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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 549 में से

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पृष्ठ 213

अयोध्याकाण्ड २०३

ऐसी प्रार्थना करूँगी, जिससे राम को देश छोड़ वन मे जाकर तपस्वी का जीवन व्यतीत करना न पड़े, (दशरथ के पास) जाने लगी।

यो जानेवाली कौशल्या को नमस्कार करके और यह विचार करके कि चक्रवर्त्ती को तथा माता को सान्त्वना देने की सामर्थ्य रखनेवाली सुमित्रा देवी ही है, राम उसके मेघ-स्पर्शी प्रासाद मे जा पहुँचे।

उधर कौशल्या पैदल चलकर कैकेयी के आवास मे पहुँची, वहाँ अपने पति को पृथ्‍वी पर गिरे हुए देखकर मूर्च्छित होकर ऐसे गिरी, जैसे प्राण निकलने पर देह गिर जाती है।

फिर, प्रज्ञा पाकर कौशल्या कभी कहती--वियोग के अयोग्य व्यक्तियो से क्यो ऐसा वियोग होता है ? कभी कहती-हे गरिमामय ! यह क्या तुम्हारे लिए योग्य है ? कभी कहती-क्या यह न्याय है ? कभी कहती-हम दासो की दशा को आपने क्यो नही सोचा ? कभी कहती-आप निर्धनो के लिए उनके अभीष्ट धन बननेवाले है। कभी कहती-मुझ दीन एकाकिनी के आप ही अवलंब हैं। कभी कहती-क्या यह कार्य आपके विवेक के योग्य है ? कभी 'हे राजन् ! हे राजन्' ! रटती।

कभी कहती--हे चक्रवर्त्ती ! अंधकार को मिटानेवाले सूर्य के समान अनुपम रूप मे अपने आज्ञा-चक्र को प्रवर्त्तित करके, निर्विघ्न रूप से दडनीति प्रवर्त्तित करके, अब क्या इस संसार का, समस्त वस्तुओ के साथ विनाश करनेवाला प्रलय उत्पन्न करने के लिए आप यह कार्य कर रहे हैं ?

कभी कहती--हे वीचि-भरे समुद्र से आवृत पृथ्‍वी के निवासियो के तप-समान ! वेद-प्रतिपादित तत्त्वो के सार-सदृश ! हे करुणालय ! द्रवित मन होकर मैं रो रही हूँ, किंतु आप मेरी कुछ नही सुनते हैं। क्या यह उचित है ? हे सप्त लोको के प्रभु !

कभी कहती--हे पुत्र ! तुम्हारे पिता किसी अचिंतनीय दारुण पीडा से यो मूर्च्छित हो पड़े हैं कि विद्युत् समान उनकी देह प्राण हीन-सी हो पड़ी है। वे कुछ बोलते नही है। अहो ! इसका कारण क्या हो सकता है ? आओ, चक्रवर्त्ती की यह दशा देखो !

इस प्रकार रोनेवाली कौशल्या की कंठध्वनि (सभा-मंडप मे जाकर) प्रतिध्वनित होने के पूर्व ही उज्ज्वल करवालधारी राजा तथा ऋषिगण परस्पर-'यह उचित नही है।' कहते हुए वसिष्ठ को देखकर कह उठे कि आप जाकर इसका कारण ज्ञात करें। तब वसिष्ठ मुनि चक्रवर्त्ती के निकट आये। आकर उन्होंने तीक्ष्ण करवालधारी चक्रवर्त्ती की वह दशा देखी। उनके मन मे आशका हुई कि न जाने इसका परिणाम क्या होगा ?

वसिष्ठ विचार करने लगे- (चक्रवर्त्ती) मृत नही हैं। बिना मरे जीवित भी नही हैं। प्रज्ञाहीन हो पड़े हैं। यह कैकेयी अन्याकुल खड़ी है। यह कौशल्या वेदना से घुल रही है। ससार मे उत्पन्न मनुष्यो का स्वभाव विविध है। अन्य (सामान्य) व्यक्ति उसे समझ नही सकते।

फिर, मुनिवर ने यह सोचकर कि दुःख से उद्विग्नमना कौशल्या, दुःख का कारण नही बतलायगी। तब अपने सम्मुख अजलि बाँधकर खड़ी हुई कैकेयी से पूछा-- हे माता !