कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 206, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ कम्ब रामायण
विशाल राज्यों के शासक इन्द्र की समता करनेवाले नरेश ऐसे मुक्तामय धवल छत्रों को लिये हुए जैसे करोड़ों चन्द्र आकाश में भर गये हों तथा ऐसे श्वेत चामरों को लिये हुए जैसे अन्तरिक्ष में अनेक हंस उड़ रहे हों, अभिषेक के मण्डप में आ पहुँचे ।
तपस्या के द्वारा पुण्य-फलों को प्राप्त करनेवाले उत्तम वेदज्ञ ब्राह्मण ऐसे आनन्द के साथ कि अपने पुत्र के विवाह को ही देखनेवाले हों, राज्य-लक्ष्मी के साथ रामचन्द्र का विवाह देखने के लिए आ पहुँचे ।
देवता गगन-तल को भरने लगे समुद्र-रूपी वस्त्र से युक्त भूमि पर रहनेवाले लोग सब दिशाओं को भरने लगे, मंगल-सूचक शंखों की ध्वनि तथा विशाल भेरियों की ध्वनि श्रोताओं के कानों में भरने लगी अपरिमेय स्वर्ण के साथ ( दान करते हुए ) बहाई हुई जल की धारा, वीचियों से पूर्ण सातों समुद्रों को भरने लगी ।
दीप की कांति को मन्द करनेवाली देह की कांति से युक्त राजाओं के विद्युत्-जैसे चमकनेवाले असंख्य किरीटों की रह-रहकर चमकनेवाली जगमगाहट, गगनगामी सूर्य को भी आवृत्त कर फैल गई , समुद्र से उत्पन्न मुक्ता जैसे दाँतोंवाली मदहास-युक्त युवतियों के आभरणों की कांति, स्वर्ण को भी आवृत्त करके देवताओं की आँखों को भी चौंधियाने लगी ।
उस समय, प्रभु ( राम ) के राज्याभिषेक के लिए आवश्यक समस्त सामग्री को लेकर वेदज्ञ ब्राह्मण चारों वेदों का वाचन करते हुए आये । उस पुरातन नगर के द्वार पर एकत्र हुई भीड़ उनके लिए मार्ग छोड़कर हट गई , इस प्रकार ( ब्राह्मणों को अपने साथ लेकर ) महान् तपस्वी वसिष्ठ आ पहुँचे ।
वसिष्ठ मुनि ने गंगा से कन्याकुमारी-पर्यन्त सब तीर्थों के पवित्र जल तथा चारों दिशाओं के जल को मँगवाया । होम के लिए आवश्यक वस्तुओं का प्रबन्ध किया और वीर सिंहासन भी प्रस्तुत करके रखा तथा सब आचार सम्पन्न किये ।
ज्योतिषज्ञों ने कहा कि मुहूर्त निकट आ गया है । कर्म-बन्धन को तोड़नेवाले तप का आचरण करनेवाले महर्षि (वसिष्ठ) ने सुमन्त्र को आदेश दिया कि शीघ्र जाकर रत्न किरीट-धारी चक्रवर्ती को ले आयो । वह आज्ञा शिरोधार्य करके सुमन्त्र बड़े प्रेम के साथ गया ।
गगनोन्नत राज-प्रासाद में चक्रवर्ती को न पाकर सुमन्त्र ने वहाँ के परिजनों से पूछा । उन लोगों से यह जानकर कि चक्रवर्ती कैकेयी के साथ हैं, वहाँ पहुँचकर सुमन्त्र ने दासियों के द्वारा अपने आगमन का समाचार भीतर भेजा । तब स्त्रियों में यमतुल्य कैकेयी ने सुमन्त्र को यह आज्ञा दी कि वह जाकर राम को यहाँ ले आये ।
कैकेयी का आदेश पाकर सुमन्त्र बड़ी उमंग के साथ स्वर्णमय सौधों से युक्त वीथियों को शीघ्र पार कर गया और अपने मन में अपना ही ध्यान करते रहनेवाले ( अर्थात्, नारायण के अवतारभूत तथा भगवान् के ध्यान में निरत रहनेवाले ) पर्वत तुल्य कंधोंवाले राम को नमस्कार करके मुँह पर हाथ रखकर^१ यों निवेदन किया ।
^१ बड़े लोगों के साथ बात करते समय मुँह के सामने हाथ रखकर बोलना विनम्रता का चिह्न होता है ।—अनु०