ब्राह्मण चारों वेदों का वाचन करते हुए आये । उस पुरातन नगर के द्वार पर एकत्र हुई भीड़ उनके लिए मार्ग छोड़कर हट गई , इस प्रकार ( ब्राह्मणों को अपने साथ लेकर ) महान् तपस्वी वसिष्ठ आ पहुँचे ।
वसिष्ठ मुनि ने गंगा से कन्याकुमारी-पर्यन्त सब तीर्थों के पवित्र जल तथा चारों दिशाओं के जल को मँगवाया । होम के लिए आवश्यक वस्तुओं का प्रबन्ध किया और वीर सिंहासन भी प्रस्तुत करके रखा तथा सब आचार सम्पन्न किये ।
ज्योतिषज्ञों ने कहा कि मुहूर्त निकट आ गया है । कर्म-बन्धन को तोड़नेवाले तप का आचरण करनेवाले महर्षि (वसिष्ठ) ने सुमन्त्र को आदेश दिया कि शीघ्र जाकर रत्न किरीट-धारी चक्रवर्ती को ले आयो । वह आज्ञा शिरोधार्य करके सुमन्त्र बड़े प्रेम के साथ गया ।
गगनोन्नत राज-प्रासाद में चक्रवर्ती को न पाकर सुमन्त्र ने वहाँ के परिजनों से पूछा । उन लोगों से यह जानकर कि चक्रवर्ती कैकेयी के साथ हैं, वहाँ पहुँचकर सुमन्त्र ने दासियों के द्वारा अपने आगमन का समाचार भीतर भेजा । तब स्त्रियों में यमतुल्य कैकेयी ने सुमन्त्र को यह आज्ञा दी कि वह जाकर राम को यहाँ ले आये ।
कैकेयी का आदेश पाकर सुमन्त्र बड़ी उमंग के साथ स्वर्णमय सौधों से युक्त वीथियों को शीघ्र पार कर गया और अपने मन में अपना ही ध्यान करते रहनेवाले ( अर्थात्, नारायण के अवतारभूत तथा भगवान् के ध्यान में निरत रहनेवाले ) पर्वत तुल्य कंधोंवाले राम को नमस्कार करके मुँह पर हाथ रखकर^१ यों निवेदन किया ।
^१ बड़े लोगों के साथ बात करते समय मुँह के सामने हाथ रखकर बोलना विनम्रता का चिह्न होता है ।—अनु०
अयोध्याकाण्ड १६७
राजा, ऋषि तथा भूतल के लोग तुम्हारे पिता के समान ही बड़े प्रेम के साथ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। तुम्हारी छोटी माता (कैकेयी) ने आदेश दिया है कि मैं तुमको वहाँ ले आऊँ । अतः, स्वर्णमय उन्नत मुकुट को धारण करने के लिए शीघ्र चलो।
प्रभु (राम) वह वचन सुनकर, सहस्र शिरोंवाले (नारायण) को नमस्कार करके समुद्र-जैसे राज-समुदाय से घिरे हुए, पुष्पांलंकृत रथ पर सवार होकर चले। उस समय देवता लोग दिव्य संगीत का गान करते हुए आनन्द से उन्हें आशीर्वाद दे रहे थे एव सुन्दरियाँ बड़े कोलाहल के साथ उन्हें देख रही थीं।
'वीर (राम), मनोहर रत्न-मुकुट धारण करने के लिए जा रहे हैं,' इस उमंग से प्रेरित होकर वे सुन्दरियाँ एक से एक आगे बढ़कर मार्ग के दोनों पाश्र्वों में बड़ा कोलाहल करती हुई आ खड़ी हुईं। वे इस प्रकार हो गईं, मानो उन सबका एक ही प्राण हो और वह प्राण बाहर होकर एक अनुपम रथ पर आरूढ होकर जा रहा हो।
वे उदार (रामचन्द्र) कठोर वचनवाली (कैकेयी) की आज्ञा से उज्ज्वल किरीट को छोड़कर, पवित्र पृथ्वी-रूपी पत्नी से वियुक्त होकर, अरण्य के लिए प्रयाण करने के पूर्व ही, संगीत की मधुर कंठध्वनि करनेवाली उन रमणियों की भुजा-रूपी बाँसो तथा नेत्र-रूपी वरछो के घने अरण्य में प्रविष्ट हो गये।
वे स्त्रियाँ, सुगन्ध-चूर्ण, पुष्प, चन्दन, स्वर्ण आदि बिखेरने के लिए वहाँ आकर अपनी सुन्दर मेखलाओ को, कँगनो को तथा लज्जा को बिखेर रही थी। वे मन्मथ के वाणो से आहत होकर, क्षतो से पूर्ण अपने परस्पर मटे हुए मृदु स्तनो को, काम-पीडा के कारण नयनो से बरसनेवाले अच्छे अश्रुजल से धो रही थी।
'यह सुन्दर नयनोवाला (राम) क्या पृथ्वी की रक्षा करने के योग्य है ? हम, अबलाओ के प्रति किंचित् भी प्रेम से यह हीन है', याँ सोचकर वे व्याकुलता से काँप उठती और यह कहती कि अरुण नयनो तथा श्यामल देह से युक्त यह राम सब स्थानो में दिखाई दे रहा है, किन्तु न जाने कितने राम हैं।
स्त्रियाँ इस प्रकार (प्रेममग्न) होकर, झुण्ड बाँधकर कोलाहल करती हुई आईं। मुनियो तथा उस प्राचीन नगर के वृद्धो एवं बालको ने राम के रूप को देखा, किन्तु (उनके प्रति) अपने प्रेम की सीमा को नही देखा। अब हम उनके मन के भावों एव उनके वचनों का वर्णन करेंगे।
उन लोगों में से कोई कहता, यह समार तर गया। कोई कहता, युगात काल को यही से तुम देख लो (अर्थात्, वे राम को यह आशीर्वाद देते हैं कि युगात काल तक तुम जीवित रहो), कोई कहता, हमारी आयु भी तुम ले लो, कोई कहता, पंचेन्द्रियो पर दमन करके हमने जो कठोर तपस्या की है, उसका फल तुम्हारा ही हो और कोई कहत, हे हरित तुलसी की माला धारण करनेवाले। तुमको समस्त पुण्यफल प्राप्त हो।
कोई कहत, इस (राम) के अत्यन्त करुणा से पूर्ण उज्ज्वल नयनों की समता करते हैं कमल और इसकी देह-छवि को प्राप्त किया है मेघो ने। न जाने, उन्होने कैसा पुण्य किया है। और, कुछ कहते, चक्रवर्ती दशरथ ने अपूर्व तपस्या करके इस महानुभाव को
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कंब रामायण
पुत्र के रूप मे प्राप्त करके इस ससार को दिया है, उनका हम क्या प्रत्युपकार कर सकते हैं ?
कोई कहते, इस महानुभाव की कृपा, गजेन्द्र की पुकार को सुनकर मकर के प्राणों का अन्त करनेवाले चक्रधारी नारायण की कृपा-जैसी है । कोई प्रभु के निकट आकर, उनके दर्शन कर, कुछ कारण के बिना ही अपने मनोहर नेत्रो से अश्रु बहाने लगते ।
कोई कहते—प्रभु की गंभीरता और बुद्धि महान् श्याम घन के समान है ; उनका जैसा शील और किसमे हो सकता है ? चिरकाल तक गणना करने योग्य सबसे बड़ी संख्याओ के भी परे जो रहता है, उस अनादि तथा अनंत, अविनाशी मूर्त्ति ( नारायण ) का यह अवतार है । यह देवो में अतर्गत नही है ।
कोई कहते—समुद्र खोदनेवालों की ( अर्थात् सगर-पुत्रो की ), धरती पर गगा नदी को लानेवालो की ( अर्थात् भगीरथ की ), देवो की सहायता करने के लिए असुरो के साथ युद्ध करके उन्हें परास्त करनेवालो की ( अर्थात् इक्ष्वाकु, ककुत्स्थ आदि दशरथ-पर्यंत अनेक सूर्यवंशी राजाओ की ) जो अति प्रवृद्ध कीर्त्ति स्थिर है, वह इस प्रभु ( राम ) की विजयमाला-भूषित भुजाओ की कीर्त्ति के कारण ही अमर बनी है ।
हे वीर राम ! लो, यह चदन है, ये उत्तम रत्न-हार हैं। यहाँ तिलक एव सर्व आभरणो से भूषित मत्तगजो की श्रेणियाँ हैं। ये अश्व-पक्तियाँ हैं। ये पीत-स्वर्ण की निधियाँ हैं, निर्धन लोगो को इनका दान दो—यो कहकर कोई उन वस्तुओ की पक्तियाँ लगाते थे।
विद्युत्-समान रथ पर सवार होकर जब रामचन्द्र आ रहे थे, ऐसे द्रवितचित्त हो खडे थे, जैसे कोई गाय अपने बछड़े को अकेले छलाँग मारकर आते हुए देखकर प्रेम से द्रवितमन होती है ।
कुछ सद्गुण-सम्पन्न यह कहते कि श्वेतच्छत्र की छाया किये, बड़ी सेना रखे, विविध शस्त्र धारण किये जो राजा भूमि का शासन करते हैं, उनका अब ( राम जैसे व्यक्ति के उत्पन्न होने के पश्चात् ) पुत्रो को जनना व्यर्थ है, और चित्र-लिखित मूर्त्ति-जैसे स्तब्ध खडे रहते ।
विद्युत्-से शोभायमान श्याम घन जैसे वक्ष पर यज्ञोपवीत से शोभायमान राम, क्या रथ पर शीघ्रता से मार्ग पार करता हुआ जायगा ? ( राम के ) रथ की गति को मंद करने के लिए अनेक स्वर्णराशियो और विविध रत्नो से मार्ग को भर दीजिए—यो कहते हुए कुछ लोग मार्ग पर ( स्वर्ण, रत्न आदि ) बिखेर रहे थे ।
कुछ लोग कहते—यह अपनी माता की गोद मे नही पला, किन्तु पूर्वजन्म के पुण्य से इसका पालन करनेवाली है कैकेयी, अतएव वह ( कैकेयी ) समस्त पृथ्वी का शासन इसे देकर आनदित हो रही है । ऐसा करनेवाली उम ( कैकेयी ) का आनन्द किस प्रकार का है ! हम क्या कहे ?
कुछ कहते—अब पाप और दुःख समूल मिट जायेंग। कुछ कहते—भूमडल पर अब एक व्यक्ति का स्वत्व नही रहा, वह सब लोगो का हो गया। कुछ कहते—यह देवताओ के शत्रु राक्षसो को मिटा देगा और कुछ कहते—इसकी आज्ञा का पालन करने-वाले राजाओं का भाग्य कितना महान् है !
अयोध्याकाण्ड १६६
जब नगरनिवासी इस दशा में थे, तब विजयी प्रभु (राम) अनुपम रथ पर आरूढ होकर, दीर्घ ध्वजाओं से शोभित प्रासादों की पंक्तियों से युक्त वीथियो को पार कर गये और महान् यश से भूषित चक्रवर्त्ती के प्रासाद में जा पहुँचे।
पुष्प-भूषित कुंतलोंवाली सुन्दरियो के द्वारा चामर डुलाये जाते हुए, नूतन हर्ष से उल्लसित मन से, राम वहाँ आये, किन्तु वहाँ अपने अगाध स्नेह को प्रकट करते हुए, उन्नत किरीट धारण किये हुए, सुन्दर कमल-पीठ पर आनन्द के साथ आसीन हुए दशरथ को नही देखा।
वे राम, जो वेदो तथा अन्य शास्त्रो के जाननेवालो के मन मे प्रकाशित (भगवान् के) रूप के साथ एकरूप थे, उस स्वर्णमय सभा-मंडप मे नही गये, जहाँ ऋषियो और नरेशो के संघ बडे आनन्द के साथ यथार्थ प्रशस्तियो का गान कर रहे थे, किन्तु अपनी छोटी माता (कैकेयी) के आवास मे गये।
राम को यों जाते हुए देखकर राजाओं तथा ऋषियो ने सोचा—राम ने उचित ही सोचा है। वह पहले अपने पिता के चरणों को नमस्कार करके, फिर सब दिशाओ में उज्ज्वल भासमान किरणोंवाले सूर्य से प्राप्त अत्युत्तम मुकुट को यथाविधि धारण करनेवाला है। यह बिलकुल ठीक ही है।
जब ऐसा हो रहा था, तब रामचन्द्र मन मे किंचित् शिथिल होकर फिर स्वस्थ हुए और पवित्र दशरथ के रहने के स्थान को ढूँढते हुए आ पहुँचे। यह देखकर, अनुपम क्रूरता से युक्त कैकेयो, यह सोचती हुई कि मेरा पति अपने मुँह से (वरदान की बात) नही कहेगा, अतः मै स्वय इससे कहूँगी—उसको (कैकेयी को) अपनी माता मानकर उसके निकट आये हुए राम के सम्मुख यम के समान वह प्रकट हुई।
गोधूलि-वेला में अपनी माँ को देखनेवाले वत्स के सदृश राम ने अपने सम्मुख आई हुई माता को, धरती पर सिर रख नमस्कार किया। सिंदूर तथा प्रवाल-समान सुगंधयुक्त अपने मुँह को एक अरुण कर से आवृत करके और दूसरे कर से अपने वस्त्रो को सँभाले हुए बड़ी विनम्रता के साथ खडे रहे।
इस प्रकार खड़े हुए राम को देखकर, लौह-हृदय से युक्त होकर, 'प्राणियो का संहार करनेवाला यम'—केवल इस नाम से रहित होकर, कठोर कृत्य करनेवाली उस (कैकेयी) ने कहा—हे तात! तुम्हारे पिता तुमसे एक बात कहना चाहते हैं। यदि उनके अभिप्राय को कहना मुझे उचित हो, तो मै उसे कहूँगी।
आज्ञा देनेवाले मेरे पिता हैं। कहनेवाली आप स्वयं हैं। यह संभव हो तो—(अर्थात्, यदि आप स्वयं उस बात को मुझसे कहें तो) मेरा उद्धार हुआ। मेरे सदृश जन्म लेनेवाला ओर कौन है ? मेरे भाग्य से ऐसा अच्छा फल मुझे मिला है, इससे बढ़कर और क्या अच्छा फल हो सकता है ? आप मेरे माता और पिता दोनो हैं। आपका वचन मेरे लिए शिरोधार्य है। (अतः) आप आज्ञा दें।
तब कैकेयी ने राम से कहा—चक्रवर्त्ती ने यह आज्ञा दी है कि समुद्र से आवृत्त पृथ्वी का शासन भरत करे और तुम जटाधारी होकर तपस्वी के वेष में घने अरण्य में जाकर
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रहो। वहाँ पवित्र नदियों में स्नान करते हुए चौदह वर्ष व्यतीत करो और उसके पश्चात् लौट आओ।
किसी के लिए अवर्णनीय गुणोंवाले रामचन्द्र के सुन्दर मुख-मंडल की उस समय जो शोभा थी, उसका कथन करना हम जैसे लोगों के लिए सुलभ नहीं है। उस मुख-शोभा ने, जो सदा कमल की सुषमा की जैसी रहती थी, कैकेयी के यह वचन सुनकर सद्योविकसित अरुण कमल को भी परास्त कर दिया (अर्थात्, कमल की शोभा से भी अधिक राम के वदन की शोभा बढ़ गई।)
रामचन्द्र पहले विशुद्ध ज्ञानवाले चक्रवर्ती की आज्ञा का उल्लंघन होने से डरकर ही इस अंधकारमय संसार के राज्य के दुःख को स्वीकार करने के लिए सन्नद्ध हुए थे। अब वे उस भार से मुक्त होकर ऐसे लगे, जैसे कोई वृषभ, जो चक्रवाले शकट में स्वामी के द्वारा जोता गया हो, पर किसी करुणामय व्यक्ति के द्वारा बंधन से छुड़ा दिया गया हो।
यदि यह चक्रवर्ती की आज्ञा न भी हो, फिर भी क्या आपकी आज्ञा मेरे लिए पालनीय नहीं है ? मेरे भाई ने ऐश्वर्य पाया, तो मैंने भी तो उसे पा लिया। अतः, इससे बढ़कर मेरा हित और क्या हो सकता है ? इस आज्ञा को मैंने शिरोधार्य किया। मैं अभी बिजली की जैसी धूप से युक्त अरण्य में जाऊँगा। आपसे विदा भी ले रहा हूँ। (१-११०)
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अध्याय ४
नगर-निष्क्रमण पटल
पर्वत से भी ऊँचे कंधोंवाले राम ने ऐसे वचन कहकर कैकेयी के चरणों को पुनः नमस्कार किया। पिता दशरथ जिस स्थान में रहते थे, उस दिशा की ओर मुख करके नमस्कार किया और स्वर्ण-कमल पर आसीन लक्ष्मी तथा भू-देवी के रोते हुए, वे कौशल्या के आवास में पहुँचे।
कौशल्या देवी जब यह सोचती हुई बैठी थीं कि मेघों के आवासभूत पर्वत-जैसा मेरा राम, किरीट धारण करके आयेगा, तब राम ढुलनेवाले चामर और श्वेतच्छत्र के बिना ही, विधि के अपने आगे-आगे जाते हुए और धर्मदेव के अपने पीछे-पीछे आते हुए, अकेले ही, कौशल्या के सम्मुख जा पहुँचे।
'इसने किरीट नहीं पहना है, इसके केश तीर्थों के पवित्र जल से भींगे नहीं हैं, इसका कारण क्या हो सकता है ?'—इस प्रकार आशंकित होनेवाली उस (कौशल्या) के चरणों को स्वर्णमय वीर-वलयधारी राम ने प्रणाम किया। उस देवी ने चिंतित मन के साथ उन्हें आशीर्वाद देकर पूछा—'सोंचा हुआ काय क्या हुआ ? क्या राजतिलक में कोई विघ्न उत्पन्न हुआ ?
अयोध्याकाण्ड २०१
कौशल्या के यह पूछने पर राम ने अपने अरुण कर जोड़कर कहा—आप के प्रेम का पात्र, उत्तम गुणवाला मेरा भाई भरत ही उन्नत किरीट को धारण करनेवाला है।
तब उस (कौशल्या) देवी ने, जो राम आदि चारों पुत्रों पर निष्कलंक प्रेम रखती थी और भेदभाव से रहित थी, कहा—(ज्येष्ठ की रहते हुए, कनिष्ठ को राज्य का अधिकार नहीं है, इस) परिपाटी के अनुसार यह (भरत का राजतिलक) नहीं हो सकता। बस इतना ही; नहीं तो वह (भरत) सब से अधिक गुणवान् है, उसमें कोई कमी नहीं है।
कौशल्या ने राम से पुनः कहा—हे पुत्र! चक्रवर्ती की आज्ञा का निषेध करना तुम्हारा धर्म नहीं है। इस आज्ञा को अपने लिए हितकर समझकर तुम अपने भाई भरत को राज्य दे दो और उसके साथ एक होकर चिरकाल तक जियो।
माता का कथन सुनकर पवित्र, हर्ष-भरे हृदयवाले तथा दोषहीन गुणवाले राम ने कहा—चक्रवर्ती ने मुझे सन्मार्ग पर चलने के लिए एक आज्ञा दी है।
कौशल्या ने पूछा—वह आज्ञा क्या है ? तब राम ने कहा—चक्रवर्ती ने आज्ञा दी है कि मैं चौदह वर्ष-पर्यंत महान् अरण्य में ऋषियों के साथ निवास करके फिर लौट आऊँ।
वह वचन रूपी अग्नि कर्णाभरण से भूषित (कौशल्या के) कानों में प्रविष्ट होने, इसके पूर्व ही वह दुःखी हुई, कृशगात्र हुई, भ्रांतचित्त हुई, रोईं, मूर्च्छित हुई और गिर गई।
उसने (राम से) कहा—हे पुत्र! चक्रवर्ती ने तुम्हारे प्रति पहले जो कहा था कि तुम इस विशाल धरती का अवलंब बनकर इसकी रक्षा करो, वह क्या धोखा था या वह विष ही था ? मेरे पाँचों प्राण भयभीत हो रहे हैं।
कौशल्या (अत्यन्त पीडा के कारण) कभी एक हाथ से दूसरे को मलती, कभी अपने प्यारे पुत्र के अधिष्ठान बने हुए, वटपत्र की समता करनेवाले अपने उदर को, कंकणधारी पल्लव-सदृश करों से दबाती, कभी अग्नि से जैसे धुआँ उठता हो, वैसा निःश्वास भरती। पुनः उस निःश्वास को निगल जाती। इस प्रकार वह दुःखी हो रही थी।
'चक्रवर्ती की दया भी भली है!'—कहकर हँसती। सामने खड़े पुत्र को देखकर यह कहकर कि तुम्हारा वन-गमन कब होगा ?—उठती। कौशल्या यों दुःखी हुई जैसे उसके शरीर से प्राण ही निकल रहे हों।
वह यह कहकर कि हे पुत्र! तुम्हारे प्रति अपने मन में अत्यधिक प्रेम रखनेवाले चक्रवर्ती के प्रति तुमने क्या अपराध किया ? वह यों रोती, जैसे पूर्वजन्म के पाप के कारण दरिद्रता अनुभव करनेवाला कोई व्यक्ति सम्पत्ति पाकर भी उसे खो बैठा हो और रो रहा हो।
वह कहती—क्या धर्म मेरा सहायक नहीं है ? कभी कहती, हे देवताओ! मैंने कौन-सा पाप किया कि इस प्रकार मुझे विकल-प्राण होना पड़ रहा है ? वह, बछड़े से अलग की गई गाय के समान व्याकुल हुई। इसके अतिरिक्त और क्या कहा जाय ?
इस प्रकार व्याकुल होनेवाली माता को राम ने अपने हाथों से उठाया और यह कहकर सांत्वना देने लगे कि हे अपूर्व पातिव्रत्यवाली माता! सत्य की गरिमा से युक्त हमारे चक्रवर्ती को क्या आप असत्य-युक्त करेंगी ? कहिए तो।
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शिला-सदृश दृढता से युक्त पातिव्रत्यवाली कौशल्या को सांत्वना देने के लिए राम ने उसके मन में बैठनेवाले, सुन्दर, सारगर्भित और कहने योग्य ये वचन कहे —
मुझे ऐसा भाग्य प्राप्त हुआ है कि मेरा उत्तम भाई राज्य पा रहा है। मेरे पिता ऐसे सत्यवादी हैं कि भूलकर भी असत्य नही कहते। मै अरण्य मे निवास करके फिर वापस आऊँगा। जन्म पाने से, इससे बढ़कर और क्या भाग्य प्राप्त हो सकता है ?
आकाश, धरती, समुद्र तथा अन्य भूत भले ही मिट जावें, तो भी चक्रवर्त्ती की आज्ञा मेरे लिए अनुल्लंघनीय है। आप दुःखी न हो।
राम के वचन सुनकर कौशल्या ने कहा—हे तात ! तो मै भी यह नही कह सकती कि चक्रवर्त्ती की आज्ञा के अनुसार तुम ( अरण्य में ) मत जाओ। तुमको छोड़कर मेरे प्राण रह नही सकते। अतः, तुम अपने साथ मुझे भी वन में ले चलो।
तब राम ने कहा—हे माता। मुझसे वियुक्त हो चक्रवर्त्ती दुःख-सागर मे डूबे हैं। ऐसी दशा मे उन्हे सांत्वना दिये बिना मेरे साथ वन में जाने का आपका निश्चय करना उचित नही है। कदाचित् , आपने धर्म का ठीक-ठीक विचार नही किया।
दृढ धनुर्धारी भाई भरत को राज्य सौंपकर जब चक्रवर्त्ती राज्य की सम्पत्ति से पृथक् हो तपस्या में निरत होंगे, तब उनके साथ रहकर आप भी अपूर्व व्रतो का आचरण करेंगी।
आप क्यो इस प्रकार व्याकुल हो रही हैं ? देवता भी महान् तपस्या के आचरण से ही तो उन्नत हुए हैं। (मेरे वनवास के) ये जितने वर्ष हैं, वे देवो के चौदह दिन^१ ही तो हैं।
पहले कौशिक मुनि की कृपा से मैने जो विद्याएँ प्राप्त की और उन्हें प्राप्त करने के पश्चात् जो कार्य करके मै भाग्यवान् हुआ, वे व्यर्थ नहीं हुए। अब भी ऐसे मुनियो की आज्ञा का पालन करना मेरे लिए उत्तम ही है।
मै महान् तपस्वियो की सेवा करके, अलभ्य ज्ञान प्राप्त करके, दोषहीन अनुपम विद्याएँ सीखकर एव देवो का प्रेम भी पाकर इस नगर मे लौट आऊँगा, आप देखेंगी।
मगरमच्छों से पूर्ण समुद्र से आवृत्त पृथ्वी को खोदनेवाले, भ्रमरो से गुजरित पुष्पमालाएँ धारण करनेवाले सगर-पुत्रों ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करके अपने प्राणो को त्याग दिया और उस कार्य से प्रभूत कीर्त्ति के पात्र बने।
हरिण को धारण करनेवाले शिवजी के हाथ के परशु के जैसे शस्त्र को रखनेवाले परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा का उल्लघन न करके अपनी माता का सिर काट दिया था। अतः, मेरे लिए पिता की आज्ञा उपेक्षणीय है—यह सोचना भी उचित नही है।
राम ने इस प्रकार के अनेक वचन कहे। उनको सुनकर सत्यरूपी उज्ज्वल आभरण से युक्त कौशल्या सोचने लगी कि राम कोशल देश को अवश्य छोड़कर जानेवाला है।
फिर, कौशल्या यह विचार कर कि भरत पृथ्वी का राज्य करे, किन्तु मै चक्रवर्त्ती से
१. इस पृथ्वी में सूर्य का जो उत्तरायण और दक्षिणायन हे, वे देवो के लिए दिन और रात हैं। अत', मनुष्यो का एक वर्ष देवो का एक दिवस माना गया है।
अयोध्याकाण्ड २०३
ऐसी प्रार्थना करूँगी, जिससे राम को देश छोड़ वन मे जाकर तपस्वी का जीवन व्यतीत करना न पड़े, (दशरथ के पास) जाने लगी।
यो जानेवाली कौशल्या को नमस्कार करके और यह विचार करके कि चक्रवर्त्ती को तथा माता को सान्त्वना देने की सामर्थ्य रखनेवाली सुमित्रा देवी ही है, राम उसके मेघ-स्पर्शी प्रासाद मे जा पहुँचे।
उधर कौशल्या पैदल चलकर कैकेयी के आवास मे पहुँची, वहाँ अपने पति को पृथ्वी पर गिरे हुए देखकर मूर्च्छित होकर ऐसे गिरी, जैसे प्राण निकलने पर देह गिर जाती है।
फिर, प्रज्ञा पाकर कौशल्या कभी कहती--वियोग के अयोग्य व्यक्तियो से क्यो ऐसा वियोग होता है ? कभी कहती-हे गरिमामय ! यह क्या तुम्हारे लिए योग्य है ? कभी कहती-क्या यह न्याय है ? कभी कहती-हम दासो की दशा को आपने क्यो नही सोचा ? कभी कहती-आप निर्धनो के लिए उनके अभीष्ट धन बननेवाले है। कभी कहती-मुझ दीन एकाकिनी के आप ही अवलंब हैं। कभी कहती-क्या यह कार्य आपके विवेक के योग्य है ? कभी 'हे राजन् ! हे राजन्' ! रटती।
कभी कहती--हे चक्रवर्त्ती ! अंधकार को मिटानेवाले सूर्य के समान अनुपम रूप मे अपने आज्ञा-चक्र को प्रवर्त्तित करके, निर्विघ्न रूप से दडनीति प्रवर्त्तित करके, अब क्या इस संसार का, समस्त वस्तुओ के साथ विनाश करनेवाला प्रलय उत्पन्न करने के लिए आप यह कार्य कर रहे हैं ?
कभी कहती--हे वीचि-भरे समुद्र से आवृत पृथ्वी के निवासियो के तप-समान ! वेद-प्रतिपादित तत्त्वो के सार-सदृश ! हे करुणालय ! द्रवित मन होकर मैं रो रही हूँ, किंतु आप मेरी कुछ नही सुनते हैं। क्या यह उचित है ? हे सप्त लोको के प्रभु !
कभी कहती--हे पुत्र ! तुम्हारे पिता किसी अचिंतनीय दारुण पीडा से यो मूर्च्छित हो पड़े हैं कि विद्युत् समान उनकी देह प्राण हीन-सी हो पड़ी है। वे कुछ बोलते नही है। अहो ! इसका कारण क्या हो सकता है ? आओ, चक्रवर्त्ती की यह दशा देखो !
इस प्रकार रोनेवाली कौशल्या की कंठध्वनि (सभा-मंडप मे जाकर) प्रतिध्वनित होने के पूर्व ही उज्ज्वल करवालधारी राजा तथा ऋषिगण परस्पर-'यह उचित नही है।' कहते हुए वसिष्ठ को देखकर कह उठे कि आप जाकर इसका कारण ज्ञात करें। तब वसिष्ठ मुनि चक्रवर्त्ती के निकट आये। आकर उन्होंने तीक्ष्ण करवालधारी चक्रवर्त्ती की वह दशा देखी। उनके मन मे आशका हुई कि न जाने इसका परिणाम क्या होगा ?
वसिष्ठ विचार करने लगे- (चक्रवर्त्ती) मृत नही हैं। बिना मरे जीवित भी नही हैं। प्रज्ञाहीन हो पड़े हैं। यह कैकेयी अन्याकुल खड़ी है। यह कौशल्या वेदना से घुल रही है। ससार मे उत्पन्न मनुष्यो का स्वभाव विविध है। अन्य (सामान्य) व्यक्ति उसे समझ नही सकते।
फिर, मुनिवर ने यह सोचकर कि दुःख से उद्विग्नमना कौशल्या, दुःख का कारण नही बतलायगी। तब अपने सम्मुख अजलि बाँधकर खड़ी हुई कैकेयी से पूछा-- हे माता !
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चक्रवर्त्ती मूर्च्छित हैं। इसका कारण क्या है, कहो। तब कैकेयी ने अपने कारण निष्पन्न वृत्तांत को स्वयं कह सुनाया।
उसके सारा वृत्तांत कह सुनाने के पूर्व ही वसिष्ठ ने, चमकते करवाल को धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती को अपने सुन्दर कमल-सदृश करों से धूलि-भरी पृथ्वी से उठाया और यह कहते हुए कि—'हे शास्त्रज्ञ ! चिंतित मत होओ, कैकेयी स्वयं तुम्हारे पुत्र राम को राज्य दे देगी। तुम यह क्या कर रहे हो ? तुम अपना दुःख दूर करो', बार-बार प्रार्थना करते हुए खड़े रहे।
फिर, मुनिवर वसिष्ठ ने (दशरथ पर) शीतल जल छिड़का, पंखा डुलाकर हवा की और धीरे-धीरे उन्हें प्रज्ञा में लाकर मधुर वचन कहे। तब उन (मुनि) ने, शीतल समुद्र से उत्पन्न विष-समान कैकेयी के हलाहल-समान वचन के कुछ शांत होने पर, अपने प्यारे पुत्र का नाम-स्मरण करनेवाले चक्रवर्त्ती को होश में आते देखा।
चक्रवर्त्ती के प्राण लौटते देखकर वसिष्ठ ने कहा-- हे नायक ! अब तुम अपनी गंभीर वेदना को दूर करो। अब पुरुषोत्तम (राम) ही राज्य करेंगे। उसमें कोई विघ्न नहीं होगा! गरिमाहीन वचनवाली कैकेयी स्वयं उनको राज्य देगी। यदि घनश्याम राम राज्याभिषिक्त न होकर वन में जायेंगे, तो क्या हम यहीं रहेंगे ?--(अर्थात्, हम भी देश छोड़कर चले जायेंगे), तुम दुःखी मत होओ।
यों विचार कर कहनेवाले मुनि के वचन सुनकर दशरथ बोले--इस दशा में रहनेवाले मेरे प्राणों के निकलने के पूर्व ही आप राम को सुन्दर राजमुकुट पहना दें और वन जाने से उसे रोक दें तथा मेरे वचन को भी असत्य होने से बचावें। हे प्रभु ! आप यह कार्य करें।
तब मुनिवर ने गर्हित कार्य करनेवाली कैकेयी को देखकर कहा--हे लक्ष्मी-सदृश देवी ! अब तुम अपने पुत्र (राम) को राज्य, अन्य लोगों को उनके प्यारे प्राण तथा (वैवस्वत) मनु के वंश में उत्पन्न अपने पति को प्राण देकर निष्कलंक कीर्त्ति प्राप्त करो।
बड़ी महिमावाले कर्मों को समूल नाश करके शक्तिशाली बने हुए वसिष्ठ के इस प्रकार कहने के पूर्व ही कैकेयी सिसक-सिसककर रोती हुई कह उठी—यदि चक्रवर्त्ती अपने वचन से विचलित हो जायेंगे, तो मैं इस विशाल धरती में अपने प्राणों के साथ नहीं रहूँगी। अपनी बात सच्ची करने के लिए अभी मर जाऊँगी।
तब मुनिवर ने कहा—तुम यह नहीं सोचती कि तुम्हारा पति मर जायगा, तुम्हारा अपयश दिन-दिन बढ़ता रहेगा, और इससे पाप उत्पन्न होगा। तुम अपना हठ छोड़ती नहीं। तुम कुछ नहीं समझती हो। इससे अधिक मैं और क्या कह सकता हूँ ? यह कहकर पुनः कैकेयी को वे समझाने लगे।
किंचित् भी करुणा से हीन, त्वरित गति से निकलनेवाले चक्रवर्त्ती के प्राणों का भी विचार न करनेवाली, छत में घूमनेवाला अग्निकण है या विष, ऐसा भ्रम उत्पन्न करनेवाले वचन को कहनेवाली, हे नारी ! तुम मानव-स्त्री हो या अग्नि या मायाविनी पिशाचिनी हो ? हे निष्ठुरे ! अब दशरथ का तुमसे और इस मिट्टी से (अर्थात्, पृथ्वी से) क्या संबंध है ? तुम्हें प्राप्त होनेवाला अपयश बहुत बलवान् है।
अयोध्याकाण्ड २०५
चक्रवर्त्ती अपने मुँह से रामचन्द्र को वन जाने को कहे, इसके पूर्व ही तुमने (राम को वन जाने को) कह दिया। वह वन के दुस्तर मार्ग मे गये बिना नही रहेगा। तुम वह कठोर अग्नि हो, जो कीर्त्ति तथा अपने पति के प्राणो को जला रही हो। तुम्हारे सदृश कठोर और कौन होगा ? इससे बढ़कर क्रूर कार्य और क्या हो सकता है ?
निष्कलक मुनि के ये वचन सुनकर व्याकुल होनेवाले चक्रवर्त्ती ने जिह्वा मे विष रखनेवाली उस स्त्री को देखकर कहा-हे पापिन। क्या 'कठोर वन मे जाओ', कहकर मेरे प्राण (-सदृश राम) को तुमने भेज दिया ? क्या वह चला भी गया ?
हे पापिन ! तुम्हारे मनोभाव को अब मैने स्पष्ट जान लिया। तुम्हारे विंवाधर के विष को अनेक दिनो तक मैने पिया है। अतः, तुमने मेरे प्राणों को समूल खा लिया। मैने अग्नि समझ तुमको पत्नी के रूप मे नही अपनाया। किंतु अपने जीवन का अत करने के लिए एक यम को ही खोजकर अपनाया था।
मेरे नयन-समान राम को तुमने छल से वन मे भेज दिया। उससे मुझे तुम निहत कर रही हो। तुम अपयश से लज्जित नही होती हो। अब अनेक वचन कहने से क्या लाभ ? हे अधम क्रूरे ! तुम्हारे कठ का मगल-सूत्र¹ ही तुम्हारे पुत्र भरत का रक्षा-बंधन होगा।
इस प्रकार अनेक वचन कहने पर भी कैकेयी का मन पिघला न देखकर चक्रवर्त्ती मुनि से बोले-हे मुनिवर ! मै अभी कहे देता हूँ, यह (कैकेयी) मेरी पत्नी नही है। इसे मैने त्याग दिया। राजा बननेवाले उस भरत को भी मै अपना पुत्र नही मानता। वह पुत्रोचित कार्य (अर्थात्, पिता का मृत्यु-संस्कार) करने की योग्यता नही रखता।
अत्यन्त वेदना से पीडित चक्रवर्त्ती ने उत्तम कौशल्या को देखकर पूछा-क्या राम (वन जाने के पूर्व) जैसे मुझसे नही मिला, वैसे तुमसे भी मिले बिना ही चला गया ? तब कौशल्या, राम के विरह मे चक्रवर्त्ती की उस पीड़ा को देखकर अपने पूर्व विचार को (अर्थात्, दशरथ से यह प्रार्थना करनी है कि राम को वन मे न भेजें) छोड़कर स्वयं व्याकुल हो उठी।
अब कौशल्या को भी यह ज्ञात हो गया कि यह सब सपत्नी का कार्य है, चक्रवर्त्ती पहले वर देकर फिर पश्चात्ताप से मूर्च्छित हुए। यद्यपि वह (कौशल्या) अपने पति को सान्त्वना देने के लिए यह कहती रही कि हे राम ! तुम वन मे न जाओ, किंतु यह सोचकर मन मे चिंतित हुई कि यदि दशरथ के वचन सत्य न हो, तो संसार मे उन्हे अपयश उत्पन्न होगा।
अपने पति के दुःख से दुःखी होनेवाली कौशल्या ने (चक्रवर्त्ती से) कहा-हे बलवान् ! दृढ सत्य को अपनाकर, उस पर स्थिर रहकर, फिर यदि आप अपने अभिन्न
१ अंतिम वाक्य का यह भाव है कि 'मंगल-सूत्र' सुहाग का चिह्न है। कैकेयी का सुहाग अब अधिक काल तक नही रहेगा। उसके मिटने से भरत की रक्षा भी समाप्त होगी। अर्थात्, दशरथ के मर जाने पर भरत अनाथ हो जायगा और उसे दुःखी होना पड़ेगा।—अनु०
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प्रेमवाले पुत्र पर प्रेम से व्याकुल हो और आपका अनिन्दनीय गौरव निंदास्पद हो जाय, तो संसार के लोग उस सत्य को स्वीकार नही करेंगे।'
उत्तम कौशल्या-रूपी हंसिनी ने सोचा कि मेरा पुत्र वन को गये बिना नही रहेगा। वह बार-बार यह आशंका करती हुई कि पुत्र-विरह में चक्रवर्त्ती जीवित नही रहेंगे, अत्यन्त शोक-मग्न हुई। वह फिर सोचती कि यदि पुत्र पिता की प्राण-रक्षा के लिए देश में ही रहेगा, तो उससे पति का यश मिट जायगा। यह विचार कर चिंतित होती। अतः, वह अपने पुत्र से भी यह नही कह सकी कि तुम वन मे मत जाओ। अहो। अहो। कौशल्या कैसे शोक से संतप्त हुई थी।
पुष्पमालांलंकृत दशरथ ने उस (कौशल्या) के वचनो से जान लिया कि उत्तम कीर्त्तिवाला राम नगर में नही रहेगा। अवश्य वन मे जायगा। उससे वे शोकोद्विग्न हुए और बोले—हे मुझ पापी के अवलंब। आओ। हे पुत्र ! मेरे सम्मुख आओ।
पुनः दशरथ अपने पुत्र के प्रति कहने लगे—हे पुत्र। मेरे नयनो से मेरे प्राण भी द्रवित होकर बह रहे हैं। मेरी मृत्यु अब निश्चित है। चतुर्वेदी के ज्ञाता ब्राह्मण अग्नि के सम्मुख तुम्हारा अभिषेक करने के लिए जो तीर्थ-जल लाये हैं, उनको मेरे मुँह मे डालकर (अर्थात्, मेरी मृत्यु के इस समय मे मेरे मुँह में गंगाजल डालकर) फिर तुम विशाल वन में जाकर रहो।
हे पुत्र। बड़ी सेना के बल से संपन्न राजाओ को इक्कीस बार अपने फरसे से मारनेवाले, शक्ति में अपना उपमान स्वय ही बने हुए (परशुराम) को भी तुमने धनुष से परास्त कर दिया था। किन्तु मै (पापी) ने, 'कुलक्रम से प्राप्त मुकुट को धारण करो,' ऐसा कहकर तुरन्त ही तुमको जटामय ऊँचा मुकुट दिया।
हे श्याम ! हे स्वच्छ मन ! हे अरुण नयनो तथा करो से शोभायमान ! हे क्षमा-गुण से पूर्ण ! त्रिपुर-दाह के समय शिव के उपयोग में आनेवाले धनुष को तोड़नेवाले ! मै एकाकी हो गया हूँ। इस बुढ़ापे की अवस्था मे तुम मुझे छोड़ चले। अब मै जीवित रहना नही चाहता।
स्वर्ण से भी अधिक उज्ज्वल स्वर्ण। यश के भी यश ! बिजली से भी अधिक कान्तिपूर्ण धनुष को धारण करनेवाले। सत्य के सत्य ! मै इतना क्षुद्र नही हूँ कि अपनी आँखों के सामने ही तुमको वन जाने दूँ। तुम्हारे वन जाने के पूर्व ही मै स्वर्गलोक को चला जाऊँगा।
मेरा मन प्रेम से पिघलनेवाला है। मेरा शरीर प्रेम के कारण प्राण छोड़नेवाला है। मै तुम्हारे समान (कठोरहृदय) नही हूँ। मैने अपनी जिन आँखों से तुमको जानकी का पाणि-ग्रहण करके अयोध्या में प्रवेश करते हुए देखा था, उनसे अब तुमको नगर छोड़कर जाते हुए नही देख सकता।
१. भाव यह है—जिस सत्य को आपने स्वीकार किया है, उसके परिणामो को दृढता के साथ सहने में ही गौरव है। उसके परिणामभूत दुःख को देखकर व्याकुल होने में अगौरव ही है। —अनु०
अयोध्याकाण्ड २०७
तुम्हारे विरह को नगर के लोग भले ही सह ले, देवतालोग भले ही दुःखी न हों, तो भी हे स्वर्णमय रथवाले ! हे मेरे यशकारक ! हे मेरे प्राण ! तुमको जन्म देनेवाला, मैं तुम्हारे महत्त्व को जानता हूँ। अब अपनी दशा के बारे मे मैं क्या कहूँ ? मैं नहीं जिऊँगा । मैं नहीं जिऊँगा ।
मृदु सिकता से पूर्ण गम्भीर समुद्र से घिरी हुई विशाल पृथ्वी को, इस राज्य को, अक्षय संपत्ति को और अन्य सब वस्तुयो को छलनामयी कैकेयी को ही देकर यश पानेवाला मेरा उदार मन अब मेरे प्राण मिटा देगा, मेरे प्राण मिटा देगा ।
शब्दायमान समुद्र से आवृत्त इस पृथ्वी के निवासियो मे, देवताओ मे तथा पाताल के निवासियो मे तुम्हारे सदृश सद्गुणो से भूषित कौन हैं ? हे स्वर्णतुल्य ! जब परशुराम यह कहता हुआ आया था कि मेरे सामने खड़े रह सकनेवाला वीर कौन है ? तब दृढ़ चित्त के साथ तुमने उसका सामना करके उसे परास्त किया था। ऐसे तुमको छोड़कर मैं कैसे रह सकता हूँ ?
तुम वन को जानेवाले हो, यह सुनकर भी मैं जीवित रहा। फिर भी, यदि अब मैं उत्तम स्वर्गलोक को नही जाऊँ, तो कठोरहृदय कहला सकता हूँ ? हे पुत्र ! यदि तुम वन में निवास करोगे और मैं इस कैकेयी को देखता हुआ इस नगर में रहूँगा, तो मेरा स्वभाव नीच ही तो कहा जायगा ।
लक्ष्मी तथा भू-देवी बड़ी तपस्या करके ही तुम्हारे बलवान् वक्ष का आलिंगन कर सकीं। तुम से वियुक्त होकर वे नहीं रहेंगी, नही रहेंगी। मैं पापी, तुम से वियुक्त होकर मर जाऊँगा । हे वत्स ! तुम्हारे विरह मे भी यदि मैं जीवित रहा, तो क्या मैं भी कैकेयी के समान नही हो जाऊँगा ?
तुमको उत्तम आभरणो, किरीट, स्वर्ण-आसन, श्वेतच्छत्र तथा विशाल वक्ष पर आसीन जयलक्ष्मी के साथ शोभायमान होते हुए देखना चाहता था, किन्तु इसके विपरीत वल्कल, कृष्णाजिन आदि से युक्त रहते हुए तुमको कैसे देख सकता हूँ ? ऐसी अवस्था में प्राण छोड़ देना ही मेरे लिए अच्छा है ।
इस प्रकार विविध वचन कहते हुए चक्रवर्ती यों व्याकुल हुए, जैसे उनके जीवन का अन्त आ पहुँचा हो । तब मृदुल कृष्णाजिनधारी मुनिवर (वसिष्ठ) ने उनसे कहा— हे राजन् ! चिंतित मत होओ। मैं उस राम को आज वन जाने से रोक लूँगा ।
मुनिवर के वचन सुनकर मनुष्य-रूप मे स्थित (वैवस्वत) मनु-सदृश चक्रवर्ती, ऐसे लगते थे, जैसे तुरत प्राण छोड़नेवाले हों, यह विचार कर कि यदि ये विशुद्ध स्वभाववाले मुनिवर कहेगे, तो राम वन-गमन न करेगा, किंचित् स्वस्थ हुए और एकाकी हो अत्यन्त विकल होनेवाले अपने प्राणो को रोके रहे ।
चक्रवर्ती को व्याकुलप्राण तथा प्रज्ञाहीन देखकर तथा यह सोचकर कि उनकी मृत्यु हो गई है, कौशल्या अत्यन्त व्याकुल हुई और कहा—हे पुत्र ! इस नगर के साथ हमको भी तुमने छोड़ दिया । फिर कहा—हे प्रभो ! क्या गृहस्थ-जीवन में आप इसी
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प्रकार मेरा साथ देनेवाले हैं ? -- ( अर्थात्, आप गृहस्थ-जीवन मे मेरा सहारा देनेवाले हैं ; अब वैसा न करके मुझे छोड़कर चले जा रहे हैं--यह क्या धर्म है ? ) कौशल्या ने फिर कहा—हे सत्यस्वरूप ! हे ससार के राजाओ के राजाधिराज । यदि आप अपने प्राणो को इस प्रकार पीडित करेंगे, तो सारा ससार इससे दुःखी होगा । मुनिवर के साथ कदाचित् हमारा पुत्र लौट आयगा । इसलिए, हे राजन् ! आप चितित न हो । इस प्रकार के विविध वचन कहकर कौशल्या, चक्रवर्ती के शरीर पर, पैरों पर और मुँह पर अपने अरुण करों को फेरती हुई राजा को सात्वना देने लगी । तब चक्रवर्ती धीरे-धीरे प्रज्ञावान् होकर बोले--क्या दृढ धनुर्धारी मेरा पुत्र लौट आयगा ? लौट आयगा ? चक्रवर्ती बोले--क्रूर तथा छलनामयी कैकेयी ने कुबड़ी की बातो को सुनकर मेरे पूर्व दिये वरों के द्वारा मेरे प्राण लेने का निश्चय कर लिया । अपने महिमा-पूर्ण सुत तथा स्वयं ( अपने लिए ) पृथ्वी का राज्य पाने के अतिरिक्त हाय ! मेरे ज्येष्ठ पुत्र को वन में जाने को कहा--वन में जाने को कहा । फिर चक्रवर्ती ने कौशल्या से कहा--हे कौशल्ये ! स्वर्ण अगद-धारी राम वन- गमन से नही रुकेगा, मेरे प्यारे प्राण भी गये बिना नही रहेगे । इसका एक और कारण भी है सुनो, पूर्व मे एक मुनि ने मुझे एक शाप दिया था । यों कहकर पूर्व घटित सारा वृत्तात सुनाने लगे । चक्रवर्ती ने कहा--पूर्वकाल मे एक दिन मैं आखेट की उमंग मे बड़े वन मे गया था और हाथियो और सिंहो को ढूँढ़ रहा था । फिर, एक सुन्दर नदी-तट पर जा पहुँचा, जहाँ हाथी सचरण करते थे । वहाँ हाथ मे धनुष-बाण लिये हुए छिपकर खड़ा रहा । उसी वन में एक अंधा तपस्वी, अपनी अंधी पत्नी-सहित रहता था। उनका प्रिय पुत्र ही उन मुनि-दंपति का एकमात्र सहारा था । वह मुनि-पुत्र नदी मे जल भरने के लिए आया । यह न जानकर, बल्कि कोई आगत आखेट समझकर मैने शर-संधान किया । तब वह मुनिकुमार आहत होकर धरती पर लोट गया और विलाप करने लगा । मैने उस मुनिकुमार द्वारा नदी मे जल भरने के शब्द को सुन, यह समझकर शर छोड़ा था कि कोई हाथी जल पी रहा है । मैने आँखो से देखकर शर-संधान नही किया । किंतु, हाथी की ध्वनि के बदले नर की ध्वनि सुनकर आशकित होकर मैं उस स्थान पर जा पहुँचा । वहाँ मैने उस कुमार को शर से विद्ध होकर छटपटाते हुए देखा । उसके हाथ से कमडलु लुढ़क गया था । तब मेरे शरीर, मन तथा धनुष शिथिल हो गये । उस मुनि- बालक पर गिरकर मैंने दुःख के साथ पूछा--हे वत्स ! हाय ! तू कौन है ? कह । किंचित् भी असत्य से परिचय न रखनेवाले उस ( अबोध ) बालक ने कहा— मत्स्यावतार लेनेवाले (वेदो को चुरानेवाले राक्षस को मारकर वेदो की रक्षा करनेवाले ) भगवान् के नाभिकमल से उत्पन्न चतुर्मुख ने वेदोक्त प्रकार से जिन अनेक प्राणियो की सृष्टि की, उनमें मनुष्यों के चातुर्वण्यों में से प्रथम वर्ण में मेरा जन्म हुआ । चतुर्मुख की वंश-परंपरा में उत्पन्न काश्यप का पुत्र था विद्युत्-समान यज्ञोपवीत
अयोध्याकाण्ड २०६
से शोभित वक्षवाला वृत्तेश, उसका पुत्र था चतुर्वेण्टज शलभांशन ( शलभोजन ? ), उसी का मैं पुत्र हूँ । मेरा नाम सुरेचन है ।
इस समय, अपने नेत्रहीन माता-पिता के लिए जल लेने यहाँ आया था, यहाँ यह विपदा उत्पन्न हुई । हे पर्वत-समान कधोंवाले ! तुमने ( मनुष्य ) न जानकर हाथी के भ्रम से बाण प्रयुक्त किया । यह नियति का कार्य है। अतः, तुम दुःखी मत होओ ।
तीव्र पिपासा से मेरे माता-पिता दुःखी हो रहे हैं। हे अनुपम ! तुम जल ले जाकर मेरे माता-पिता को दो और मेरी मृत्यु का समाचार देकर उनसे कहो कि स्वर्गलोक को जाते हुए तुम्हारे पुत्र ने तुमको प्रणाम किया है। यह कहकर वह मुनि-कुमार स्वर्गलोक में देवों के स्वागत का पात्र बनकर चला गया ।
अपने पुत्र की प्रतीक्षा में ही बैठे हुए उन वृद्ध तपस्वी-दंपतियों के निकट मैं उस उनके पुत्र को और जल को लेकर पहुँचा। तब वे बोले—हे वत्स ! तू इतना विलंब करके लौटा है । हम यह सोचकर दुःखी हो रहे थे कि तुझ पर कोई विपदा तो नहीं आई । हे चन्दन-गन्ध से युक्त भुजावाले ! आओ, हम तेरा आलिंगन करेंगे ।
तब मैंने कहा—हे स्वामिन् ! मैं अयोध्या का रहनेवाला एक राजा हूँ । मैं शिकार की खोज में अँधेरे में बैठा हुआ था। उसी समय आपका सत्यभाषी पुत्र कमण्डलु में जल भरने लगा । तब आँखों से देखे विना, केवल शब्द को सुनकर मैंने बाण चलाया ।
शर के लगने पर (आपके पुत्र ने ) जब शब्द किया, तब यह जानकर कि यह हाथी नहीं, किन्तु कोई मनुष्य है, दौड़कर वहाँ गया और उससे पूछा कि तुम कौन हो ? सब वृत्तान्त कहकर वह शान्त हो गया और देवों के द्वारा स्वागत पाकर स्वर्गलोक में जा पहुँचा ।
मैंने बाण से (आपके पुत्र को ) मारा, इससे आप मुझपर क्रोध न करें । उस निरपराध के जल भरने से उत्पन्न शब्द को सुनकर मैंने उस दिशा में शर छोड़ा, किंतु आँखों से उसे नहीं देखा । मेरे इस अपराध को क्षमा करें । यह कहकर मैंने उनके चरणों को अपने सिर पर रख लिया ।
( पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर ) वे मुनि-दंपति गिर पड़े, मूच्छित हुए लोटने लगे। फिर कहने लगे—आज सचमुच हमारे नयन फूट गये। वे शोक-समुद्र में डूब गये । हे तात ! हे तात ! कहकर चिल्ला उठे । कह उठे कि तुमने हमारे हृदय के टुकड़े- टुकड़े कर दिये । फिर बोले—( हे पुत्र ) तुम स्वर्गलोक में चले गये । अब हम यहाँ रह नहीं सकते । हम भी आ गये, आ गये ।
इस प्रकार शोक-मग्न मुनि-दंपति के चरणों को प्रणाम करके मैंने कहा—आज से मैं ही आपका पुत्र हूँ। आपकी आज्ञा का पालन करता हुआ, मैं आपकी सेवा में निरत रहूँगा । आप किंचित् भी शिथिलमन न हों । शोक को दूर कर दें । मेरा कथन सुनकर उन्होंने कहा—हे दृढ़ धनुर्धारिन् ! सुनो, फिर वे यों बोले—
आँख का तारा जैसे पुत्र को खोकर भी प्राणी पर लालसा रखकर यदि हम भोजन करने बैठे रहेंगे, तो समाज के लोग हमारी निंदा करेंगे । हम भी स्वर्ग में जायेंगे ।