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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

अयोध्याकाण्ड १६७

राजा, ऋषि तथा भूतल के लोग तुम्हारे पिता के समान ही बड़े प्रेम के साथ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। तुम्हारी छोटी माता (कैकेयी) ने आदेश दिया है कि मैं तुमको वहाँ ले आऊँ । अतः, स्वर्णमय उन्नत मुकुट को धारण करने के लिए शीघ्र चलो।

प्रभु (राम) वह वचन सुनकर, सहस्र शिरोंवाले (नारायण) को नमस्कार करके समुद्र-जैसे राज-समुदाय से घिरे हुए, पुष्पांलंकृत रथ पर सवार होकर चले। उस समय देवता लोग दिव्य संगीत का गान करते हुए आनन्द से उन्हें आशीर्वाद दे रहे थे एव सुन्दरियाँ बड़े कोलाहल के साथ उन्हें देख रही थीं।

'वीर (राम), मनोहर रत्न-मुकुट धारण करने के लिए जा रहे हैं,' इस उमंग से प्रेरित होकर वे सुन्दरियाँ एक से एक आगे बढ़कर मार्ग के दोनों पाश्र्वों में बड़ा कोलाहल करती हुई आ खड़ी हुईं। वे इस प्रकार हो गईं, मानो उन सबका एक ही प्राण हो और वह प्राण बाहर होकर एक अनुपम रथ पर आरूढ होकर जा रहा हो।

वे उदार (रामचन्द्र) कठोर वचनवाली (कैकेयी) की आज्ञा से उज्ज्वल किरीट को छोड़कर, पवित्र पृथ्वी-रूपी पत्नी से वियुक्त होकर, अरण्य के लिए प्रयाण करने के पूर्व ही, संगीत की मधुर कंठध्वनि करनेवाली उन रमणियों की भुजा-रूपी बाँसो तथा नेत्र-रूपी वरछो के घने अरण्य में प्रविष्ट हो गये।

वे स्त्रियाँ, सुगन्ध-चूर्ण, पुष्प, चन्दन, स्वर्ण आदि बिखेरने के लिए वहाँ आकर अपनी सुन्दर मेखलाओ को, कँगनो को तथा लज्जा को बिखेर रही थी। वे मन्मथ के वाणो से आहत होकर, क्षतो से पूर्ण अपने परस्पर मटे हुए मृदु स्तनो को, काम-पीडा के कारण नयनो से बरसनेवाले अच्छे अश्रुजल से धो रही थी।

'यह सुन्दर नयनोवाला (राम) क्या पृथ्वी की रक्षा करने के योग्य है ? हम, अबलाओ के प्रति किंचित् भी प्रेम से यह हीन है', याँ सोचकर वे व्याकुलता से काँप उठती और यह कहती कि अरुण नयनो तथा श्यामल देह से युक्त यह राम सब स्थानो में दिखाई दे रहा है, किन्तु न जाने कितने राम हैं।

स्त्रियाँ इस प्रकार (प्रेममग्न) होकर, झुण्ड बाँधकर कोलाहल करती हुई आईं। मुनियो तथा उस प्राचीन नगर के वृद्धो एवं बालको ने राम के रूप को देखा, किन्तु (उनके प्रति) अपने प्रेम की सीमा को नही देखा। अब हम उनके मन के भावों एव उनके वचनों का वर्णन करेंगे।

उन लोगों में से कोई कहता, यह समार तर गया। कोई कहता, युगात काल को यही से तुम देख लो (अर्थात्, वे राम को यह आशीर्वाद देते हैं कि युगात काल तक तुम जीवित रहो), कोई कहता, हमारी आयु भी तुम ले लो, कोई कहता, पंचेन्द्रियो पर दमन करके हमने जो कठोर तपस्या की है, उसका फल तुम्हारा ही हो और कोई कहत, हे हरित तुलसी की माला धारण करनेवाले। तुमको समस्त पुण्यफल प्राप्त हो।

कोई कहत, इस (राम) के अत्यन्त करुणा से पूर्ण उज्ज्वल नयनों की समता करते हैं कमल और इसकी देह-छवि को प्राप्त किया है मेघो ने। न जाने, उन्होने कैसा पुण्य किया है। और, कुछ कहते, चक्रवर्ती दशरथ ने अपूर्व तपस्या करके इस महानुभाव को